कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

ग्राउंड रिपोर्ट: AMU में छात्रों के साथ अपराधियों-सा बर्ताव, बेरहमी से चले स्टन ग्रेनेड और लाठियां

स्टन ग्रेनेड का इस्तेमाल आतंकी हमलों के वक्त या बहुत नाजुक परिस्थितियों में होता है. छात्रों के साथ कभी इसका प्रयोग नहीं हुआ.

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में हुई हिंसा के विरोध में जब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्रों ने प्रदर्शन किया तब पुलिस ने यहां छात्रों पर बर्बर कार्रवाई की और करीब 100 छात्रों को हिरासत में लिया. 19 वर्षीय छात्र मोहम्मद असजद बताते हैं कि पुलिस ने उन्हें इतना मारा कि बाया हाथ टूट गया. असजद बताते हैं, “मैं लाइब्रेरी से लौटकर अपने कमरे पर जा रहा था. तभी यूनिवर्सिटी के गेट से पुलिस ने मुझे उठा लिया. पुलिस हिरासत में मुझे गालियां दी गई और बेरहमी से मेरे ऊपर बेल्ट बरसाए जा रहे थे. पुलिसवाले मुझे ‘कटुआ’ बोल रहे थे. मुझे तो इस शब्द का अर्थ भी मालूम नहीं था. बाद में दोस्तों ने बताया कि मुसलमानों के लिए यह शब्द गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है.”

पहचान गुप्त रखे जाने की शर्त पर विश्वविद्यालय के एक शिक्षक ने हमें बताया, “पुलिस किसी फासीवादी सेना की तरह छात्रों के साथ पेश आ रही थी. उन्हें देखकर बिल्कुल भी ऐसा नहीं लग रहा था कि वे एक सरकारी कर्मचारी हैं और देश के संविधान से उनका कोई वास्ता हो.”

15 दिसंबर को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्रों पर हुई इस कार्रवाई के दो दिन बाद मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर के साथ एक टीम का हिस्सा बन कर हमने अलीगढ़ का दौरा किया था. इस दौरान हमने इस यूनिवर्सिटी के शिक्षकों, प्रशासन के लोगों तथा छात्रों से मुलाकात की. कई छात्र अभी भी गंभीर हालत में थे तो कई अभी प्रदर्शन कर रहे थे. कुछ छात्र इन घायल छात्रों को मेडिकल और क़ानूनी सहायता देने की कोशिश में लगे थे. हमारी टीम में जॉन दयाल, नंदिनी सुंदर जैसे सामाजिक कार्यकर्ता और मेरे पति भी थे. मेरे पति एक समय में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र रहे हैं.

हमारी टीम ने विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर और रजिस्ट्रार से उनके ऑफिस में, घायल छात्रों से जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के आईसीयू और प्लास्टिक सर्जरी वार्ड में मुलाकात की. इसके बाद हमने कैम्पस में मौजूद कुछ छात्रों से भी बात की.

यूनिवर्सिटी के बाब-ए-सैयद गेट से हम कैम्पस में घुसे. भयानक सन्नाटा था. 15 और 16 दिसंबर को यहां प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स के जवानों ने लाठी, आंसू गैस, स्टन ग्रेनेड और साउंड बम का बर्बर तरीके से इस्तेमाल किया था. प्रशासन का कहना है कि उसे मजबूर होकर पुलिस को कैम्पस में बुलाना पड़ा. यूपी कैडर के आईपीएस अधिकारी और यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार अब्दुल हामिद का कहना था, “विश्वविद्यालय में सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ इस तरह का प्रदर्शन बार-बार ना हो इसके लिए हमें पुलिस को बुलाना पड़ा.” छात्रों पर हमले के तुरंत बाद विश्वविद्यालय बंद करने का फ़ैसला किया गया और छात्रों को कहा गया कि वे 24 घंटे के भीतर हॉस्टल खाली कर दें.

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र सिर्फ पुलिस की कार्रवाई के शिकार ही नहीं हुए, बल्कि कैम्पस से उन्हें बाहर निकालकर भी प्रशासन ने बेसहारा बना दिया. हॉस्टल खाली करने का आदेश तो दे दिया गया, लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा कि कश्मीर और असम जैसे राज्यों के छात्र किस परिस्थिति से होकर गुजरेंगे. ऐसे समय में जब इन राज्यों में ट्रेन और हवाई सफर इतना कठिन हो गया है, ये छात्र अपने घर कैसे पहुंचेंगे?

चित्र साभार: नताशा बधवार

सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि 15 दिसंबर की शाम को पुलिस यूनिवर्सिटी का गेट तोड़कर भीतर घुसी और छात्रों के ऊपर आंसू गैस के गोले बरसाने लगी. हॉस्टल और गेस्ट हाउस तक में घुसकर पुलिस ने छात्रों को मारा और हिरासत में लेकर गई. एनडीटीवी के एक पत्रकार का वीडियो भी सामने आया है, जिसमें एक पुलिसकर्मी छात्रों की बाइकों पर डंडे बरसा रहा है.

यहां कई छात्रों के ऊपर रबर बुलेट और स्टन ग्रेनेड से हमला किया गया था. स्टन ग्रेनेड का इस्तेमाल अमूमन आतंकी हमलों के वक्त या बहुत नाज़ुक परिस्थितियों में किया जाता है. छात्रों के प्रदर्शन में कभी भी इसका प्रयोग नहीं हुआ.

एएमयू के मॉरिसन हॉस्टल का रूम नं 46 पुलिस की बर्बरता का चश्मदीद है. यहां के छात्रों और सुरक्षाकर्मियों का कहना है कि रैपिड एक्शन फोर्स के जवान अचानक से आए और एक बुजुर्ग गार्ड (जिसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी) के ऊपर टूट पड़े. उनके धर्म के ख़िलाफ़ अपमानजनक फब्तियां कसते हुए ये जवान कमरा नं 46 की ओर बढ़े. इस रूम में दो छात्र थे और कमरे का दरवाजा बंद था. जवानों ने गेट को खटखटाया. डर के कारण जब छात्रों ने दरवाजा नहीं खोला तो खिड़की की ओर से कमरे में आंसू गैस के गोले फेंके गए. इन दोनों छात्रों को पुलिस हिरासत में लेकर गई और बुरी तरह पिटाई की गई. यूनिवर्सिटी के करीब 100 छात्रों को पुलिस हिरासत में लेकर गई थी. इनमें से 80 का ईलाज शहर के अस्पतालों में चल रहा है.

स्टाफ क्लब में हमसे बात करते हुए विश्वविद्यालय के एक बुजुर्ग शिक्षक ने कहा, “मैं बायोकेमिस्ट्री विभाग से रिटायर्ड हूँ और इस यूनिवर्सिटी में प्रॉक्टर भी रह चुका हूँ.पुलिस की कार्रवाई बहुत ही अमानवीय थी.”

प्रशासन की कार्रवाई से नाराज़ शिक्षक

बाकी विश्वविद्यालयों की तरह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में भी प्रदर्शन होते रहते हैं. लेकिन, यहां का एक नियम यह है कि जब भी इस तरह का विरोध-प्रदर्शन हो तब विश्वविद्यालय प्रशासन कुछ शिक्षकों को बुलाकर छात्रों के साथ शांति और समझौते की पहल करता है. लेकिन इस बार यूनिवर्सिटी के कुलपति और प्रॉक्टर प्रो. अफिफुल्लाह खान ने इस नियम को ताक पर रखा. इससे शिक्षकों के भीतर भी रोष है.

राजनीति विज्ञान विभाग के शिक्षक डॉ. अफ़ताब आलम ने कहा, “मैं स्टीयरिंग कमेटी का सदस्य हूँ, लेकिन कैम्पस में पुलिस को बुलाने के पहले हमें बताया भी नहीं गया.” छात्रों के ऊपर हुई इस कार्रवाई से कई अन्य शिक्षक भी आहत हैं. जिन छात्रों को चोटें आई हैं वे भी अपना मेडिकल रिपोर्ट नहीं बनवा रहे हैं, क्योंकि प्रशासन ने धमकी दी है कि ऐसा करने पर यूनिवर्सिटी से निष्काषित कर दिया जाएगा.

चूंकि हम एक तथ्य जांच टीम के तौर पर अलीगढ़ गए थे, हमने विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्रों-शिक्षकों के बयानों में काफ़ी अंतर पाया. प्रशासन का कहना था कि पुलिस उसके बुलाने पर कैम्पस में घुसी जबकि छात्र इससे सहमत नहीं थे. छात्रों का कहना था कि पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स के जवान यूनिवर्सिटी का गेट तोड़कर अंदर घुसे थे.

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का यह मेरा दूसरा दौरा था. पहली बार कुछ साल पहले आई थी. मैंने अपने पति से पूछा कि वो यहां के छात्र रहे हैं और इस घटना को किस तरह से देखते हैं. उन्होंने बताया कि कैसे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी यहां पढ़ने वाले हजारों छात्रों के लिए अपने घर जैसा है. आगे उन्होंने कहा कि हम जिन लोगों से सुरक्षा की उम्मीद करते हैं जब वहीं हम पर हमले करने लगे तो क्या होगा?

समय के साथ एएमयू के छात्रों का जख़्म भर जाएगा. जिन छात्रों के लैपटॉप तोड़े गए हैं, वे भी अपना रिसर्च पेपर लिखने के लिए नया लैपटॉप ले लेंगे. लेकिन नागरिकता क़ानून और एनआरसी का विरोध करने वाले छात्रों के ऊपर इस बर्बर पुलिसिया कार्रवाई से छात्रों का जो विश्वास हमारी संस्थाओं ने खो दिया है, वो वापस आ पाएगा?

नताशा बधवार

नताशा बधवार “इमोर्टल फॉर अ मोमेंट” और “माय डॉटर्स मम” जैसे पुस्तकों की रचनाकार हैं. यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लाइव मिंट में प्रकाशित है. इसका हिन्दी अनुवाद कारवां मीडिया टीम के अभिनव प्रकाश ने किया है.

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