कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

ग्राउंड रिपोर्ट: आसनसोल में बंद पड़ी दो सरकारी फैक्ट्रियां रोक सकती हैं BJP उम्मीदवार बाबुल सुप्रियो के दिल्ली का रास्ता

शहर की दो सरकारी फैक्ट्रियां पिछले पांच साल में बंद हुई हैं, जिसके कारण यहां के रोजगार और अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ा है.

सुबह के 7 बजे आसनसोल के कोर्ट बाजार इलाके में रमेन्दु दास* टहल रहे हैं. वे कुछ धुले हुए और प्रेस किए गए कपड़ों को पहुंचाने जा रहे हैं. रमेन्दु कोई धोबी नहीं हैं. इनका काम कपड़े प्रेस करना भी नहीं है. रमेन्दु तो बस अपना घर-बार चलाने के लिए लॉन्ड्री में धुले और प्रेस किए गए कपड़ों को उसके मालिकों तक पहुंचाते हैं. कपड़े के हर थैले के लिए रमेन्दु को ग्राहकों की तरफ से 5 रुपए तथा लॉन्ड्री वाले की तरफ से 5 रुपए दिए जाते हैं. भरी हुई आंखों से देखते हुए रमेन्दु कहते हैं, “मेरे पेट में कोई खाना नहीं है. ना हमें खाने के लिए उचित भोजन है ना सोने के लिए उचित ठिकाना. और हमारी यह स्थिति पिछले पांच सालों में हुई है. मुझे तो बस उम्मीद है कि आज इतना कमा पाऊंगा कि मेरे घर वालों को सही से खाना नसीब हो पाएगा.”

एक समय में आसनसोल को पश्चिम बंगाल का एक विकासशील औद्योगिक शहर माना जाता था. पिछले 5 सालों में यहां की दो सरकारी कंपनियां हिन्दुस्तान केबल्स और बर्न स्टैंडर्ड बंद हो गई हैं. शहर का वैकल्पिक व्यापार जैसे कि छोटे दुकान, व्यापारिक इकाईयां भी बंद हो गई हैं. इसके कारण बहुत से लोग ग़रीबी के शिकार हो गए. रमेन्दु दास की तरह सैकड़ों छोटे व्यापारी हैं, जो आसनसोल में हर रोज जीने का संघर्ष कर रहे हैं. बंद हो चुकी इन दोनों कंपनियों के पूर्व कर्मचारी अपने बकाये के भुगतान के लिए हर तरह के उपाय अजमा चुके हैं.

आसनसोल के सांसद और केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो को इस चुनाव में कड़ी टक्कर मिल रही है. इसका कारण है कि उन्होंने हिन्दुस्तान केबल्स की स्थिति सुधारने का अपना वादा पूरा नहीं किया है. यहां के लोग ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं. राज्य की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस भी इस मुद्दे पर संवेदनशील नज़र नहीं आती. आसनमोल से तृणमूल कांग्रेस की उम्मीदवार मुनमुन सेन भी चुनाव में प्रदूषण का मुद्दा जोरशोर से उठा रही हैं, जबकि यहां के वोटर रोजगार और जीवन यापन की समस्याओं पर समाधान चाहते हैं. यहां के कई स्थानीय लोगों का मानना है कि भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के उम्मीदवार गौरांग चटर्जी आसनसोल की समस्याओं उठाने के लिए सही व्यक्ति हैं, क्योंकि उन्हें स्थानीय समस्याओं की समझ है. आसनसोल की लड़ाई में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस की तरफ़ से दो सेलिब्रिटियों को टिकट दिया गया है, ऐसे में यह मुश्किल लगता है कि गौरांग चटर्जी कोई कमाल कर पाएंगे. लेकिन, यह तय है कि 2 सरकारी कंपनियों का इस तरह ठप होना 29 अप्रैल को होने वाले चुनाव में बाबुल सुप्रियो के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है.

आसनमोल से तृणमूल कांग्रेस की उम्मीदवार मुनमुन सेन, फ़ोटो-फ़ेसबुक

स्थानीय भाजपा नेताओं का कहना है कि इन कंपनियों के बंद होने के पीछे बाबुल सुप्रियो को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है, क्योंकि पूर्ववर्ती यूपीए सरकार में ही ये कंपनियां बुरी स्थिति में थी. भाजपा नेता प्रसंता चक्रवर्ती का कहना है, “कैसे उम्मीद की जा सकती है कि बाबुल सुप्रियो इन कंपनियों के लिए कुछ कर पाएंगे. 2003 के बाद से ही कंपनी में कोई काम नहीं हो रहा था. इसके लिए भाजपा सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है.” दुर्गापुर की हाल ही में एक चुनावी रैली में ममता बनर्जी ने दोनों कंपनियों की बंदी के लिए मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराया था.

बर्न स्टैंडर्ड के कर्मचारियों को नहीं मिला पीएफ

चाय की दुकान पर अख़बार पढ़ते हुए अधिरंजन मुखर्जी* व्यंग्यभरे स्वर में कहते हैं, “बाबुल सुप्रियो ने यहां एक चीज ठीक किया है. उन्होंने दो कंपनियों को बंद करा दिया.” अधिरंजन बर्न स्टैंडर्ड में काम किया करते थे. सितंबर 2018 में यह कंपनी बंद हो गई. अधिरंजन कहते हैं, “प्लीज़ मेरा नाम कहीं भी ना लिखिएगा. इन बयानों के लिए वे लोग मुझे आकर मारने लगेंगे. वे हमें पैसे नहीं देना चाहते. हमारी आर्थिक स्थिति बिल्कुल चरमरा गई है.”

मार्च 2018 में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल ने बर्न स्टैंडर्ड को दिवालिया घोषित करने का आदेश दिया. इसके साथ ही बर्नपुर और हावड़ा इकाई में काम करने वाले 500 कर्मचारियों के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना के तहत देने के लिए तथा सप्लायर और लेनदारों के भुगतान के लिए 417 करोड़ रुपए निर्गत किए गए. रेल मंत्रालय ने कहा था कि 172.5 करोड़ रुपए टैक्स, ग्रैचुएटी, छुट्टी व यात्रा भत्ते की भुगतान के लिए निर्गत किए जाएंगे तथा 112.37 करोड़ रुपयों से कर्मचारियों का रिटायरमेंट पेंशन (वीआरएस) दिया जाएगा. हालांकि कंपनी के 280 स्थायी कर्मचारियों ने शिकायत की है कि उनका वीआरएस अभी तक नहीं दिया गया है. ये सभी कर्मचारी आसनसोल के हैं.

बर्न स्टैंडर्ड के पूर्व कर्मचारी विनय मिश्रा पहले 24,000 रुपए का महीना कमाया करते थे. अब वे सजावट का काम करते हैं और उन्हें 8000 रुपए की सैलरी मिलती है. 8000 रुपए की सैलरी परिवार चलाने और बच्चों की पढ़ाई के लिए पर्याप्त नहीं होती. विनय बताते हैं, “मुझे मात्र साढ़े तीन साल का ही ग्रैचुएटी मिला है. मेरा भविष्य निधि (पीएफ) भी अभी बकाया है. आसनसोल इकाई के किसी भी कर्मचारी को आजतक पीएफ की पूरी राशि नहीं मिली है.” ममता बनर्जी और भाजपा की नज़रअंदाजी से नाराज कर्मचारियों ने अब कानून का सहारा लेने का मन बनाया है.

बर्न स्टैण्डर्ड कंपनी जो सितंबर 2018 में बंद हो गई.

कर्मचारियों का आरोप है कि कंपनी के तकनीक में निवेश करके सरकार इसे पुनर्जीवित कर सकती थी. नीति आयोग ने बर्न स्टैंडर्ड को बंद करने का सुझाव दिया था, क्योंकि यह कंपनी तकनीक के मामले में पिछड़ रही थी और टेक्समैको रेल और इंजीनियरिंग जैसे इसके प्रतिद्वंदी इससे बेहतर प्रदर्शन कर रहे थे.

2014 में जब भाजपा के उम्मीदवार बाबुल सुप्रियो आसनसोल में वोट मांगने आए थे, तब उन्होंने वादा किया था कि हिन्दुस्तान केबल्स के 1000 कर्मचारियों से वादा किया था कि यह इकाई पुनर्जीवित की जाएगी. हिन्दुस्तान केबल्स की आसनसोल इकाई से बीएसएनएल और एमटीएनएल जैसे कंपनियों में केबल सप्लाई किए जाते हैं. जनवरी 2003 में इस कंपनी में उत्पादन बंद हो गया.

जुलाई 2014 में रक्षा मंत्रालय ने इस कंपनियों को आयुध फैक्ट्री बोर्ड के हवाले कर दिया था. हालांकि, सितंबर 2016 में मोदी सरकार ने इसे बंद कर दिया.

कर्मचारियों का दावा है कि इस मामले को लेकर उन्होंने 2015 में सांसद बाबुल सुप्रियो से उनके दिल्ली कार्यालय में मुलाकात की थी, लेकिन उन्होंने किसी भी प्रकार की सहायता से इनकार कर दिया. पूर्व कर्मचारी एमएस घोष का कहना है, “एक साल के भीतर ही वे अपना वादा भूल गए. कर्मचारी आज भी अपने बकाए के भुगतान की बाट जोह रहे हैं. हर कर्मचारी का कम से कम 2-3 लाख रुपए का बकाया है. श्रमिक संघों ने कई मौकों पर इस मामले को उजागर किया है.” इसके बाद एम एस घोष बताते हैं कि कर्मचारियों को 1992,1997 वेतन संशोधन के बाद एरियर्स का भुगतान भी नहीं किया गया है.”

मोदी, ममता बनर्जी और बाबुल सुप्रियो, फ़ोटो-फ़ेसबुक

त्रिकोणीय मुकाबला

भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के वरिष्ठ नेता पार्थ मुखर्जी कहते हैं, “आसनसोल की जनता ने पिछली बार बाबुल सुप्रियो को चुना था, लेकिन अब यहां की जनता को एहसास हो गया है कि वे (बाबुल सुप्रियो) एक बाब्लगम हैं. दिल्ली में उनका कोई नहीं सुनता है. यहां की दो फ़ैक्ट्रियों के बंद होने के बाद चितरंजन रेल इंजन कारखाने का उत्पादन भी कम हुआ है जबकि वाराणसी के डीजल रेल इंजन कारखाने की उत्पादन क्षमता बढ़ी है.” अपने चुनावी रैलियों में भाकपा (मार्क्सवादी) के उम्मीदवार गौरांग चटर्जी का जोर बेरोज़गारी की समस्या और शहर के स्थानीय कर्मचारियों की समस्या पर रहता है.

2014 में बाबुल सुप्रियो के जीतने से पहले 25 सालों तक आसनसोल वामपंथ का गढ़ रहा है. 2014 में भाकपा के उम्मीदवार बंसा गोपाल चौधरी 2,55,829 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर आए थे. बाबुल सुप्रियो को 4,19,983 वोट मिले थे, जबकि तृणमूल कांग्रेस के डोला सेन 3,49,503 वोट पाकर दूसरे नंबर पर आई थीं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बाबुल सुप्रियो ने मोदी लहर के कारण जीत हासिल की. इसके साथ ही शहर में रह रहे 50 प्रतिशत गैर बांग्ला मतदाताओं का बड़ा योगदान भी बाबुल सुप्रियो की जीत में रहा है.

भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के उम्मीदवार गौरांग चटर्जी का चुनावी प्रचार

अब बाबुल सुप्रियो, मोदी के नाम पर वोट मांग रहे हैं. जबकि मुनमुन सेन अपनी दिवंगत माता अभिनेत्री सुचित्रा सेन की लोकप्रियता और ममता बनर्जी के काम के नाम पर वोट मांग रही हैं. तृणमूल कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति की वजह से हिन्दी भाषी वोटरों के बीच लोकप्रिय आसनसोल के मेयर जितेन्द्र तिवारी को टिकट नहीं मिल सका. आसनसोल के गैर-बांग्ला वोटर अभी भी भाजपा के साथ दिखाई दे रहे हैं तो इस संसदीय क्षेत्र के 15 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं का रूझान तृणमूल कांग्रेस की तरफ है. शहर के अलग-अलग हिस्सों में वामपंथी सीपीआई के समर्थक भी मौजूद हैं. कोयला और खदान के कर्मचारी सीपीआई के समर्थन में हैं. तृणमूल कांग्रेस के बीच आंतरिक कलह का फायदा भाजपा और सीपीआई (एम) को मिलने की उम्मीद है.

आसनसोल का औद्योगिक क्षेत्र

सीपीआई उम्मीदवार चटर्जी का कहना है, “तृणमूल कांग्रेस और भाजपा दोनों ही प्रतिस्पर्धी सांप्रदायिकता फैलाने में लगी हैं. पिछले कुछ सालों से ये दोनों ही पार्टियां रामनवमी जैसे त्यौहार का उपयोग दो संप्रदायों के बीच तनाव पैदा करने के लिए कर रही हैं.” मार्च 2018 में रामनवमी के जलसे में हिन्दू और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के बीच हुए झड़प में कई लोगों की जानें चली गई थी. इसी कारण इस साल रामनवमी के दिन अधिकारियों ने इस क्षेत्र में इंटरनेट सेवा को ठप करा दिया था.

ममता बनर्जी और आसनसोल में तृणमूल कांग्रेस की उम्मीदवार मुनमुन सेन का फ़ोटो लगा पोस्टर

आर्थिक मोर्चे पर कमी और रोज़गार देने में विफल बाबुल सुप्रियो अब जनता का विश्वास जीतने में सफल नहीं हो रहे हैं. लेकिन भाजपा को उम्मीद है कि राष्ट्रवाद और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के संयोग और प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता से वह एक बार फिर इस सीट पर अपनी जीत हासिल कर सकता है. हाशिये पर माने जानी वाली सीपीआई (एम) ने यहां एक मजबूत उम्मीदवार को उतारा है. समाज के हर तबके में इनकी इज्जत की जाती है. लेकिन यहां के मतदाता ऐसी पार्टी के साथ जाने में सहज नहीं हैं, जो देश के दूसरे हिस्से में हाशिये पर चली गई हैं और जिसके साथ काफी कम संभावनाएं नज़र आती हैं.

*पहचान की गोपनीयता बरकरार रखने के लिए नाम बदल दिए गए हैं.

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में लिखा गया है. मूल रिपोर्ट को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)

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