कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

कानूनी ख़र्च न उठा पाने की वजह से असम के डिटेंशन कैंप में एक व्यक्ति की मौत

पिता भारतीय नागरिक थे और बेटे को विदेशी घोषित कर दिया गया।

असम के तेज़पुर के एक डिटेंशन कैंप में 65 वर्षीय जब्बार अली की बीते गुरुवार रात को मृत्यु हो गयी। जब्बार अली को विदेशी घोषित कर डिटेंशन कैंप में भेज दिया गया था और ग़रीबी के कारण वे कानूनी लड़ाई लड़ने में भी असमर्थ थे। शुक्रवार को अली का शव उदलगुरी ज़िले में रह रहे उनके परिवार को सौंप दिया गया।

ग़ौरतलब है कि दर्रांग ज़िले में एक विदेशी ट्रिब्यूनल के निर्णय के अनुसार दो बच्चों के पिता अली को 2015 में विदेशी घोषित कर डिटेंशन कैंप में रखा गया था। गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने भी उसी वर्ष इसकी समीक्षा के लिए दायर की गई याचिका को खारिज कर दिया था।

द टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट के अनुसार अली दमा के मरीज़ थे। बुधवार को उनकी हालत बिगड़ने लगी, जिसके बाद जेल अधिकारियों ने उन्हें कनकलता सिविल अस्पताल में भर्ती करवा दिया, जहां उनकी एक दिन बाद मृत्यु हो गई।

अली के वकीलएम यू महमूद ने द टेलीग्राफ को बताया कि अली के पिता का नाम 1951 के राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) और उसके बाद के सभी मतदाता सूचियों में होने के बावजूद उन्हें न्यायालय द्वारा विदेशी घोषित कर दिया गया था।

ऑल असम माइनॉरिटीज़ स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष अज़िज़ुर रहमान ने कहा, “राज्य सरकार अली का शव उनके परिवार को सौंप कर मामले से अपने पल्ला झाड़ रही है। अगर सरकार इतने अच्छे से जानती कि अली धनश्री खुटी में रह रहे उस परिवार से ताल्लुक़ रखते हैं तो उन्हें डिटेंशन कैंप में रखा ही क्यों गया?”

रहमान ने यह भी बताया कि शुरुआत में धनश्री खुटी के लोग अली का जनाज़ा निकालना से इनकार कर रहे थे और उनकी मांग थी कि पहले पुलिस अधीक्षक और उदलगुरी के पुलिस उपायुक्त उनके गाँव में आकर घोषणा करें कि अली विदेशी नहीं थे। रहमान ने अपनी बात पर ज़ोर देते हुए कहा कि आख़िरकार जनाज़ा पुलिस के दबाव में आकर निकाला गया।

गुवाहाटी में रह रहे वकील अमन वदूद ने अपने ट्वीट के ज़रिये पूरे मामले को स्पष्ट किया और इस बात पर ज़ोर दिया कि, “एक बंदी के शव को अंत में परिवार वालों को सौंपना ही हैतो जिंदा रहते हुए क्यों नहीं??”

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