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असम एनआरसी: लकवाग्रस्त व्यक्ति को ट्रिब्यूनल के पास हाजिर नहीं होने पर बना दिया गया ‘विदेशी’; सुप्रीम कोर्ट ने राज्य और केन्द्र को भेजा नोटिस

अजीजुल हक़ 24 मार्च, 2017 से ही हिरासत शिविर में क़ैद हैं.

उच्चतम न्यायालय ने विदेशी ठहराए गए लकवाग्रस्त व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई करते हुए असम और केन्द्र सरकार से जवाब तलब किया है. दरअसल, विदेशी ट्रिब्यूनल ने असम में अजीजुल हक़ को विदेशी करार देकर हिरासत शिविर में डाल दिया था. उसके बाद से ही उन पर बांग्लादेश प्रत्यर्पित करने की तलवार लटक रही है. अजीजुल ने इसके विरूद्ध सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

लाइव लॉ के अनुसार दायर किए गए याचिका में अजीजुल ने बताया है, “शरीर के निचले अंग में लकवा के कारण मैं सुनवाई में पेश नहीं हो सका था और अधिकरण ने एकतरफा कार्रवाई करते हुए मुझे विदेशी घोषित कर दिया.”

याचिका में यह भी कहा गया है कि विदेशी ट्रिब्यूनल और गौहाटी हाई कोर्ट ने भी उसे इस आधार पर विदेशी घोषित कर दिया था क्योंकि उसका नाम असम के मसौदा राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) में था और वह या उसका कोई प्रतिनिधि अधिकरण के सामने पेश नहीं हुआ था.

जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए दोनों सरकारों से तीन हफ्ते में जवाब देने को कहा है.

बता दें कि अजीजुल हक़ 24 मार्च, 2017 से ही हिरासत शिविर में क़ैद हैं. इससे पहले गौहाटी उच्च न्यायालय ने मेडिकल सर्टिफिकेट स्वीकार करने के बावजूद अजीजुल हक़ के रिट याचिका को खारिज कर दिया था. मेडिकल सर्टिफिकेट में हक़ लोअर लिम्ब पैरालिसिस सें पीड़ित प्रमाणित होते हैं. साथ ही राष्ट्रीय नागरिक पंजी(एनआरसी) और असम नागरिक पंजी(एआरसी) के मसौदे में अजीजुल हक़ के साथ उनका परिवार का नाम है.

याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि, “विदेशी अधिकरण के साथ गौहाटी उच्च न्यायालय ने भी यह विचान नहीं किया कि अजीजुल हक़ ने अपने दादा के नाम से बने ‘जमाबंदी’ दस्तावेज को भी पेश किया था जिसे 1941-42 में नागांव उपायुक्त द्वारा जारी किया गया था. इसके साथ ही 1956 के मतदाता सूची में अपने दादा-दादी और माता-पिता के नाम भी दिखाए.

असम में एनआरसी लागू करने की प्रक्रिया मुद्दों से व्याप्त रहा है. कारगिल युद्ध की लड़ाई लड़ चुके सेना के रिटार्यड सूबेदार मोहम्मद सनाउल्लाह को विदेशी करार दिया गया था. एक प्रशासनिक चूक के वजह से उन्हें हिरासत शिविर में भेज दिया गया. बाद में मामला मीडिया में सुर्खियां बटोरा और सनाउल्लाह को रिहा किया गया.

एनआरसी का पहला मसौदा 2018 में प्रकाशित हुआ, जिसमें 40 लाख लोगों का नाम उसमें शामिल नहीं किया गया. जुन, 2019 में भी जारी किए गए सूची में तकरीबन एक लाख लोगों का नाम बहिष्करण सूची में हैं.

स्क्रॉल की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, विदेशी ट्रिब्यूनल के प्रदर्शन का मूल्यांकन ‘विदेशी’ घोषित किए गए लोगों की संख्या के आधार पर किया जा रहा है, जो ऐसी प्रक्रिया को बल दे रहा है. रिपोर्ट में ट्रिब्यूनल के एक पूर्व सदस्य ने यह भी बताया है कि निमिष चश्मे के माध्यम से देखें तो हर व्यक्ति को तकनीकी आधार पर विदेशी करार दिया जा सकता है.

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