कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

देश की एकता को तोड़ने वाली मोदी सरकार ने लोकतंत्र को खोखला कर दिया है- अरुणा रॉय

नोटबन्दी का हवाला देते हुए उन्होंने कहा की इस तरह के फैसलों में लोगों से राय-मशविरा किया जाना चाहिए

“मौजूदा मोदी सरकार कॉरपोरेट हितैषी, देश की एकता को तोड़ने वाली और अलग राय रखने वालों को देशद्रोही करार देने वाली सरकार है”. ये कहना है जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता और सूचना के अधिकार अधिनियम को लागू करवाने के लिए संघर्ष करने वालों में से एक अरुणा रॉय का.

उन्होंने कहा की यहां सरकार से सवाल करने वालों के लिए जगह नहीं है. भीड़ द्वारा हत्या, संवैधानिक संस्थाओं पर बढ़ते हमले, अभिव्यक्ति की आज़ादी पर दमन, अर्बन नक्सल, अच्छे दिन, साक्षरता, महिला सशक्तिकरण, संवैधानिक संस्थाओं पर बढ़ते हमलों जैसे मुद्दों पर उन्होंने चिंता ज़ाहिर की. फ्रंटलाइन को दिए इंटरव्यू में उन्होंने सूचना का अधिकार अधिनियम के ज़रिये होने वाले फायदों को बताते हुए, आरटीआई कार्यकर्ताओं पर बढ़ते हमलों पर चिंता जताई.

भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले लोगों की रक्षा के लिए उन्होंने कड़े नियमों को बनाने की बात कही, साथ ही बीते दस सालों में सूचना के अधिकार अधिनियम के ज़रिये मिली सफलताओं को भी गिनाया.

सरकारी योजनाओं में आधार की अनिवार्यता पर भी उन्होंने कई खामियां बतायीं.

लोकतंत्र में दिन-ब-दिन कम होती जा रही जनता की भागीदारी पर उन्होंने दुख जताते हुए, नोटबन्दी का हवाला देते हुए कहा की इस तरह के फैसलों में लोगों से राय-मशविरा किया जाना चाहिए.

लोकतंत्र में सभ्य समाज के योगदान की ज़रूरत को बताते हुए अरुणा का कहना है कि हाशिये पर खड़े लोगों के लिए देश की सरकार का दायित्व होना चाहिए की वो उनके संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करे. हिंदुत्व और बढ़ते दक्षिणपंथ के विरोध में बोलने वाले नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पंसारे, कलबुर्गी और गौरी लंकेश जैसे स्वतंत्र विचारकों और पत्रकारों की हत्याओं पर उन्होंने चिंता जताई.

गौरतलब है की मौजूदा सरकार पर इससे पहले भी कई लोग लोकतंत्र को ख़त्म करने और विरोधियों को जबरन झूठे आरोपों में जेल में बंद करने के इल्ज़ाम लगाते रहे हैं.

सरकार के तानाशाही रवैय्ये पर अरुणा रॉय के ये विचार सोचने पर मजबूर करते हैं.

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