कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

अनुच्छेद 370 को हटाने से भारत को पहुंचेगी गहरी क्षति, जानें क्यों

भाजपा सरकार की इस कोशिश ने भारत की अंतर्राष्ट्रीय छवि को भी काफ़ी धूमिल किया है.

मोदी सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 को खत्म किए जाने के फैसले को ऐतिहासिक कदम बताया जा रहा है. लेकिन इसका एक स्याह पक्ष भी है. जानकारों की मानें तो इसे हटाने से भारत गहरी क्षति पहुंचेगी, जिसके दूरगामी परिणाम भुगतने होंगे. चलिए जानते हैं कि इस फैसले से हमारे देश को किस प्रकार का नुकसान उठाना पड़ सकता है-

  • पाकिस्तान हमेशा से कहता रहा है कि भारत ने कश्मीर पर अवैध कब्जा किया है. कश्मीर के लोग भारत से पीछा छुड़ाना चाहते हैं. पाकिस्तान का यह भी आरोप रहता है कि जम्मू-कश्मीर में वैसा प्रजातंत्र नहीं है जो भारत के अन्य हिस्सों में है. लेकिन भारत हमेशा से इन आरोपों को खारिज करते आया है. भारत ने हमेशा यह अपना मत रखा है कि जम्मू-कश्मीर में भी प्रजातंत्र है. यहां लोग अपने घरों से निकलते हैं, वोट देते हैं, अपना जनप्रतिनिधि चुनते हैं. लेकिन, पाकिस्तान में बंदूक के नोक पर प्रजातंत्र चलाई जाती है. पाक का प्रजातंत्र झूठा है. लेकिन, यह बात साबित करने में भी भारत को दशकों लग गये.
  • संयुक्त राष्ट्र से लोगों ने आकर जम्मू-कश्मीर के वोटिंग प्रक्रिया को देखा है और प्रमाणित किया कि सच में जम्मू-कश्मीर में लोग अपनी मर्जी का नेता चुन रहे हैं. लेकिन इस एकतरफ़ा फैसले से इस ठोस आधार को चोट पहुंचेगी. अंतर्राष्ट्रीय मीडिया इस बात को स्वीकार नहीं करेगी कि हमने इस फैसले के पीछे किसी प्रकार कश्मीरियों की सलाह ली है. यह प्रजातांत्रिक देश के लिए धक्का है.
  • संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार प्रवक्ता के तरफ़ से मंगलवार को किए गए प्रेसवार्ता से भी यह मामला अंतर्राष्ट्रीय बनता दिख रहा है. यूएन ने कहा कि, “भारत प्रशासित कश्मीर में नवीनतम प्रतिबंध मानवाधिकार चिंता को बढ़ा देंगे. हम दूरसंचार सेवाओं का बंद करना, राजनीतिक नेताओं की गिरफ्तारी और शांतिपूर्ण सभा के रोक जैसे रिपोर्ट को देख रहे हैं. यह प्रतिबंध जम्मू-कश्मीर के लोगों और उनके चुने गए प्रतिनिधियों को राज्य की भविष्य की स्थिति के लोकतांत्रिक बहसों में भाग लेने से रोकेंगे. हम इस पर गहरी चिंता व्यक्त करते हैं.
  • सच्चाई ये है कि जम्मू-कश्मीर की स्थिती 2014 के बाद से यानी की मोदी सरकार के आने के बाद से खराब हुई है. घाटी में आतंकवाद बढ़ा है. सैनिकों की मौत में वृद्धि हुई है. टूरिज्म में कमी आई है. मतदान प्रतिशत जो कभी 60 फीसदी हुआ करती थी वो घटकर 7 फीसदी तक पहुंच गई. कुछ बूथों में एक भी वोट नहीं पड़ा. यह वर्तमान सरकार की नाकामी ही है.
  • भाजपा सरकार की इस कोशिश ने भारत की अंतर्राष्ट्रीय छवि को भी काफ़ी धूमिल किया है. नेताओं को जेल मे डाला गया. फोन व इंटरनेट सेवा बंद कर दिया गया है. अचानक अमरनाथ यात्रा भी बंद करने का भी फैसला लिया गया. भारत ने अपने ही नेताओ को जेल में डाल दिया. संसद में बगैर चर्चा के 1 घंटा में कानून पास कर दिया. सांसदों को कानून पढ़ने तक का समय नहीं दिया गया. कोई बातचीत नहीं होने दी. प्रताप भानू मेहता ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि संसद को सिर्फ एक नोटिस बोर्ड बना दिया गया है. भारत को दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातंत्र माना जाता है. ऐसे में धोखे से बगैर विचार-विमर्श और नेताओं को जेल मे डालकर ऐसा फैसला जल्दबाजी में लिया गया. यह भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए ठीक नहीं है.
  •  भाजपा के ही पूर्व वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा एक डिबेट शो में कहते हैं कि इस अनुच्छेद के हटाने के पीछे वजह आगामी राज्यों का चुनाव है. महाराष्ट्र, झारखंड और जम्मू-कश्मीर में चुनावों को देखते हुए यह फैसला लिया गया है. उन्होंने कहा कि जैसे नोटबंदी उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए किया गया था. वैसे ही यह धारा भी चुनाव जीतने के लिए किया गया है.
  • इस बात का प्रमाण इससे मिलता है कि सोली सौराबजी जैसे कई वकिलों ने कहा है कि धारा 370 को नहीं हटाया जा सकता. इस बात पर सुप्रीम कोर्ट और जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट की जजमेंट है. जिसमें कहा गया था कि यह नहीं हटाई जा सकती. धारा 370 को सिर्फ जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा हटा सकती थी, जो अब नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के तहत धारा 370 संविधान का एक स्थाई हिस्सा बन गई थी. इससे यह पता लगता है कि सुप्रीम कोर्ट सरकार के इस फैसले को रद्द करेगी ही करेगी. लेकिन, तब तक इन राज्यों में चुनाव हो चुके होंगे और तब सरकार खुद को एक पीड़ित बताएगी कि हम राष्ट्रवादी फैसला लेना चाहते थे लेकिन, कोर्ट ने ऐसा नहीं करने दिया.
  • जो लोग इस बात का दुख मनाते हैं कि वो जम्मू में ज़मीन नहीं खरीद सकते. लेकिन, क्या आप जानते हैं कि देश में ऐसे कई राज्य हैं जहां आप ज़मीन नहीं खरीद सकते. जैसे नागालैंड और कई अन्य राज्य. 1947 में जब भारत का एकीकरण हुआ था, तब करीब 500 रियासतों से मिलकर बना था. हर राज्य से अलग तरीके का वादा किया गया था. कई रियासतें इस सशर्त हममें शामिल हुई कि हम उनकी ज़मीन का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे और कश्मीर भी उन्हीं में से एक रियासत है.
  •  जो लोग इतना दुखा बयां कर रहे हैं वो कश्मीर में ज़मीन नहीं ले पाते. उनसे ये जानना जरूरी है कि उनमें से कितने लोग हैं जो कश्मीरियों को अपना घर में किराएदार के तौर पर रखने और बेचने के लिए तैयार हैं. ये एक बार को मान सकते हैं कि भेदभाव है कि हम वहां ज़मीन नहीं खरीद सकते. लेकिन, उसका क्या जो बाकि का भारत खुद भेदभाव करता है.
  • कश्मीरियों, मुसलमानों और नई शादी-शुदा लड़कियों के साथ, बंगालियों के साथ. दिल्ली में बंगालियों को यह कहकर घर नहीं दिया जाता कि ये लोग मछली पकाते हैं. मुसलमानों को इसलिए घर नहीं देते कि ये मांस खाते हैं. जाति देखकर भेदभाव करते हैं. वकील और पुलिसों को घर नहीं देते कि ये कब्जा कर लेंगे. दो लड़कियों को घर नहीं देते कि ये समलैंगिक होंगी. अकेली लड़की को घर नहीं देते कि इसकी सुरक्षा कौन करेगा. भारत के कण-कण में भेदभाव बसा हुआ है. क्या ये कहना सही है कि कश्मीर में सबसे पहले भेदभाव खत्म हो. बाकि भारत मे भेदभाव चलता रहे. यह हमारे दोहरा रवैया को दिखाता है.
  •  एक कश्मीरी को कैसा लगेगा कि उसे पूरे भारत में कहीं रहने की जगह नहीं मिलती. थोड़ी सी बात और शक के आधार पर कश्मीरियों को पीट दिया जाता है. और उसके राज्य में जो उसका हक था वो भी छीना जा रहा है. ऐसे में भारत में रोष और द्वेष बढ़ेगा या कम होगा?
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