कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

जस्टिस एच आर खन्ना को यह कैसी श्रद्धांजलि?

महेश्वरी और खन्ना की नियुक्ति सर्वोच्च न्यायलय के कॉलेजियम के पिछले निर्णय को पलट कर की गई.

इस कहानी की शुरुआत एक ऐसे आदमी से होती है जो एक तानाशाही सरकार के खिलाफ़ और अपने साथ ही के न्यायाधीशों के खिलाफ़ खड़े हुए थे और अपना मतभेद जताते हुए कहा था कि आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों पर रोक नहीं लगाई जा सकती. उनका यह आदेश हेबियस कॉर्पस जजमेंट के नाम से जाना जाता है. उन्हें उनके इस चौंका देने वाली सत्यनिष्ठ के लिए सज़ा दी गई — भारत का मुख्य न्यायाधीश चुनने की बारी आने पर उन्हें स्थान नहीं दिया गया. एक अन्य न्यायाधीश जिन्होंने उसी मामले में तत्कालीन सरकार के मुताबिक़ अपनी राय रखी, उन्हें ही मुख्य न्यायाधीश बनाया गया. न्यू यॉर्क टाइम्स ने इस इस मामले में एक बात लिखी थी कि “बतौर एक आज़ाद देश, जिस आज़ादी और लोकतंत्र की पहचान के लिए भारत अपनी आज़ादी के पहले 18 साल गौरवान्वित होता था, अगर वह कभी उस तरफ वापस लौटता है तो कोई न कोई ज़रूर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एच आर खन्ना के लिए एक स्मारक का निर्माण करेगा.” जस्टिस खन्ना इकलौते ऐसे जज हैं जिनकी तस्वीर उनके जीवनकाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट में लगाई गई.

“कर्नाटक उच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश एग्जीक्यूटिव का कहा करने के लिए बहुत इच्छुक रहे हैं.” यह उस चिट्ठी का एक अंश है जो सेवानिवृत न्यायमूर्ति जास्ती चेलामेश्वर ने सर्चोच्च न्यायलय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को लिखा था. इसमें जिनका ज़िक्र हुआ है वह कर्नाटक उच्च न्यायलय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दिनेश महेश्वरी हैं. एक अन्य न्यायाधीश को मंज़ूरी देने को लेकर न्यायाधीश महेश्वरी के कृत्यों के बारे में बताते हुए न्यायमूर्ति चेलमेश्वर ने एक वाक्य का इस्तेमाल किया था – ‘मोर लॉयल दैन द किंग’ (राजा से भी ज़्यादा वफ़ादार). इस घटना से जुड़ी जानकारी इन्टरनेट पर मौजूद है और उसे यहां संक्षिप्तता बनाए रखने के लिए दोहराया नहीं जा रहा है.

न्यायाधीश महेश्वरी के उम्मीदवारी को कॉलेजियम द्वारा अनदेखा करने के कुछ ही समय के अन्दर उन्हें अब बतौर सर्वोच्च न्यायलय के जज नियुक्त कर दिया गया है. इस बात को बहुत ज़्यादा वक़्त नहीं बीता है जब नरेन्द्र मोदी की सरकार ने सर्वोच्च न्यायलय में न्यायमूर्ति के. एम. जोसफ की नियुक्ति का विरोध यह कहते हुए किया था कि वरिष्ठता काफी नहीं है. उसके बाद उन्हें ऑल इंडिया सेनिओरिटी लिस्ट में 42वे नंबर पर रखा गया. लेकिन वे उत्तराखंड उच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश थे. जस्टिस खन्ना के भतीजे, जस्टिस संजीव खन्ना को बतौर सर्वोच्च न्यायलय के जज नियुक्त किया गया है. जस्टिस खन्ना की इस नियुक्ति के लिए 32 जजों का अधिक्रमण हुआ है. इतना ही नहीं है. महेश्वरी और खन्ना की नियुक्ति सर्वोच्च न्यायलय के कॉलेजियम के पिछले निर्णय को पलट कर की गई है.

इन घटनाओं से कई न्यायविद हैरान और आक्रोशित हुए. न्यायमूर्ति चेलमेश्वर और पूर्व मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा जैसे न्यायविदों ने कॉलेजियम के पिछले फैसले को पलटने और इन नियुक्तियों के खिलाफ़ असहमति जताई है. सेवानिवृत न्यायाधीश कैलाश गंभीर ने भारत के राष्ट्रपति को इन जजों के औपचारिक एवं अंतिम नियुक्ति से पहले एक चिट्ठी लिखी. उन्होंने निवेदन किया कि एक और ‘ऐतिहासिक भूल’ होने से बचाया जाए. यह भूल, अगर यह भूल है तो, की जा चुकी है क्योंकि उन जजों को नियुक्त कर लिया गया है.

न्यायमूर्ति गंभीर की यह चिट्ठी उन ‘कानून के गलियारों की बातों’ को लेकर है जिसमें यह कहा जा रहा है की संजीव खन्ना की नियुक्ति जस्टिस एच आर खन्ना को श्रद्धांजलि है. उन्होंने इन ‘बातों’ पर कोई टिप्पणी नहीं की लेकिन यह मेरा मत है की यह तर्क दोनों जजों के लिए क्षतिपूर्ण है. क्या एच आर खन्ना के साथ रिश्ता होने की वजह से न्यायाधीश संजीव खन्ना को यह नियुक्ति एक उपहार स्वरूप दी गई है? और यह उस व्यक्ति को दी गई किस तरह की श्रद्धांजलि है जिन्होंने एक विस्सम्मत निर्णय दिया और, उनके अपने शब्दों के अनुसार, यह भली भांति जानते हुए किया कि ऐसा करके वे बतौर सीजेआई अपना मौका गंवा रहे हैं?

वरिष्ठ एडवोकेट इंदिरा जैसिंग ने सटीक तौर पर इस बात को उठाया कि संभवतः न्यायाधीश संजीव खन्ना उस खंडपीठ का हिस्सा बनेंगे जो राम जन्मभूमि मामले की सुनवाई करेगा.

दुर्भाग्यपूर्ण सच यह है कि जिस तरह न्यायाधीश ए. के. सिकरी की एक अंतर्राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल में नियुक्ति को लेकर सवाल उठ रहे हैं क्योंकि ठीक उससे पहले एक समिति ने सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा के तबादले का आदेश दिया जिसका न्यायाधीश सिकरी हिस्सा थे, ठीक उसी तरह इस सरकार के ख़िलाफ़ या उससे जुड़े नेताओं के खिलाफ़ उस हर मामले पर भी सवालों के बादल मंडराएंगे जिनकी सुनवाई में न्यायाधीश खन्ना शामिल रहेंगे.

न्यायाधीश रंजन गोगोई उस अभूतपूर्व और प्रसिद्द प्रेस वार्ता का हिस्सा थे जो पिछले साल किया गया था, जहां चार जजों ने मिलकर सबको कहा था की लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था खतरे में है. क्या इन घटनाओं ने लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था को सुरक्षित किया है?

न्यायमूर्ति गंभीर की चिट्ठी से एक आख़िरी उद्धरण : जस्टिस एच आर खन्ना ने लिखा था, “अगर हमारा संविधान एक ऐसी विरासत है जो हमारे पूर्वजों द्वारा हमें दी गई है, तो हम, भारत के लोग, उसके प्रावधानों के मूल्यों के न्यासी और संरक्षक हैं. संविधान सिर्फ काग़ज़ का चर्मपत्र नहीं है, वह ज़िन्दगी जीने का एक तरीका और उस पर खरा उतरना होगा. इतिहास हमें सिखाता है कि लोगों की मूर्खता हमेशा सत्ता की धृष्टता को न्यौता देती है.

क्या भारत की जनता अपने संविधान और अपने संस्थानों की रक्षा करने में सक्षम रहेंगे या सत्ता की धृष्टता जारी रहेगी? यह हमें जल्द ही पता चल जायेगा.

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में मुंबई मिरर में प्रकाशित हुई है. न्यूज़सेंट्रल24X7 ने इसका हिन्दी अनुवाद किया है. मूल लेख को यहां क्लिक करके पढ़ा जा सकता है.)

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