कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

राजनीति में भक्ति या नायक पूजा पतन का निश्चित रास्ता है और यह आखिरकार तानाशाही पर खत्म होता है”- बाबा साहेब के विचार

"संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि वे लोग, जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाए, खराब निकले तो निश्चित रूप से संविधान खराब सिद्ध होगा."

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर एक अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ के साथ-साथ समाज सुधारक भी थे. उन्होंने समाज में दलितों के साथ होते भेदभाव के विरुद्ध अभियान चलाया था. बाबा साहेब किसान, श्रमिक और महिला अधिकारों के भी समर्थक थे. वे स्वतंत्र भारत के भारतीय संविधान के जनक और भारत गणराज्य के निर्माता थे. भीमराव अंबेडकर के कुछ विचारों को बिंदुवार ढंग से लिखा गया है, जिन्हें आज भी याद करने की जरूरत है.

  • “भारत में धर्म में भक्ति आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकता है, लेकिन राजनीति में, भक्ति या नायक पूजा पतन का निश्चित रास्ता है और यह आखिरकार तानाशाही पर खत्म होता है.”
  • “26 जनवरी 1950 को हम विरोधाभासों के जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं. राजनीति में हम एक व्यक्ति एक वोट के सिद्धांत को मान रहे होंगे. लेकिन सामाजिक और आर्थिक ढांचे की वजह से हम अपने सामाजिक-आर्थिक जीवन में एक व्यक्ति की कीमत से वंचित करते रहेंगे… हम कब तक हमारे सामाजिक और आर्थिक जीवन में समानता को नकारते रहेंगे?… यदि हम लंबे अरसे तक यह नकारते रहे तो ऐसा करके अपने राजनीतिक लोकतंत्र को खतरे में डाल रहे होंगे…
  • “मैं महसूस करता हूं कि संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि वे लोग, जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाए, खराब निकले तो निश्चित रूप से संविधान खराब सिद्ध होगा. दूसरी ओर, संविधान चाहे कितना भी खराब क्यों न हो, यदि वे लोग, जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाए, अच्छे हों तो संविधान अच्छा सिद्ध होगा.”
  • “जातियां राष्ट्र विरोधी हैं. पहला कारण क्योंकि वे सामाजिक जीवन में अलगाव लाती हैं. वे राष्ट्र-विरोधी भी हैं क्योंकि वे जाति और जाति के बीच ईर्ष्या और द्वेष उत्पन्न करती हैं. लेकिन हमें इन सभी कठिनाइयों को दूर करना चाहिए अगर हम वास्तव में एक राष्ट्र बनना चाहते हैं. भ्रातृत्व के लिए केवल एक तथ्य हो सकता है जब एक राष्ट्र हो.”
  • “लोग और उनके धर्म, सामाजिक नैतिकता के आधार पर, सामाजिक मानकों द्वारा परखे जाने चाहिए. अगर धर्म को लोगों के भले के लिए आवश्यक वस्तु मान लिया जायेगा तो और किसी मानक का मतलब नहीं होगा.”
  • “हमारे पास यह स्वतंत्रता किसलिए है? हमारे पास ये स्वतंत्रता इसलिए है ताकि हम अपने सामाजिक व्यवस्था, जो असमानता, भेद-भाव और अन्य चीजों से भरी है, जो हमारे मौलिक अधिकारों से टकराव में है, को सुधार सकें.”
  • “हर व्यक्ति जो मिल के सिद्धांत, एक देश दूसरे देश पर शासन नहीं कर सकता को दोहराता है उसे ये भी स्वीकार करना चाहिए कि एक वर्ग दूसरे वर्ग पर शासन नहीं कर सकता.”
  • “एक सफल क्रांति के लिए सिर्फ असंतोष का होना ही काफी नहीं है, बल्कि इसके लिए न्याय, राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों में गहरी आस्था का होना भी बहुत आवश्यक है.”
  • “मैं ऐसे धर्म को मानता हूँ जो स्वतंत्रता, समानता और भाई-चारा सिखाए.”
  • “जिस तरह मनुष्य नश्वर है ठीक उसी तरह विचार भी नश्वर हैं. जिस तरह पौधे को पानी की जरूरत पड़ती है, उसी तरह एक विचार को प्रचार-प्रसार की जरुरत होती है वरना दोनों मुरझा कर मर जाते हैं.”
  • “शिक्षा वह है, जो किसी व्यक्ति को निडर बनाती है, उसे एकता का पाठ पढ़ाती है, उसे उसके अधिकारों के बारे में बताती है और उसे अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित करती है.”
  • “संवैधानिक लोकतंत्र सरकार का एक रूप और तरीका है जिसके तहत लोगों के आर्थिक और सामाजिक जीवन में बिना रक्तपात के क्रांतिकारी परिवर्तन किए जाते हैं.”
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