कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

कैमरे में हिमा दास का इतिहास है, उसकी जीत के क्षणों की रिकॉर्डिंग नहीं : रवीश कुमार

हम उन पलों में हिमा को नहीं देख पाते हैं जब वह अपनी शक्तियों को बटोरते हुए ख़ुद को खींच रही होती हैं. वह लम्हा बहुत छोटा था मगर फ़ासला बहुत लंबा था.

6 मिनट के वीडियो में हिमा दास चार नंबर की लेन पर तैनात हैं. फायर होती है. कैमरा स्टेडियम के मैदान की तरफ से धावकों को दिखाता है. हिमा दास काफी देर तक दौड़ में पांचवें नंबर पर होती हैं. अचानक बहुत दूर से हिमा निकलती हुईं आती दिखती हैं. कमेंटेटर की ज़ुबान पर उनका नाम दौड़ने लगता है. वो उन चारों धावकों के करीब पहुंच जाती हैं जिनसे आगे निकलना है. तभी कैमरा अपना पोज़िशन बदलता है. साइड एंगल से टॉप एंगल पर आ जाता है. यही वो ऐतिहासिक क्षण है जब हम हिमा को आगे निकलते हुए ठीक से नहीं देख पाते है. उन पलों में हिमा को नहीं देख पाते हैं जब वह अपनी शक्तियों को बटोरते हुए ख़ुद को खींच रही होती हैं. वह लम्हा बहुत छोटा था मगर फ़ासला बहुत लंबा था.

कई बार इस वीडियो को देख चुका हूं. मैदान की तरफ से साइड एंगल का कैमरा और कमेंटेटर की आवाज़ जिस तरह से हिमा में आगे निकलने की संभावना को देखकर उत्तेजित होती है, टॉप एंगल का कैमरा उसे ठंडा कर देता है. हिमा दास चार धाविकाओं को पीछे छोड़ते हुए निकल रही हैं. लंबी छलांग लगा रही हैं. अपना सब कुछ दांव पर लगाते इस खिलाड़ी को कैमरा दूर निगाहों से देखने लगता है. वो सिर्फ उस लाइन को क्रास करते हुए दिखाना चाहता था जिससे कोई नंबर वन होता है.

काफी देर तक कैमरा सिर्फ अमेरिकन चैंपियन को देख रहा था. दौड़ के अंतिम अंतिम झणों तक अमेरिकन चैंपियन ही प्रमुखता से दिखती है. तभी उसके साये से निकलती हुई एक छाया बड़ी हो जाती है. अमेरिकन चैंपियन को पीछे छोड़ देती है.

कैमरे ने हिमा दास को जीतने का इतिहास दर्ज किया है. हिमा ने कैसे उस जीत को हासिल की है, उसका नहीं. यह भी सबक है कि कैमरे का फोकस जहां होता है वहां विजेता नहीं होता. कैमरा चाहे जितनी देर तक किसी को विजेता बना ले, हिमा दास जैसी कोई निकल आएगी. एथलिट के कवरेज में काफी तरक्की आ गई है. लेकिन फोकस खिलाड़ी से हट कर लाइन पर शिफ्ट हो गया है. सबको फाइनल रिज़ल्ट देखना है.

काश कैमरा हिमा के पांवों पर होता है. पंजों पर होता. उसकी गर्दन की नसों पर होता. हम उसके चेहरे पर बनती जीत की स्वर्ण रेखाओं को देखना चाहते थे, नहीं देख सके. हिमा दास का यह वीडियो बता रहा है कि कैमरा कैसे अपने पोजिशन से ही खिलाड़ियों में फर्क करता है. क्या कैमरे की तकनीक इतनी विकसित नहीं हुई है कि उस 59 सेकेंड हम 8 धाविकाओं को दिखा सकें. बाद में तो दिखा ही सकते थे. आयोजक को हर खिलाड़ी का मोमेंट अलग से रिकार्ड करना चाहिए और विजेता का अलग से बनाकर बाद में जारी करना चाहिए था.

बस यही कि हम भारत की हिमा को जी भर कर देखना चाहते थे. मन तो भर गया लेकिन जी नहीं भरा है.

#हिमादासकीजीतकीअधूरीकहानी

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