कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

क्या लोकसभा चुनाव में भाजपा के प्रचार का ज़िम्मा अजीत डोभाल को भी दिया गया है?

यह विचित्र बात ही होगी अगर अपने बेटे शौर्य डोभाल को लोकसभा टिकट दिलाने के लिए पिता अजीत डोभाल को पैरवी करनी पड़ रही है. कहीं इसीलिए तो वह भाजपा को सत्ता में बरसों-बरस बने देखना नहीं चाहते?

एक हैं अजीत डोभाल. हैं तो वह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए). चूंकि उनकी नियुक्ति ही प्रधानमंत्री से निकटता के कारण हुई थी लिहाज़ा उन्हें राजनीतिक बयानबाज़ी करने की खुली छूट मिली हुई है. बीते गुरुवार को सरदार पटेल मेमोरियल लेक्चर के दौरान उन्होंने कहा कि भारत को अगले दस वर्षों तक एक सशक्त सरकार की दरकार है. भारत को “हार्ड पावर” रहने की ज़रूरत है. जैसा मैंने पहले ही कहा, उन्हें एनएसए का पद प्रधानमंत्री से अगाध प्रेम की वज़ह से मिला है, तो उनसे प्रशासकीय शुचिता की उम्मीद करना बेमानी होगी. जिसकी नियुक्ति ही राजनीति से प्रेरित रही है, वह क्यों न राजनीतिक बयानबाज़ियां करे? अगर वह एक डेग आगे बढ़कर यह भी कह जाते कि सशक्त सरकार सिर्फ नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ही दे सकती है, तब भी कोई हैरत न थी.

अजीत डोभाल से उनके राजनीतिक पक्ष पर बहस करना दीवार पर सिर मारने जैसा होगा. लेकिन उनका मूल विचार बहस तलब है कि भारत के लिए टिकाऊ, सशक्त और पूर्ण बहुमत की सरकारें ज़रूरी हैं. अजीत डोभाल का यह बयान दक्षिणपंथियों की पारंपरित दिक़्क़त को ही परिलक्षित करता है- वह कि तथ्यों का बयानों से मेल नहीं खाते.

अर्थव्यवस्था पर एक नज़र

अर्थव्यवस्था के पैमाने पर डोभाल के बयान की पड़ताल इसीलिए ज़रूरी है क्योंकि हमसब अपने विचारों में पक्षधर हो सकते हैं लेकिन आंकड़ें सटीक तस्वीर बयां करेंगे.

1952 से लेकर 1989 तक (1970 के उत्तरार्ध में आपातकाल और छोटी अवधि वाली सरकारों को छोड़ दें), मोटा-मोटी भारत ने सशक्त सरकारें ही देखी है. एक वक्त ऐसा था जब गांधी परिवार का ही देश ही राजनीति पर दबदबा था. राजीव गांधी की सरकार तो आज की सरकार से भी ज़्यादा सशक्त थी, जहां 80 फीसदी सांसद कांग्रेसी ही थे.

अब भला सोचिए, अजीत डोभाल भाजपा के मूल राजनीतिक एजेंडे को ही ख़ारिज कर रहे हैं. अगर सशक्त सरकारें ही देश के लिए बेहतर है तो कांग्रेस की सरकारें तारीफ़ योग्य होनी चाहिए. डोभाल के बयान का मतलब है कि पूर्व में पूर्ण बहुमत की कांग्रेस सरकारों ने भारत के विकास में योगदान दिया है. फिर भाजपा का यह कहना कि 65 वर्षों में विपक्ष की सरकारों ने कुछ नहीं किया, इस भाजपाई दावे को तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ही नकार दे रहे हैं. जबकि हक़ीक़त है कि भाजपा की साढ़े चार साल की सशक्त सरकार ने अर्थव्यवस्था चौपट कर दी है. बैंकों की हालत ख़स्ता है. सरकारी और प्राइवेट बैंकों को मिलाकर, मार्च 2018 तक एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स) का टीला 10 लाख करोड़ पहुंच गया है. रोज़गार दुरुह स्थिति में है. सोशल सिक्योरिटी स्कीमों से लगातार सरकार हाथ खींच रही है.

आज जिस नव-उदारवादी अर्थव्यवस्था पर भारत सवार हैं उसकी नींव कौन सी सरकार रखी थी, यह सवाल अजीत डोभाल से पूछा जाना चाहिए. 1967 में पूर्ण बहुमत की इंदिरा गांधी सरकार ने उदारवाद की तरफ़ मुड़ना चाहा था लेकिन वह मुड़ न सकीं. 1985 में भी राजीव गांधी की सरकार ने अर्थव्यवस्था में बदलाव करने की कोशिश की, उन्हें छोटे-छोटे सुधार नीतियों से ही संतुष्ट होना पड़ा. वह पहली बार नरसिम्हा राव की सरकार थी, जिसमें मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे, उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था को पलट दिया. भारत में नव-उदारवाद की नींव उन चंद्रशेखर और नरसिम्हा राव की सरकारों ने डाला, जो गठबंधन की भी सरकारें थी. अल्पमत और अस्थिर सरकारें भी थी.

नव-उदारवादी अर्थ नीतियों की अपनी आलोचना हो सकती है लेकिन अजीत डोभाल जिस ज़माने में और जिस सरकार की तारीफ़ में क़सीदे पढ़ रहे हैं, वह ‘फ्री मार्केट’ में यक़ीन करने वाली सरकार है.

“सपनों का भारत: 2030”

दरअसल ऑल इंडिया रेडियो द्वारा आयोजित सरदार पटेल मेमोरियल लेक्चर का विषय था “सपनों का भारत-2030”. उन्होंने एक और दिलचस्प बात कही कि, “इस वक्त देश को बाहरी (शत्रु) शक्तियों के मुक़ाबले अंदर की (शत्रु) शक्तियों से ज़्यादा ख़तरा है.”

सीधा प्रश्न तो यही उठता है कि जब देश को अंदर की शक्तियों से ही ज्यादा ख़तरा है तो फ्रांस, रूस, अमरीका और इसराइज़ल से हथियार, गोला-बारूद खरीदने में देश के राष्ट्रीय कोष की बर्बादी क्यों की जा रही है?

यह अजीत डोभाल को मिले राजनीतिक सह का ही नतीजा है कि वह सरकार के नैरेटिव का सार्वजनिक मंचों से प्रसार कर रहे हैं. जिस तरह से सरकार की एजेंसियों ने स्वयंसेवी संस्थाओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को ‘अर्बन नक्सल’ और ‘राष्ट्रद्रोही’ कहने की मुहिम चला रखी है, मालूम पड़ता है जैसे देश को सबसे बड़ा ख़तरा सामाजिक कार्यकर्ताओं से ही है. यह एक ख़तरनाक चलन है जहां अहसहमतियों को नफ़रतगर्दी बताकर किनारे लगाने की कोशिश की जा रही है. दुखद यह भी है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के बयानबाज़ियों पर सरकार की ओर से उन्हें कोई चेतावनी भी नहीं दी गई. वैसे सरकार तो तब वरिष्ठ नौकरशाह को फटकार लगाती जब वह खुद राजनीति शुचिता के पैमानों पर खरा उतरती!

‘अंदर के शत्रु’ और ‘बाहरी शत्रु’ जैसी शब्दावलियां इंदिरा गांधी सरकार में सुनाई पड़ते थे. विपक्ष और असहमत आवाज़ों को दरकिनार करने के लिए सरकार खेमेबंदी किया करती थी. कहीं अजीत डोभाल अपने बयान से आपातकाल की आहत की पुनरावृत्ति तो नहीं कर रहे हैं?

इस वक्त डोभाल की चिंता सीबीआई में हो रही उठापटक होनी चाहिए थी. किस तरह से सीबीआई मुख्यालय में आधी रात को आपाधापी मची और देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी में घपले की बात सामने आई. ध्यान रहे यह एक सशक्त और स्थिर सरकार के दौरान हुआ है. अगर केन्द्रीय जांच एजेंसी के भीतर सबकुछ ठीक नहीं है तो देश में सबकुछ ठीक नहीं कहा जा सकता है.

अजीत डोभाल को मालूम होना चाहिए कि भारतीय संविधान के प्रावधानों के मुताबिक भारत में लोकतांत्रिक सरकारें पांच साल के लिए चुनी जाती हैं. किसी भी सरकार के दस साल सत्ता में बने रहने के लिए दो चुनाव झेलने होंगे. इसीलिए उन्हें प्रधानमंत्री और वर्तमान सरकार के वादों का 2019 से 2022 गोलपोस्ट शिफ़्ट करने जैसे जुमलों से बचना चाहिए. खासकर तब तो और जब उन्हें यह मालूम है कि प्रधानमंत्री के करीबी अफ़सरों (जो गोधरा कांड के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री के आदेशों को पालन कर रहे थे) का क्या हश्र हुआ है.

कश्मीर और पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद, नक्सलवाद, अलगाववादी आंदोलन और आंतकवादी गतिविधियों से देश की सुरक्षा में बतौर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का क्या योगदान रहा- इन पैमानों पर उन्हें परखा जाएगा. अब यह विचित्र बात ही होगी अगर अपने बेटे शौर्य डोभाल को लोकसभा टिकट दिलाने के लिए पिता अजीत डोभाल को पैरवी करनी पड़ रही है. कहीं इसीलिए तो वह भाजपा को सत्ता में बरसों-बरस बने देखना नहीं चाहते?

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।)


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