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GSDP की तुलना में तेज़ी से बढ़ा ऋण, 1.39 लाख करोड़ की कर्ज में डूबी हरियाणा सरकार

राज्य की भाजपा सरकार पर सार्वजनिक ऋण साल 2013-14 में 60,294 करोड़ रुपए से बढ़कर 2017-18 में 1.39 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया है.

हरियाणा को सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) में तेज़ी से ग्रोथ करने वाले तीन राज्यों की सूची में शामिल किया गया है. वहीं नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा का कर्ज उसके सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) की तुलना में अधिक हो गया है. इसलिए राज्य को अपने ऋण पोर्टफोलियों को बनाए रखने के लिए ज्यादा उधार लेना पड़ता है.

बीते मंगलवार को हरियाणा की वित्तीय स्थिति को लेकर विधानसभा में कैग की रिपोर्ट पेश की गई थी. जिसके मुताबिक राज्य की भाजपा सरकार पर सार्वजनिक ऋण साल 2013-14 में 60,294 करोड़ रुपए से बढ़कर 2017-18 में 1.39 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया है.
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने कहा, “1966 में जब राज्य का गठन हुआ था तब से 2013-14 तक राज्य सरकार पर 60,294 करोड़ रुपए का कर्ज था. लेकिन भाजपा के शासन के दौरान 31 मार्च 2018 तक कर्ज 1.39 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है.”

साल 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की जनसंख्या 2.53 करोड़ है इस हिसाब से प्रत्येक नागरिक पर 55 हजार रुपए से ज्यादा कर्ज निहित किया गया. लेकिन इसमें केंद्र सरकार की उज्ज्वला डिस्कॉम एश्योरेंस योजना (यूडीएवाई) के तहत बिजली वितरण कंपनियां भी शामिल थी.

बिजली कंपनियों पर कर्ज सितंबर 2015 तक 34,600 करोड़ रुपए था. हरियाणा ने 2014-15 में 25,950 करोड़ रुपए, 2015-16 में 17,300 करोड़ रुपए और 2016-17 में 8,650 करोड़ रुपए का कर्ज लिया.

दरअसल, हरियाणा का राजस्व प्राप्ति, राजस्व व्यय को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं था. इसलिए सरकार उधार पर निर्भर रही है. कैग ने कहा, “2017-18 के दौरान, 6,599 करोड़ रुपए का राजस्व व्यय उधार के पैसों से किया गया था, जो कि कुल उधार ली गई धनराशि का 31 प्रतिशत था.”

कैग के अनुसार 2013-14 में ऋण और जीएसडीपी के बीच का अनुपात 15.10 प्रतिशत था. जो साल 2017-18 में 22.97 प्रतिशत तक पहुंच गया. जिससे यह साबित होता है कि जीएसडीपी की तुलना में हरियाणा पर कर्ज तीव्र गति से बढ़ रहा था. राजस्व प्राप्ति के लिए ऋण पर ब्याज भुगतान का प्रतिशत 2013-14 से 2017-18 तक 13.02 प्रतिशत से बढ़कर 17.04 प्रतिशत हो गया.

कैग के अनुसार अगले पांच वर्षों में राज्य को वर्तमान बाजार ऋणों का सालाना 12,906 करोड़ रुपए चुकाना होगा. जो पांच साल की अवधि में 16,756 करोड़ रुपए प्रति वर्ष हो जाएगा. जबकि राजस्व प्राप्तियां राजस्व व्यय से बहुत कम है और राज्य को अपने ऋण पोर्टफोलियो बनाए रखने के लिए अधिक धनराशि उधार लेनी होगी.

कैग ने बताया कि 31 मार्च 2017 तक सहकारी चीनी मिलों पर 2,110 करोड़ रुपए का ऋण बकाया था.

राज्य ने 200 करोड़ रुपए नए ऋणों का उपयोग किया और 2017-18 के दौरान केवल 7 करोड़ रुपए की वसूली की. जिसके कारण 31 मार्च, 2018 तक कुल 2,303 करोड़ रुपए का ऋण बकाया था. पहले की बकाया ऋण को पूरा किए बगैर ही चीनी मिलों को फिर से ऋण दिया गया था.

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