कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

अलीगढ़ में पुलिस ने छात्रों पर चलाए स्टन ग्रेनेड, इस बर्बर कार्रवाई को समर्थन दे रहा विश्वविद्यालय प्रशासन

स्टन ग्रेनेड का इस्तेमाल युद्ध जैसे हालात में किया जाता है. छात्रों के प्रदर्शन को रोकने के लिए कभी भी इसका इस्तेमाल नहीं होता.

अलीगढ़ के एक अस्पताल में एक युवा रिसर्च स्कॉलर बेड पर शांत पड़े हुए थे. उनके भीतर के साहस और गंभीरता को नहीं भांप पा रहा था. मात्र दो रात पहले पुलिस के एक हमले में उनका पंजा बुरी तरह जख़्मी हो गया था. उन्हें बचाने के लिए डॉक्टरों ने उनका हाथ काट कर अलग कर दिया. फिलहाल इस युवक की सबसे बड़ी चिंता थी कि वह इस घटना के बारे में अपनी मां से कैसे बताएगा. क्या उसकी मां अपने बेटे की यह हालत बर्दाश्त कर पाएगी.

यहां पहुंचने से थोड़ी देर पहले हमने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में लॉ की पढ़ाई कर रहे एक 19 वर्षीय छात्र से मुलाकात की थी. यह छात्र कैम्पस के बाहर रहकर पढ़ाई करता है. 15 दिसंबर की रात को वह लाइब्रेरी से निकलकर अपने कमरे पर जा रहा था तभी पुलिस ने विश्वविद्यालय पर धावा बोल दिया. यह उन कुछ बदनसीब लोगों में से एक था थे जिन्हें पुलिस ने बुरी तरह पिटाई करके हाथ तोड़ देने के बाद हिरासत में ले लिया था. इस छात्र का कहना है कि पुलिस वालों ने ट्रक में ले जाते समय उनके ख़िलाफ़ सांप्रदायिक टिप्पणी की और टूटे हुए हाथ को पकड़कर बेरहमी से मरोड़ दिया. थाने में पुलिस ने उन्हें नंगा करके मारा. इस छात्र ने अपने जख़्म हमसे दिखाए.

इन सबके बावजूद भी यह छात्र पुलिस के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराने को तैयार नहीं था. कई छात्रों ने हमसे कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने धमकी दी है कि शिकायत करने पर उन्हें निलंबित कर दिया जाएगा और उनके ख़िलाफ़ राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर मुक़दमे लाद दिए जाएंगे. इसी कारण से पुलिस हमले में घायल बहुत से छात्रों ने सरकारी अस्पताल में अपना ईलाज नहीं कराया ताकि उनका नाम सरकारी रिकॉर्ड में ना आ सके.

पुलिस की इस कार्रवाई के अगले दिन ही 17 दिसंबर को एक टीम का हिस्सा बनकर मैंने अलीगढ़ का दौरा किया. इस टीम में मेरे साथ जॉन दयाल, नंदिनी सुंदर, नताशा बधवार, विमल और कारवां-ए-मोहब्बत के अन्य कई सहयोगी थे. विश्वविद्यालय के लगभग 100 शिक्षकों और बहुत सारे छात्रों ने हमसे मुलाकात की. इनमें से कई छात्र अस्पताल में अभी तक भर्ती थे. हमारी मुलाकात कुछ डॉक्टर्स के साथ भी हुई. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार और प्रॉक्टर से भी हम मिले.

अपने दौरे में हमने पाया कि अलीगढ़ में पुलिस ने जामिया के छात्रों से भी अधिक बर्बरता की थी. ऐसी बर्बरता हाल के दिनों में किसी दूसरे विश्वविद्यालय में शायद ही देखने को मिला हो. हमने विश्वविद्यालय प्रशासन का ऐसा व्यवहार भी अभी तक नहीं देखा था जिसमें अपने ही छात्रों को क्रूर पुलिस के हवाले कर दिया गया हो.

कैसे शुरू हुई पुलिस की हिंसा

नागरिकता संशोधन बिल के संसद में पास हो जाने के बाद छात्र इसे लेकर लगातार शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे. इसे देखते हुए विश्वविद्यालय के गेट के बाहर भारी संख्या में पैरामिलिट्री फोर्स और रैपिड एक्शन फोर्स की तैनाती की गई थी.

15 दिसंबर की शाम को जब जामिया के छात्रों पर पुलिसिया हमले की सूचना यहां के छात्रों को मिली तो गुस्साए छात्र अपने हॉस्टलों से निकलकर विरोध प्रदर्शन करने लगे. इसके बाद अचानक से रैपिड एक्शन फोर्स के जवान गेट तोड़कर विश्वविद्यालय के भीतर दाखिल हुए और छात्रों पर टूट पड़े. छात्रों के ऊपर लाठीचार्ज किया गया.

अंधेरे में हॉस्टल की तरफ भागते छात्रों का पुलिस ने पीछा किया और हॉस्टल, गेस्ट हाउस तक में पहुँच कर आंसू गैस के गोले दागे, स्टन ग्रेनेड फेंके और कथित तौर पर गोलियां भी चलाईं. हमने हेरिटेज मॉरिसन ब्वॉयज हॉस्टल का दौरा किया जहां जवानों ने सुरक्षा कर्मी की पिटाई की थी और छात्रों के कमरे में आंसू गैस के गोले फेंके थे. जब इन छात्रों को बचाने के लिए यूनिवर्सिटी मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर एम्बुलेंस लेकर आए तो रैपिड एक्शन फोर्स के जवानों ने छात्रों को अस्पताल नहीं जाने दिया. एक एम्बुलेंस के ड्राइवर की हड्डियां भी जवानो ने तोड़ दी. छात्रों ने उस रात सेना के जवानों द्वारा तीन घंटे तक की गई बर्बरता हमसे जाहिर की.

पुलिस हिरासत में की गई बर्बरता को दिखाता छात्र. (चित्र साभार: श्रुतिसागर यमुनान)

विश्वविद्यालय प्रशासन का अमानवीय चेहरा

कुलपति का कहना है कि फोर्स यूनिवर्सिटी में उनके बुलाने पर आए. फिर यह बात समझ से परे है कि रैपिड एक्शन फोर्स के जवानों ने यूनिवर्सिटी के दरवाजे क्यों तोड़े? हो सकता है कि जवानों के यूनिवर्सिटी में घुसने को कानूनी मान्यता देने के लिए बाद में यह आदेश दिया गया हो. हिंसा के अगले रोज जब हमने विश्वविद्यालय का दौरा किया था, उस दिन कुलपति शहर से बाहर थे.

मुझे आश्चर्य हुआ कि कैसे यूपी कैडर का एक पुलिस अधिकारी जो अभी सेवा में है, एक विश्वविद्यालय का रजिस्ट्रार बन सकता है. इनका गुरूर देखकर ऐसा बिल्कुल नहीं लगा कि ये छात्रों के संरक्षक हैं. उन्होंने पुलिसिया कार्रवाई को आवश्यक कदम बताया. हल्के  अंदाज में उन्होंने बताया कि जवानों ने स्टन ग्रेनेड का इस्तेमाल भी छात्रों पर किया. ये सभी हथियार दुश्मन के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किए जाते हैं. इनसे दुश्मन को तात्कालिक रूप से दृष्टिविहीन और बहरा बनाया जाता है. कई बार इससे निकलने वाले आग से लोग बुरी तरह घायल हो जाते हैं. एक छात्र ने स्टन ग्रेनेड को आंसू गैस का गोला समझ कर उठाया और इससे उसकी हाथ बुरी तरह जल गई हो. स्टन ग्रेनेड से हॉस्टल के कमरों में आग भी लग सकती थी.

स्टन ग्रेनेड का इस्तेमाल युद्ध जैसे हालातों में किया जाता है. छात्रों के प्रदर्शन को रोकने के लिए कभी भी इसका इस्तेमाल नहीं होता. युद्ध में भी घायलों का ईलाज कराने ले जा रहे एम्बुलेंस को नहीं रोका जाता. छात्र बताते हैं कि उनके ऊपर हमला करते वक्त पुलिस और सेना के जवान जय श्री राम जैसे नारे लगा रहे थे (इस नारे का इस्तेमाल दंगों और मॉब लिंचिंग जैसे कई मामलों में देखने को मिला है). छात्रों के मुताबिक ये जवान छात्रों के स्कूटर और अन्य गाड़ियों में आग भी लगा रहे थे. निश्चित आंकड़ों का अनुमान लगा पाना तो मुश्किल है परन्तु शिक्षकों और डॉक्टर्स के मुताबिक करीब 100 छात्रों को उस रात पुलिस ने उठाया और 100 से अधिक छात्र जख़्मी हुए. इनमें से 20 छात्र गंभीर रूप से घायल हुए थे.

इन घटनाओं के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने फ़ौरन ही हॉस्टल खाली करने का आदेश जारी किया. पुलिस की यह कार्रवाई 15 दिसंबर को हुई थी. हमने 17 दिसंबर की सुबह अलीगढ़ का दौरा किया था. उस समय तक हॉस्टल में रहने वाले ज्यादातर छात्रों को बाहर निकाल दिया गया था. इनमें से बहुत सारे छात्र कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों से भी थे. ये लोग अपने गृह राज्य के असामान्य हालात को देखते हुए बुरी तरह डरे हुए थे. ग़रीब परिवार के छात्रों के पास पैसे नहीं थे कि वे हॉस्टल से बाहर रह सकें या फिर रिजर्वेशन कराकर ट्रेन से वापस अपने घर जा सकें. छात्रों की परिस्थिति पर विचार किए बिना ही विश्वविद्यालय प्रशासन ने हॉस्टल खाली करने का आदेश दे दिया था. यहां तक कि छात्राओं की सुरक्षा की भी फिक्र नहीं की गई. ऐसा लगता है कि प्रशासन का एकमात्र उद्देश्य विश्वविद्यालय को खाली कराकर प्रदर्शन पर रोक लगाना था.

छात्रों को बदनाम करने की कोशिश

हमें आज आत्मचिंतन करने की जरूरत है कि क्यों हमारा देश आज इस मुकाम पर आ गया है. सांप्रदायिक घृणा से भरी पुलिस एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के भीतर घुसकर तोड़फोड़ करती है, छात्रों पर निर्ममता से हमले करती है और विश्वविद्यालय प्रशासन उसका समर्थन करता है. ऐसा लगता है कि मुस्लिम छात्रों की बहुलता वाले दो बड़े विश्वविद्यालयों की आवाज़ को बंद कराने के लिए एक सहमति के तहत ऐसी कार्रवाईयां हो रही हैं. कश्मीर की तरह ही यहां भी इंटरनेट बंद किए जा रहे हैं. प्रधानमंत्री इन प्रदर्शनों को अर्बन नक्सल द्वारा उकसाए जाने पर मुस्लिम छात्रों का विरोध प्रदर्शन बताने की कोशिश करते हैं.

सरकार और पुलिस के इस रवैये पर छात्रों का पलटवार दिल को भरने वाला है. इसे हर क़ीमत पर जारी रखने की जरूरत है. हमारे देश का बहुत कुछ दांव पर लगा है. क्या हम ऐसा राष्ट्र बनाना चाहते हैं जहां छात्रों पर इस तरह से बर्बर कार्रवाई हो? क्या हमारे देश में अल्पसंख्यकों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार होना चाहिए? क्या हम भारत को ऐसा देश बनाना चाहते हैं जहां छात्र अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं उठा सके? हमें रास्ता कौन दिखाएगा?

(लेखक पूर्व आइएएस अधिकारी और जाने-माने मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं. यह लेख मूल रूप से स्क्रॉल डॉट इन के लिए अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित है. इसका हिन्दी अनुवाद कारवां मीडिया टीम के अभिनव प्रकाश ने किया है.)

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