कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

भरपेट खाने वाले कर रहे मंदिर-मस्जिद की लड़ाई, तो भूखे पेट वाले मंदिर-मस्जिद में देते भाईचारे का परिचय- देखें विडियो

कारवां-ए-मोहब्बत की खास पेशकश समाज की कतार का आखिर व्यक्ति जो अच्छी नींद और भरपेट भोजन की तलाश करता है.

आर्थिक, सामाजिक और हर रूप से वंचित लोग जो हमारे समाज के आख़िरी कतार में खड़ा है वो ऐसे भारत की कल्पना करता है जहां चैन की नींद और भरपेट भोजन मिल सके. कारवां-ए-मोहब्बत द्वारा रैन बसेरों में रहने वाले लोगों के जीवन पर बनाई गई एक शॉट फ़िल्म, यही संदेश देती नज़र आती है.

फ़िल्म ‘कतार में पीछे’ दिल्ली में रहने वाले बेघर लोगों को अपना नायक-नायिका बनाती है. जहां देश मंदिर-मस्जिद के नाम पर सुलग रहा वहीं ये लोग मंदिर-मस्जिद के रहमत ही भाईचारे के परिचय देते हैं. इन बस्तियों में सभी धर्म के लोग आपस में मिल जुलकर रहते हैं.

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर ज़िले के निवासी सत्यवीर गांव से शहर अपनों की तलाश में आए थे. क्योंकि गांव में रोजगार के अवसर खत्म होने के बाद गांव के लोगों को मजबूरन शहरों की ओर पलायन करना पड़ता है. सत्यवीर कहते हैं कि दिल्ली आया था अपनों की तलाश में लेकिन शहर की चकाचौंध में सब खो गया न अपने मिल सकें और न कोई अपना बन पाया.

सामाजिक कार्यकर्ता  के रूप में काम करने वाले सत्यवीर ने बताया कि दिल्ली में उनको बेघर रहना पड़ा. उन्होंने दिल्ली में घर बनाने व शादी-पार्टी में काम कर रोजी-रोटी कमाई. सत्यपीर कहते हैं कि पूरा देश जहां मंदिर, मस्जिद, हिंदू-मुस्लिम के बंटवारे में जलने की कगार पर पहुंच गया है. वहीं ये बेघर लोग हनुमान मंदिर में जाकर पुड़ी-सब्जी खाते हैं, दिन होते मस्जिद में खाना खाने चले जाते हैं. लेकिन जब कहीं कुछ नहीं मिलता तब ये बेसहारा लोग सिखों के गुरुद्वारे जाते हैं और भरपेट खाना खाते हैं. खा-पीकर वापस इन रैन-बसेरों में लौट आते हैं और सो जाते हैं.

इन लोगों से समझा जाए कि ये लोग कैसा भारत चाहते हैं. तो वे लोग एक ही जवाब देंगे कि जहां अच्छी नींद और भरपेट खाना मिलता हो हमें ऐसा भारत चाहिए.

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