कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

हर्षमंदर का खत: धर्मनिरपेक्षता कोई मुखौटा नहीं, यह भारतीय गणराज्य की जड़ है- हमें नफ़रत की राजनीति का मुकाबला पुरजोर तरीके से करना होगा

"मैं इस बात से घबरा गया हूं कि अगले पांच वर्षों में आगे क्या होगा. लेकिन मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि हम उम्मीद को मरने नहीं देंगे. हम विरोध करने के अपने संकल्प को दोहराएंगे."

एक लंबे, ख़ौफ़नाक सूखे के बाद आप मानसून की बारिश के इंतज़ार में बेचैन हो जाते हैं, आप उम्मीद करते हैं कि यह मानसून आपके सूखे पड़े खेतों की प्यास बुझा देगा, यह आपकी भूमि को हरा भरा कर देगा, अब आपके मवेशी और आपके दुबले पतले बच्चों को खाना मिलेगा और सभी में जान डालेगा. लेकिन जब इसका समय आता है, तो आप एकटक आकाश को घूरते हैं और पाते हैं कि बारिश के बादल नहीं हैं, केवल एक जलता हुआ सूरज है. आप धीरे-धीरे साथ महसूस करते हैं कि कोई जीवनदायी बारिश नहीं होगी, कि अब अपने आप को कोसने और प्रचंड गर्मी और एक निर्दयी सूखे का सामना करने के लिए दृढ़ करने की आवश्यकता है.

मुझे यह महसूस हुआ जब मैंने स्तबंध अविश्वास में टीवी पर उत्साहित एंकरों को 23 मई की चुनाव परिणामों की घोषणा करते देखा है. शुरुआती अविश्वास जल्द ही एक दर्दनीय एहसास में तब्दील हो गया कि अब कुछ बेहतर होने वाला नहीं है, बल्कि और बुरा हो जाएगा. चिलचिलाती धूप, कोई सुखदायक जगह नहीं, कोई छांव नहीं, ठंडे पानी का कोई कुंड नहीं होगा.

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि यह चुनावी फ़ैसला नफ़रत और भय की राजनीतिक जीत है. यह उसी का जनादेश है. यह उस व्यवस्था की जीत है जो प्रगतिशील विचारों को दबाता है और प्रतिरोध को देशद्रोह क़रार देता है. नरेन्द्र मोदी को बहुमत मिलने के कई कारण दिखाई देते हैं. विपक्ष के भीतर साहस की कमी और आपसी मत भिन्नता जैसे कारणों की वजह से जनता ने नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी के हाथों में देश को सौंपा. इसके पीछे एक महंगा प्रचार तंत्र और बड़े कॉरपोरेट मीडिया का हाथ भी देखा गया. लेकिन, इस जनादेश को भारतीय जनता पार्टी और उसकी आरएसएस इस तरह भुना सकती है कि जनता ने नफ़रत और डर की राजनीति को चुनने का फ़ैसला किया है. वे यह मानेंगे कि जनता ने धार्मिक अल्पसंख्यकों —मुस्लिमों और ईसाइयों — और वंचित जातियों को दूसरी श्रेणी के नागरिक के रूप में देखने वाली सामाजिक और राजनीतिक विचारधारा पर अपनी मुहर लगाई है.

इसलिए मैं अपने भारतीय मुस्लिम भाइयों और बहनों को, अपने ईसाई और दलित भाइयों और बहनों को, अपने वाम और लिबरल साथियों को- मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, विचारकों, लेखकों और कलाकारों को — यह खुला पत्र लिखता हूं. मुझे खेद है कि बहुसंख्यकों की राजनीति के उदय का विरोध करने और लड़ने के लिए और एक दयालु और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के हमारे सभी प्रयास प्रबल नहीं हुए हैं. मैं इस बात से घबरा गया हूं कि अगले पांच वर्षों में आगे क्या होगा. लेकिन मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि हम उम्मीद को मरने नहीं देंगे. हम एकजुटता और संघर्ष के साथ विरोध करने के अपने संकल्प को दोहराएंगे.

स्वतंत्रता के समय महात्मा गांधी का देश होने से लेकर अबतक, भारत ने बहुत लंबा सफर तय किया है. एक मुस्लिम पाकिस्तान के खूनी निर्माण और हिंदू मुस्लिम दंगों में एक लाख लोगों की मौत के बावजूद, हम भारत के लोगों ने अपने संविधान में एक धर्मनिरपेक्ष, समावेशी और मानवीय लोकतंत्र को जोड़ा है, जिसमें धर्म और जाति एक समान नागरिकता के लिए अप्रासंगिक थे. एक ऐसे देश की कल्पना की गयी थी जिस पर मुस्लिम, ईसाई और दलित नागरिकों का उतना ही हक़ होगा जितना कि इसकी उच्च जाति के हिंदू लोग से. आज सवर्ण हिंदू राजनीति, अर्थव्यवस्था, मीडिया, न्यायपालिका, शिक्षाविद् सभी जगह हावी रहते हैं और फिर भी वे नाराज और क्रोधित है. देश बीच में बँट गया है. मुस्लिम और ईसाई अब अंडरक्लास हैं, इन्हें बाहरी व्यक्ति का लेबल दिया जाता है, दूसरे से कम नागरिक होने का.

2014 तक, मैंने अपने विश्वास बनाए रखा था कि भारत कभी भी एक प्रमुख हिंदू राज्य नहीं बनेगा, क्योंकि अधिकतर भारतीय — हिंदू एवं मुस्लिम — अपने- अपने धर्म को मानेंगे लेकिन कभी भी एक-दूसरे के खिलाफ नफ़रत की राजनीति का समर्थन नहीं करेंगे. 2014 में मेरा विश्वास बुरी तरह से हिल गया था, हालांकि मैं यह मानने के लिए तैयार था कि मोदी के कई समर्थक केवल आकांक्षी हैं और मुसलमानों के खिलाफ किसी प्रकार की दुर्भावना नहीं रखते.

लेकिन जैसे जैसे प्रधानमंत्री मोदी के पहले कार्यकाल के वर्ष बीतते गए, मुझे पूर्वाभास होना शुरू हो गया. सबसे अधिक मैं उस भारत से परेशान था जिसे मैंने कारवां ए मोहब्बत की यात्रा में देखा था. मैंने 14 राज्यों में 28 यात्राएं की, दूर के गाँवों और कस्बों में उन परिवारों से मिला किया है जिनके प्रियजनों को हिंसा और लिंच मॉब ने उनसे छें लिया. मैंने हर जगह अपनी यात्राओं में सांप्रदायिक नफ़रत के सबूत देखें. पुरुषों का केवल मॉब लिंचिंग ही नहीं की गई बल्कि उनके डेड बॉडी को प्रियजनों को लौटाने के पहले उनके शरीर को बुरी तरह से क्षतिग्रस्त किया गया. शरीर बुरी तरह से काट दिए गए, उनके कान काट दिए गए, उनकी आँखें निकाल दी गई. गुप्तांग में पत्थर डाल दिए गए. ऐसे लिंचिंग के अपराधों का विडीओ हमलावर या तमाशबीन ख़ुद ही बनाते थे. यह भीड़ — जिसमें अक्सर किशोर शामिल थे और भी महिलाएं भी छड़, लाठी, खंजर, यहाँ तक कि पेचकस से लैस — पीड़ितों तब तक मारती थी जब तक उसके प्राण नहीं निकल जाते. मुझे स्थानीय समुदायों में कहीं भी पछतावा या करुणा नाम की चीज़ नहीं देखी.

यह एक ऐसा भारत था जिसे मैं नहीं जानता था, यह एक नफरत से भरा भारत था जिसमें सहानुभूति और दया का कोई अंश नहीं था.

इसलिए, मैंने 2019 के चुनाव परिणामों का इंतजार किया. यह चुनाव मेरे लिए राजनीतिक दलों का मुकाबला या परीक्षण था. बल्कि भारत के नागरिकों का इम्तिहान था. इस बार यह तय होना था कि अगर मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा ने बड़े वोट-शेयर को आकर्षित किया, तो यह साबित होगा कि मेरे जीवन भर का विश्वास — कि बहुसंख्यक हिंदू अपने मुस्लिम हमवतनों के उत्पीड़न का समर्थन नहीं करेंगे —.ग़लत था.

मेरे लिए 2019 के चुनाव केवल मोदी की निरंतर बढ़ते लोकप्रियता और प्रभाव के बारे में नहीं थे. यह मौलिक रूप से भारत के बहुसंख्यक हिंदू लोगों की आत्मा का परीक्षण था. इससे पता चलता है कि क्या वे ऐसे लोग थे जो अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णु और सम्मानजनक हैं? इस अर्थ में मैंने इस चुनाव को भारत के धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक संविधान पर एक जनमत संग्रह के रूप में देखा.

2002 के गुजरात नरसंहार के पीड़ितों के साथ एक दशक से अधिक काम करने के बाद 2014 में, मैं इस बारे में स्पष्ट था कि मोदी के नेतृत्व में भाजपा की राजनीति का क्या दिशा है. मैंने एक नेता को देखा था जो लगातार अपने चुनावी भाषणों में मुस्लिमों और ईसाइयों को ताना मारता है; जिसने नेतृत्व की सरकार के दौरान एक क्रूर नरसंहार हुआ था जो हफ्तों तक जारी रहा. मैंने इसके परिणामों को देखा है — भेदभाव और भय के साथ रहने वाले धार्मिक अल्पसंख्यकों का सामाजिक और आर्थिक रूप से बहिष्कार, उन्हें सामान्य आबादी से अलग बस्तियों में रहने को मजबूर किया गया. मैंने उस नेता की आर्थिक नीतियों के परिणामों को भी देखा था, जो कि बड़े व्यवसाय के पक्षधर थे, लेकिन स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण और कृषि जैसे सामाजिक खर्चों की उपेक्षा करती हैं.

लेकिन देश में कई लोग अभी भी मोदी पर विश्वास करने के लिए तैयार थे. मोदी ने ‘अच्छे दिन’ और ‘सबका विकास’ के बारे में बात की जिसमें एक सरपट दौड़ने वाली अर्थव्यवस्था, नौकरी के सृजन में वृद्धि करने और पूंजीवाद और किसान की पीड़ा को समाप्त करने का वादा किया गया था. मेरा मानना ​​है कि 2014 में मोदी को चुनने वाले 31 प्रतिशत मतदाताओं में संभवतः कुछ थे, जिन्होंने नफरत के बजाय उन्हें इस आशा के लिए चुना था.

लेकिन 2019 के चुनाव पूरी तरह से अलग थे. इसमें विकास, रोजगार, अर्थव्यवस्था और कृषि संकट जैसे मुद्दे चुनाव अभियान के दौरान शायद ही कभी मोदी के उग्र भाषण में शामिल थे. उनके शब्दों में भारत के युवाओं, किसानों और गरीबों के लिए बेहतर जीवन के कोई मायने नहीं थे. इसके बजाय जो प्रस्ताव पेश किया गया वह निरा और स्पष्ट था- यह हिंदू राष्ट्रवाद था. अभियान के दौरान नफ़रत भारी भाषा चरम पर थी और इस भाषा से जिसे निशाना बनाया जा रहा था वह भी साफ़ था. मुसलमान दुश्मन थे, पाकिस्तान के प्रति वफादार थे. जो लोग बचाव में उठे – चाहे वो वामपंथी हो या कुलीन उदारवादी बुद्धिजीवी, कार्यकर्ता और छात्र – ‘ट्रौजन हॉर्स’ (घर के भेदी) करार दिए गए, जिन्हें उजागर करने और कुचलने की जरूरत थी.

मैं साफ़ तौर पर देख रहा था कि यदि लोग अभी भी मोदी का समर्थन करते हैं, जब मोदी ने भारत के नौजवानों, किसानों और मेहनतकश वर्गों के हालात बदलने के लिए न क्षमता और न कल्पना का प्रदर्शन किया है, तो वो ऐसा इसलिए करेंगे क्योंकि उन्होंने भारत की एक दृष्टि का समर्थन किया है जो कि भारत के धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक संविधान के विपरीत. यह मोदी और उनके राजनीतिक नेताओं के अभद्र भाषणों से भी स्पष्ट था. असम से देश के बाकी हिस्सों में नागरिकता के राष्ट्रीय रजिस्टर का विस्तार करने और हिंदू, सिखों और बौद्ध आप्रवासियों को नागरिकता देने के लिए नागरिकता कानूनों को बदलने का वादा किया गया था लेकिन मुसलमानों के लिए प्रावधान नहीं किया गया. इसके साथ ही संसद से घृणा फैलाने वाले आतंक-आरोपियों की उम्मीदवारी. मुझे पूरी उम्मीद थी कि बहुसंख्यक भारतीय नफ़रत की राजनीति को खारिज कर देंगे. विपक्ष में कई खामियां थीं. लेकिन जो कुछ भी उनकी असफलताएं और गलतियां हैं, वे अपने अल्पसंख्यकों को भयभीत द्वितीय श्रेणी के नागरिकों में शामिल नहीं करेंगे. वे उस सामाजिक अनुबंध को नष्ट नहीं करेंगे, जिसने भारतीय गणराज्य के संविधान को रेखांकित किया था. एग्जिट पोल के नतीजों की घोषणा के बाद भी मैंने अपनी उम्मीदें जगाई रखी.

लेकिन जैसे ही नतीजे सामने आए, यह स्पष्ट हो गया कि अर्थव्यवस्था में असफलता, रोज़गार और कृषि संकट के बावजूद मोदी का समर्थन शानदार रूप से बढ़ गया था, और भाजपा पहले से ज्यादा प्रचंड बहुमत के साथ जीत दर्ज की. इस बार इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारतीय मतदाताओं के एक बड़े हिस्से ने मोदी के लिए चुना क्योंकि वे उनके जुझारू, आक्रोश और क्रोधी हिंदुत्व के राष्ट्रवाद के प्रति आकर्षित थे. मोदी को उत्तर, मध्य और पूर्व भारत भर के मतदाताओं का जोरदार समर्थन मिला जो भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान के विचारों को उलट कर, प्रमुख हिंदू राज्य के विचार के समर्थक थे

लोग पूछते हैं कि क्या यही भारत का असली चेहरा है? क्या हम एक ऐसे व्यक्ति के रूप में सामने आए हैं जो ऐसे नेताओं को चुनते हैं जो हमारे अंदर की सबसे ख़राब चीज़ों को बाहर आने दे? सबसे उत्तर हां भी है और नहीं भी. भारतीय लोगों ने घृणा और प्रेम, उदासीनता और प्रतिरोध की अपनी क्षमताओं का खुलासा किया है.

हम यहाँ से कहाँ जायेंगे? मेरे लिए निराशा एक विकल्प नहीं है. इस जलती गर्मी में नफरत और भय का मुकाबला करने का एकमात्र तरीका विरोध का एक नया संकल्प है. हमें कठिन, अधिक विचारशील, अधिक सामूहिक रूप से, अधिक दृढ़ संकल्प से लड़ना होगा. हमें कई तरह से विरोध करना होगा — साहस के साथ, दृढ़ता के साथ और प्रेम के साथ.

हमारे प्रतिरोध का पहला स्तंभ हमारे भाइयों और बहनों के साथ एकजुटता से खड़े होने का संकल्प होना चाहिए जो मैं देखता हूं कि चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद मेरे मुस्लिम दोस्तों के चेहरे पर खौफ और निराशा झलक रही थी और मुस्लिम बस्तियों में सन्नाटा पसरा हुआ था. हम आपको और हमारे ईसाई और दलित साथी-नागरिकों को यह विश्वास दिलाते हैं कि हम आपके साथ गलत नहीं होने देंगे. इस देश में करोड़ों ऐसे लोग हैं — हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, नास्तिक, श्रमिक वर्ग, सम्पन्न वर्ग — जो भी बहुसंखयकी घृणा के घोर विरोधी हैं, जो अल्पसंख्यकों और दलितों के खिलाफ हिंसा और अन्याय का मुकाबला करेंगे

हमारे प्रतिरोध का दूसरा स्तंभ धर्मनिरपेक्षता के विचार को पुनः अपनाना, इसका बचाव करने और इसका अभ्यास करना है. यह चिंताजनक और शिक्षाप्रद है कि बड़े पैमाने पर 2019 के जनादेश के बाद अपने पहले सार्वजनिक संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने धर्मनिरपेक्षता को एक मुखौटा करार दिया जो इस जनादेश के बाद नष्ट हो गया है. लेकिन धर्मनिरपेक्षता कोई मुखौटा नहीं है. यह भारतीय गणराज्य की जड़ है. इसके बिना, भारत अपनी आत्मा खो देगा. इस चुनाव अभियान की केंद्रीय विफलता और विश्वासघात यह था कि किसी भी विपक्षी दल ने धर्मनिरपेक्षता शब्द का उल्लेख नहीं किया था, इसके चारों ओर अपने अभियान बनाना तो दूर की बात है. यह भी चिंताजनक है कि प्रगतिशील नागरिक समाज भी पिछले पांच वर्षों में सार्वजनिक रूप से धर्मनिरपेक्ष के रूप में अपनी मान्यताओं को परिभाषित करने की कसौटी पर खरा नहीं उतरा. बँटवारे के समय जब नफ़रत अपने चरम पर थी, तब गांधी, नेहरू, अम्बेडकर और मौलाना आज़ाद द्वारा धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में आवाज़ उठाना — इसे याद करें.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि मोदी के पहले कार्यकाल की तुलना में अब प्रगतिशील विचारों, असहमतियों के सभी रूपों को और भी अधिक बर्बरता से कुचल दिया जाएगा. आरएसएस और बीजेपी के वरिष्ठ नेता राम माधव ने पहले से ही ‘भारत के शैक्षणिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक परिदृश्य’ से ‘छद्म धर्मनिरपेक्ष / उदारवादी ‘ और ‘खान मार्केट कैकोफनी’ को खत्म करने की बात कहने लगे हैं. इसलिए, हमारे पास सार्वजनिक रूप से सच बोलना जारी रखने का साहस होना चाहिए, चाहे इसका परिणाम जो भी हो. प्रमुखतावाद की जलती हुई गर्मी के बीच, सार्वजनिक रूप से और सत्य कहना स्वयं में एक क्रांति, देशभक्ति, और समाजसेवा है.

घृणा और बड़बोलेपन की राजनीति के समय प्रेम की भाषा बोलना भी एक क्रांति है. इसका अर्थ है कि बल और प्रभुत्व का सामना करना और सहानुभूति, विश्वास और भाईचारे को फिर से पैदा करना. हमारी राजनैतिक विचार हमारे निजी जीवन का अटूट हिस्सा होते हैं इसलिए, हमें भाईचारे की समझ और इसके प्रति निश्चय को पैदा करने की लड़ाई लड़नी होगी. यह सभी जगह करना होगा — समुदाय में, स्कूल और कॉलेज़ों में, लिविंग रूम में, न्यूज़ रूम में, टेलीविज़न स्टूडियो में, और परिवार के WhatsApp समूहों में. जिस भाईचारे को 70 साल पहले भारतीय लोगों ने अपने संविधान में लिखा था, आज उस भाईचारे के साथ जीवन सीखने के तरीक़ों को सीखना और अपनाना एक बड़ी चुनौती है.

एक कवि मित्र ने आज सुबह यह मैसेज मेरे मेल-बॉक्स पर भेजा. मैं निराशा और अंधेरे के इस क्षण में आपको, मेरी बहनों, भाइयों और साथियों के साथ इसे साझा करता हूं. जॉन पॉल सार्त्र ने लिखा था, ‘तुम फासीवाद से इसलिए नहीं लड़ना चाहते क्योंकि तुम जीतने वाले हो, तुम फासीवाद से लड़ते हो क्योंकि यह फासीवादी है.’

और अंत में, जैसा कि मार्टिन लूथर किंग जूनियर, जो कि गांधी के बाद दुनिया के सबसे बड़े गांधीवादी हुए, ने हमें याद दिलाया, “नैतिक ब्रह्मांड का आर्क लंबा है, लेकिन यह हमेशा न्याय की ओर झुकता है”

(यह लेख मूलरूप में अंगेज़ी में है जिसे बाद में हिंदी में अनुवाद किया गया है.)

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