कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

26 साल बाबरी के! भाजपा पर कृपा नहीं बरसाएंगे रामजी, जानिए क्यों

इस बात के पूरे आसार हैं कि 2019 का लोकसभा चुनाव बीजेपी राममंदिर के मुद्दे पर लड़ेगी. लेकिन, संयोग या दुर्योग से उसके सामने ठीक वही चुनौती है, जिसका सामना उसे 1993 में करना पड़ा था और जिसके आगे उसका राम रथ यूपी में फंस गया था. सपा-बसपा गठबंधन उसके रास्ते में कितनी बड़ी अड़चन बनेगा?

6 दिसंबर 1992 की सर्द सुबह को अयोध्या में जबर्दस्त तनाव था. एक तरफ कारसेवकों का जमावड़ा था, जो जमीन को समतल करने के लिए वहां इकट्ठा था, तो दूसरी तरफ सुरक्षा बलों की भारी तैनाती थी. बीजेपी और आरएसएस के शिखर नेतृत्व के कई लोग वहां इकट्ठा थे. कोर्ट के आदेश के मुताबिक वहां यथास्थिति बनाए रखने का दायित्व प्रशासन का था. लेकिन, जब हजारों की संख्या में कारसेवक बाबरी मस्जिद पर चढ़ गए और अपने साथ लाए औजारों से गुंबदों को गिराने लगे, तो प्रशासन ने अपनी नजरें दूसरी ओर कर लीं. जाहिर है कि उत्तर प्रदेश में उस समय की कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने जो चाहा वही हुआ, क्योंकि केंद्र की नरसिंह राव सरकार ने हस्तक्षेप नहीं किया. केंद्रीय सुरक्षा बल हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे. शाम होते होते मस्जिद के गुंबद गिर चुके थे. दीवारें ध्वस्त हो चुकी थीं. बस एक मिट्टी का ढेर बच गया था, जहां राम की मूर्ति रखकर पूजा शुरू कर दी गई. उस दिन अयोध्या में न्यायपालिका और संविधान दोनों किसी कोने में दुबके, सहमे खड़े थे.

1949 में बाबरी मस्जिद के अंदर राम की मूर्ति रखे जाने के बाद से ही अयोध्या में राममंदिर बनाने की मांग चल रही थी. राजीव गांधी की सरकार ने 1986 में अयोध्या में मस्जिद का ताला खुलवा दिया. कांग्रेस शासन में ही 1989 में अयोध्या में विवादित भूमि के पास राममंदिर के शिलान्यास की इजाजत दे दी गई. कांग्रस उस समय तक मंदिर के आंदोलनकारियों और मुसलमानों को एक साथ मैनेज करने की कोशिश कर रही थी. राजीव गांधी ने अयोध्या से अपने लोकसभा चुनाव अभियान की शुरूआत की और भारत में राम राज्य लाने का वादा किया. लेकिन, कांग्रेस की मंशा कभी पूरी नहीं हुई. राममंदिर पर सवारी करते हुई बीजेपी मजबूत होती चली गई और कांग्रेस 1989 में केंद्र में सरकार नहीं बना पाई.

बहरहाल, 6 दिसंबर 1992 को, अयोध्या से थोड़ी दूर लखनऊ में राजनीतिक घटनाक्रम शक्ल ले रहा था. बीजेपी को लगा कि मस्जिद गिराने के बाद इसका श्रेय भी तो लेना होगा. मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने उसी रोज इस्तीफ़ा दे दिया और उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग गया. इसके कुछ दिनों बाद ही नरसिंह राव सरकार ने बीजेपी शासित तीन और राज्यों – मध्य प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश की सरकारों को बर्खास्त करके वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया.

सामान्य राजनीतिक ज्ञान ये कह सकता है कि राममंदिर को लेकर अपनी चार सरकारों का बलिदान देने का बीजेपी का फैसला एक मास्टर स्ट्रोक था. राजनीतिक विश्लेषकों में लगभग आम राय थी कि बीजेपी को बाबरी मस्जिद गिराए जाने का राजनीतिक लाभ मिलेगा और सबसे ज्यादा लाभ उत्तर प्रदेश में मिलेगा क्योंकि, अयोध्या के यूपी में होने के कारण राज्य में राममंदिर को लेकर भारी तूफान मचा हुआ था. टूटी हुई बाबरी मस्जिद के ईंट के टुकड़े देश भर में ट्रॉफी की तरह घुमाए जा रहे थे. मुंबई में बम धमाके हुए और साथ ही बड़े पैमाने पर हिंसा भी हुई. यूपी में भी जबर्दस्त दंगे हुए.

आजादी के बाद विभाजन से जुड़े दंगों को छोड़ दें तो देश में सांप्रदायिक तापमान इतना गर्म पहले कभी नहीं था.

लेकिन, क्या बीजेपी को इसका कोई फायदा मिला?

बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद देश में पहला बड़ा चुनाव 1993 की सर्दियों में हुआ. पूर्वोत्तर के राज्यों को राममंदिर आंदोलन से दूर मान लें तो जिन पांच राज्यों में चुनाव हुए उनके नतीजे ये नहीं साबित करते कि राममंदिर आंदोलन की गर्मी का बीजेपी को कोई राजनीतिक लाभ मिला. अपेक्षाकृत छोटे राज्य दिल्ली में बीजेपी ने ये चुनाव जीत लिया. लेकिन उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में से किसी भी राज्य में उसे बहुमत नहीं मिला. ये वे चार राज्य हैं, जिसके बारे में बीजेपी कह रह थी कि राम मंदिर के कारण उन्होंने अपनी सरकारों को यहां शहीद कर दिया था.

इनमें से अलग-अलग राज्यों के नतीजों को देखें तो सबसे दिलचस्प नतीजे उत्तर प्रदेश के रहे. अयोध्या यूपी में है और राममंदिर आंदोलन का सबसे ज्यादा असर भी इसी राज्य में रहा. 1990 के विधानसभा चुनाव में यूपी में भाजपा को 422 में से 227 सीटे मिली थीं और पूर्ण बहुमत पाकर कल्याण सिंह के नेतृत्व में सरकार चल रही थी. लेकिन, 1993 में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने चुनावी तालमेल कर लिया. इस गठबंधन का नारा बना- मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम. चुनावी नतीजे इस नारे के ही अनुरूप रहे. भाजपा की सीटें इस चुनाव में घटकर 177 पर रह गईं. सपा को 109 और बसपा को 67 सीटे मिलीं और सेकुलर पार्टियों के समर्थन से मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बने.

मध्यप्रदेश में कांग्रेस को 320 में से 174 सीटें मिलीं और उसकी पूर्ण बहुमत की सरकार बन गई. जबकि, पिछली विधानसभा में बीजेपी को 220 सीटे मिली थीं और उसकी भारी बहुमत वाली सरकार थी. 1993 में उसकी संख्या घटकर 117 रह गई.

हिमाचल प्रदेश में 68 सीटों के लिए चुनाव हुए, जिसमें से कांग्रेस को 52 सीटें और बीजेपी को सिर्फ 8 सीटे मिलीं. 1990 में हिमाचल प्रदेश में 46 विधायकों से साथ बीजेपी की सरकार थी.

राजस्थान में हालांकि बीजेपी को बहुमत नहीं मिला, लेकिन 95 सीटों के साथ वह सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और उसने निर्दलीय विधायकों के समर्थन से सरकार का गठन किया.

1993 के विधानसभा चुनाव ने इस बात को साबित कर दिया कि राममंदिर का मुद्दा हमेशा और हर जगह बीजेपी के लिए जादू कर दिखाए, ये जरूरी नहीं है.

अब एक बड़ा सवाल- 2019 में क्या होगा?

अगले लोकसभा चुनाव से पहले राममंदिर का मुद्दा एक बार फिर से गर्म किया जा रहा है. आरएसएस ने सरकार से मांग की है कि कानून बनाकर अयोध्या में राममंदिर का निर्माण किया जाए. भाजपा के बड़े नेता इस बारे में लगातार बयानबाजी कर रहे हैं. यूपी सरकार अयोध्या में राम की मूर्ति लगाने वाली है. जमीनी स्तर पर देशभर में भाजपा अपने कार्यकर्ताओं को राममंदिर आंदोलन के लिए तैयार कर रही है.

ऐसे में अब कोई शक नहीं रह गया है कि 2019 का लोकसभा चुनाव भाजपा राममंदिर के मुद्दे पर लड़ेगी. लेकिन संयोग या दुर्योग से उसके सामने ठीक वही चुनौती है, जिसका सामना उसे 1993 में करना पड़ा था और जिसके आगे उसका राम रथ फंस गया था. यूपी में इस बार फिर से उसके सामने सपा और बसपा का गठबंधन है. इस गठबंधन की ढीली-ढाली तस्वीर सामने आने के बाद से ही यूपी के चुनावों में बीजेपी का सिक्का चलना बंद हो गया. इस दौरान हुए तीनों लोकसभा उपचुनाव भाजपा हार चुकी है. इसमें गोरखपुर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की, फूलपुर उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की और कैराना पार्टी के बड़े नेता हुकुम सिंह की सीट थी. कैराना में तो हिंदुओं के तथाकथित पलायन के नाम पर सांप्रदायिकता भी उबाल पर थी. लेकिन, ये सभी सीटें भाजपा के हाथ से निकल गईं. गोरखपुर में तो बीजेपी अरसे बाद चुनाव हारी है.

तो क्या 2019 में उत्तर प्रदेश में 1993 का किस्सा दोहराया जाएगा? जिस यूपी में बीजेपी को 2014 में 71 सीटें मिली थीं, वहां उतनी ही बड़ी जीत हासिल किए बगैर क्या 2019 में भाजपा केंद्र में बहुमत हासिल कर पाएगी? क्या भाजपा सांप्रदायिक तापमान को 1993 से भी ज्यादा बढ़ा पाएगी, ताकि सपा और बसपा का गठबंधन बेअसर हो जाए? क्या भाजपा सपा और बसपा को गठबंधन करने से रोक पाएगी या इन दलों में कोई बड़ी टूट हो पाएगी?

इन सवालों में ही देश की राजनीति का भविष्य छिपा है.

( लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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