कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

Exclusive: “1992 में पुलिस ने हमें भीड़ के हवाले कर दिया था”…इन 26 सालों में कितनी बदली अयोध्या? Ground Report

राम के इतने मंदिर हैं, एक और बन जाए क्या दिक़्क़त है, हम चाहते हैं कि यह चैप्टर ख़त्म हो जाए. आपकी उम्र मुश्किल से 22-23 साल की होगी और हम 26 साल से इस दहशत में जी रहे हैं.

26 नवंबर, सुबह के नौ बजे हैं. बसेया टोला में अपने दरवाज़े पर धूप सेंक रही 80 साल की आयशां की आंखों में अजीब सी दहशत है. कल के बारे में पूछने पर वो सहमी सी बताती है, “सात आठ दिन से टीवी पर ख़बर चल रही थी कि वो लोग आ रहे हैं. हमें डर था कि बानवे (1992) की तरह दंगा होगा. इसलिए बेटी-बहुओं को रिश्तेदारों के यहां भेज दिया.” यह पूछने पर कि बानवे में ऐसा क्या हुआ तो वो हांफने लगती है, कहती है, “चारों तरफ चीख़ ही चीख़ सुनाई दे रही थी, ये बगल वाले पंडित जी नहीं होते तो हमलोग भी ज़िंदा जला दिए गए होते. वो बंदूक लेकर अपने छत पर पहरा दे रहे थे कि बाहर वाले कोई हमारे मुहल्ले में नहीं आए.”

आयशां की आंखों में अजीब सी दहशत है.

बसेया टोला बहुसंख्यक हिंदुओं की आबादी है, बमुश्किल दस घर अल्पसंख्यकों का है. एक संकरी गली में ही सटकर लगातार कुछ घर बने हैं. सुबह के नौ बजे गली में सन्नाटा पसरा हुआ है. कुछ घरों में ताले लटके हुए हैं तो कुछ में फिलहाल घर के बस पुरुष सदस्य ही हैं.

आयशां के पति समीमुल्लाह जो अपने दरवाज़े पर ही बकरियों को घास डाल रहे हैं. बताते हैं, “उनके चार बेटे और तीन बेटियां हैं. बेटों की शादी हो गई है और एक बेटी कुंवारी है. परसों (24 नवंबर) पूरे परिवार की औरतों को रिश्तेदारों के यहां भेज दिया है. आज शाम तक सभी लोग वापस आ जाएंगे. 1992 में ऐसी तबाही हुई थी, जिसका डर आज तक हमारे अंदर बना हुआ है.”

कुछ देर बाद समीमुल्लाह के बेटे मो. रफ़ी आते हैं. रफ़ी पहले प्रोपर्टी डीलर का काम करते थे, लेकिन नोटबंदी ने उनका कारोबार चौपट कर दिया. अब उन्हें मजबूरन मिस्तरई का काम करना पड़ रहा है. रफ़ी कहते हैं, “राम के इतने मंदिर हैं, एक और बन जाए क्या दिक़्क़त है, हम चाहते हैं कि यह चैप्टर ख़त्म हो जाए. आपकी उम्र मुश्किल से 22-23 साल की होगी और हम 26 साल से इस दहशत में जी रहे हैं.”

रफ़ी के घर के बगल में मो. उस्मान के घर पर ताला लगा है. पूरा परिवार बाराबंकी में अपने रिश्तेदार के यहां चला गया है. दरवाज़े पर उस्मान का 20 वर्षीय बेटा मो. इब्राहिम अपने दोस्तों से बात कर रहा है. इब्राहिम अवध यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में बीए कर रहा है और फिलहाल भगवान की मूर्तियां बनाने का काम करता है. उसका कहना है कि आज शाम या कल सुबह तक घर के सभी लोग वापस आ जाएंगे. इब्राहिम बताता है कि इसी 29 तारीख को हमारे भाई की शादी है, लेकिन धर्मसभा में हिंसा और गड़बड़ी की आशंका के कारण हमारे घर के लोगों को बाहर जाना पड़ा. अभी तक शादी का कार्ड भी नहीं बांटा गया है.

अपनों से ख़तरा नहीं, हमें बाहरियों से डर है

दोपहर के 1 बजे हैं. सुनहरी धूप अब तेज़ हो गई है. इतनी तेज़ की आंखों को चुभ रही है. हनुमानगढ़ी और तुलसीनगर के बीच अशर्फ़ी भवन चौक है. इसके उत्तर में थोड़ी दूर नीचे जाकर ढलान उतरने पर घरों में ताले लटके हुए हैं. यह शहर का मुग़लपुरा मुहल्ला है. सारे घर मुसलमानों के ही है. बस्ती की आबादी 125-150 के बीच की है, लेकिन फिलहाल बस तीन ही लोग यहां हैं. पूरा मुहल्ला वीरान पड़ा है.

वीरान पड़ा मुग़लपुरा मुहल्ला, घरों में ताले लटके हुए हैं.

ई-रिक्शा चलाने वाले गुड्डू बताते हैं कि मुहल्ला दो दिन से ऐसे ही सूना पड़ा है क्योंकि सभी लोग घरों को बंद कर दूसरी जगह चले गए हैं.

धर्मसभा को लेकर पूछने पर गुड्डू कहते हैं कि बानवे के दंगे में बाहर से आए लोगों ने उनके चाचा मो. आमीन को ज़िंदा जला दिया था, “इसलिए वह डर हमारे ज़हन से नहीं जाता”.

मुहल्ले में मौजूद अब्दुल ताहिर साईकिल पंक्चर बनाने का काम करते हैं. ताहिर कहते हैं कि कई दिनों से काम छोड़कर बैठा हूं. पुलिस ने इधर के रास्ते बंद कर दिए हैं, जिसके कारण इधर कोई आता ही नहीं. ताहिर का कहना है कि उन्हें यहां की पुलिस पर कोई भरोसा नहीं है क्योंकि बानवे में भी यहां पीएसी लगी थी, फिर भी हमारे लोगों को मार दिया गया था. हमारे घरों में भी आग लगा दी गई थी.

अयोध्या के इस मुहल्ले में ताले पड़े थे. जानिए क्यों अपने घरों को छोड़ कर चले गए थे लोग?

Posted by NewsCentral24x7 on Monday, November 26, 2018

ताहिर उस दिन को याद करते हुए बताते हैं, “6 दिसंबर बानवे को यहां पीएसी तैनात की गई थी, लेकिन सुबह दस बजे जब इस इलाके में कार-सेवकों की भीड़ बढ़ने लगी तो उन लोगों (पीएसी) ने हमें भीड़ के हवाले छोड़ दिया और कहा कि अब हमारी ड्यूटी ख़त्म हो गई है… हमें बाहरी लोगों के आने से काफ़ी डर लगता है.”

अयोध्या के उत्तरी हिस्से में अड़गड़ानंद चौराहा है. यह मूलत: हिन्दुओं की बस्ती है, लेकिन इसके चौराहे पर एक पुरानी मस्जिद है. मस्जिद के चौखट पर नगर निगम के सुपरवाइजर मो. आशिक अली बैठे हुए हैं. मीडिया वालों को देखकर अली बताते हैं कि दूध का जला छांछ भी फूंक फूंक कर पीता है इसीलिए 1992 दंगे को भुगत चुके लोग इस बार डरे हुए हैं.

अड़गड़ानंद चौराहा, यहां मूलत: हिन्दुओं की बस्ती है

आशिक कहते हैं, “राम मंदिर का मुद्दा बाहरी लोगों का है, यहां के स्थानीय लोगों की समस्याएं ही इतनी है कि हमें उस पर सोचने की फुर्सत नहीं है. जहां तक अयोध्या में राम मंदिर का सवाल है तो यह एक परिवार के दो भाईयों के बीच का मामला है, जिसे आपस में मिलकर सुलझा लेना चाहिए.”

आशिक को इस बात का दुख है कि हिन्दुवादी संगठन नौजवानों को मंदिर-मस्जिद के नाम पर यहां लाते हैं और अगर दंगे में किसी की जान चली जाए तो उनके परिवार को पूछने वाला भी कोई नहीं होता.

चौराहे पर ही दाहिने साइड में एक चाय की छोटी सी दुकान है. इस दुकान पर शिक्षा विभाग के चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी पद से रिटायर रामकुमार श्रीवास्तव चाय पी रहे हैं. रामकुमार कहते हैं, “मंदिर मस्जिद से हम लोगों को क्या मतलब, जब रोज़ी रोटी का आस्था ही नहीं. कोई साधन ही नहीं, कोई कार्य ही नहीं. पढ़े-लिखे नौजवान फ़ालतू घूम रहे हैं. हमलोग तो हिंदू-मुस्लिम आपस में बैठकर खाते-पीते रहे हैं, और ये प्यार आज से नहीं बहुत पहले से है.”

अयोध्या के लोग आख़िर क्या सोच रहे हैं? उनके अपने मुद्दे क्या हैं? जानिए.#ayodhya_fb_live

Posted by NewsCentral24x7 on Monday, November 26, 2018

स्थानीय विधायक-सांसद के बारे में पूछने पर रामकुमार गुस्से में दिखते हैं. कहते हैं, “यहां के सांसद लल्लू सिंह और विधायक वेद प्रकाश चुनाव के बाद से अबतक नहीं दिखें. कभी-कभार आते हैं तो मठ-मंदिरों के महंतों को माल पूजाकर चले जाते हैं. वहीं से उन्हें इकट्ठा पचास-सौ वोट मिल जाते हैं.”

आख़िर अयोध्या के स्थानीय मुद्दे क्या हैं?

अड़गड़ानंद चौराहे के दक्षिणी सिरे पर एक पुरानी खंडहरनुमा बस्ती है. अंदर घुसते ही एक ढह चुकी पुरानी मस्जिद भी दिखती है. सामने में एक खुला मैदान है जिसमें उगी झाड़ियां इस बस्ती को और पुरानी बनाती है. चारपाई बिछाकर बैठे नंदकिशोर सुनहरी धूप का मज़ा ले रहे हैं.

बात करने पर नंदकिशोर बताते हैं, “मैं दूसरों की गाड़ी चलाता हूं, लेकिन पिछले कुछ दिनों से शिवसेना की रैली के कारण कहीं जा नहीं पाया. हमारे पास खाने के लिए पैसे नहीं हैं, हमें मंदिर से क्या दरकार. सरकार हमें कोई स्थायी रोज़गार दे. मेरी चारों लड़कियों ने बीए कर रखा है, लेकिन किसी को कोई नौकरी नहीं मिली. अब तो तीन बेटियों की शादी कर चुका हूं. दो लड़के बीए कर चुके हैं. एक शहर के दवा दुकान में मजदूरी करता हैं.”

नन्दकिशोर गौड़ जिनकों मंदिर से ज़्यादा रोज़गार का मुद्दा बड़ा लगता है.

नंदकिशोर गौड़ कहते हैं कि मोदी सरकार के आने से उनका कोई फ़ायदा नहीं हुआ, “यह सरकार केवल नाम बदल रही है, इससे हमें क्या मिलने वाला है. 2016 में एक साल तक हमारे गैस की सब्सिडी नहीं आई. मेरे गैस की सब्सिडी दूसरे किसी के खाते में ट्रांसफर कर दी जाती थी. कई बार शिकायत करने के बाद अब सब्सिडी आने लगी है. लेकिन, सब्सिडी से भी क्या राहत जब हमें रसोई गैस के लिए एक हज़ार से ज़्यादा रुपए देने पड़ रहे हैं. वे बताते हैं कि अखिलेश सरकार में हर महीने समाजवादी पेंशन योजना से कुछ पैसे मिल जाते थे, लेकिन योगी जी की सरकार ने उसे भी बंद कर दिया. अब न हमारे पास कोई रोजगार है ना ही सरकार का सहारा.”

इस बस्ती में तकरीबन 15 परिवार रह रहे हैं. यह इनकी अपनी ज़मीन नहीं है. ज़मीन महन्त धर्मदास की है. उन्होने इसे किराए पर लोगों को दे रखा है. बस्ती में एक भी शौचालय नहीं है. सारे के सारे लोग सामने के मैदान में ही शौच जाते हैं.

मीडिया वाले बताने पर नंदकिशोर गौड़ इसी बस्ती में रहने वाले श्रवण कुमार को बुलाते हैं. शायद श्रवण बस्ती में सबसे ज़्यादा पढ़े-लिखे हैं. उन्होने बताया कि वे अवध यूनिवर्सिटी से 2008 में ही एमबीए पास कर चुके हैं पर फिर भी खड़ाऊं बनाने का काम करते हैं. महीने में मुश्किल से सात से आठ हज़ार की कमाई हो जाती है, इससे परिवार की रोजी-रोटी नहीं चल पाती.

बस्ती के लोगों की शिकायत ये है कि नेता लोग उनकी समस्या सुनने नहीं आते.

वो कहते हैं, “शौचालय के लिए दो साल पहले अप्लाई किया था. लेकिन, अभी तक कुछ नहीं मिला है. अगर अयोध्या में कर्फ़्यू लग जाए तो हमारे जैसे कितने ही परिवार के लोग शौचालय तक नहीं कर पाएंगे क्योंकि हमें शौचालय के लिए बाहर खुले में जाना पड़ता है.”

क्या कहते हैं स्थानीय विधायक-सांसद

अयोध्या के सांसद और विधायक भारतीय जनता पार्टी से हैं. जनता की शिकायत है कि ये नेता चुनाव से पहले इनकी ख़बर लेने नहीं आते और चुनावों के समय मंदिरों के महंत से वोटों की सेटिंग कर लेते हैं. इस बारे में पूछने पर सांसद लल्लू सिंह का कहना है कि पहले विधायक था तो लोगों से मिलता था, अब सांसद बन गया हूं, क्षेत्र का दायरा बढ़ गया है, इसलिए अब समय नहीं निकल पाता. विधायक वेद प्रकाश गुप्ता का भी यही कहना है कि मेरे विधानसभा क्षेत्र में पांच लाख की आबादी है, ऐसे में घर-घर जाकर लोगों से मिलना मुश्किल है. हम विकास पर ध्यान दे रहे हैं.

आख़िर अयोध्या के स्थानीय मुद्दे मंदिर के सामने क्यों गौण है

अयोध्या में हर गली-मुहल्ले जिधर भी नज़र डालिए मंदिर ही मंदिर नज़र आते हैं. अलग-अलग राज्यों के अलग-अलग ज़िलों के नाम पर मठ-मंदिरों के नाम हैं. मोतिहारी मंदिर के शिष्य सत्यप्रकाश बताते हैं “बिहार के लगभग सारे ज़िलों के नाम पर यहां मंदिर है. किसी-किसी ज़िले के नाम पर तो दो-तीन मंदिर भी आपको मिल जाएंगे. मंदिर, मठ, छावनी से ही पूरा अयोध्या भरा है जिनका बस एक ही मांग है राम मंदिर. राम के नाम से जीना है और राम के नाम से मरना है.”

सत्यप्रकाश बिहार के मोतिहारी ज़िले से हैं और यहां 2011 से रह रहे हैं. वो बताते हैं, “अयोध्या में जितने भी मंदिर, मठ और छावनी आपको मिलेंगे सभी में दस से लेकर हज़ार की संख्या में लोग रहते हैं. इनमें से बहुतेरे बहुत सालों से यहां रह रहे हैं, जिनका राशन कार्ड से लेकर वोटर कार्ड तक बना हुआ है. चुनाव के समय नेता लोग अधिकतर मठ-मंदिर में ही जाते हैं.”

अयोध्या में कई किले (आश्रम) भी हैं. इन आश्रमों को बिहार के लोगों के द्वारा काफ़ी दान दिया गया है. क़िलों के दीवारों पर लगाए गए शिलापट्टों पर उनके नाम के साथ उनके पते दर्ज हैं.

क़िलों के दीवारों पर लगाए गए शिलापट्टों पर उनके नाम के साथ उनके पते दर्ज हैं.

श्री सियाराम किला के महन्त करूणानिधान शरण महाराज बताते हैं कि यहां के 100 भगतों में से 80 बिहार के हैं. यह स्थिति पूरे अयोध्या की है. जो भी लोग यहां है अधिकतर के वोटर कार्ड बने हुए हैं.

संत की मांगों को लेकर वो कहते हैं, “यहां कोई मांग नहीं है, बस एक ही मुद्दा है मंदिर बन जाए. कुछ संत होंगे जो अलग मांग करते होंगे, उनकी अपनी राजनीति होगी. लेकिन बस वो भी ऊपर से ही, अंदर से तो बस मंदिर ही है.”

अपने अनुमान के अनुसार महन्त करूणानिधान बताते हैं कि यहां के वोटरों में अस्सी प्रतिशत तो संत और संत समर्थित हैं. बाक़ी बचे लोग हमलोग पर आश्रित हैं. यदि ये आश्रित लोग सम्पन्न हो जाए तो हमें काट देंगे या यहां से भगा देंगे. स्थानीय लोगों के बारे वे आगे कहते हैं “संत विदा हो जाए तो यहां ये भूखे मरेंगे. वैसे भी ये भूखे ही मरते हैं.”

राम, राजनीति और संत समाज

लखनऊ से फ़ैजाबाद-अयोध्या चले आइए आपको सड़क किनारे शिवसेना के ही पोस्टर नज़र आएंगे. नारा एक ही है- हर हिंदू की यही पुकार…पहले मंदिर फिर सरकार. शिवसेना ने अयोध्या के हर गली में अपने पोस्टर लगा रखे हैं. लगभग भगतों के जबान पर शिवसेना के नारे हैं.

अयोध्या के गली-गली में शिवसेना ने अपने पोस्टर लगा रखे हैं.

गया मंदिर के भगत राम भरत दास जो पिछले 25 साल से इस मंदिर में अपनी सेवा दे रहे हैं. कहते हैं “साढ़े चार साल से मंदिर नहीं बन पाया. इस सरकार से विश्वास उठ रहा. प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक अपने हैं फिर भी यह संकल्प पूरा नहीं हो रहा है.” शिवसेना को 2019 चुनाव लड़ने को लेकर वो कहते हैं कि अभी वो नयी है यहां, भाजपा पुरानी है. फिर भी संत समाज का विश्वास डगमगा रहा है.

विहिप और भाजपा कनेक्शन को लेकर सियाराम किला के महन्त करूणानिधान शरण बताते हैं, “इन्दिरा गांधी के समय सबसे बड़ा संत आंदोलन हुआ पर उसे बेरहमी से कुचल दिया गया. तब से ही हम समझ गए कि यह राजनीति हमें कुचल देगी. इसलिए हमें भी राजनीति का रास्ता आख़्तियार करना पड़ा. हमने सनातनी धर्म के अनुसार आरएसएस को अपना विकल्प बनाया.”

2019 का अयोध्या कांड-सियाराम किला के पास मौजूद एक गाड़ी पर पोस्टर

साढ़े चार साल में मंदिर नहीं बनने पर वो कहते हैं कि मोदी सरकार के पास राज्यसभा में बहुमत नहीं थी. हम अगले टर्म तक भाजपा को सपोर्ट करेंगे. यदि आगे कुछ नहीं हुआ तो संत समाज सोचेगा. हमारी राजनीति राम से शुरू होती है और राम पर ख़त्म होती है.


यह रिपोर्ट स्थानीय लोगों से बातचीत, मंदिर के महन्तों और जनप्रतिनिधियों से बातचीत के आधार पर तैयार की गई है. 

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