कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

स्वच्छता अभियान: “फायदेमंद शौचालय” से पर्यावरण को कोई घाटा नहीं

फायदेमंद शौचालयों में इकट्ठा होने वाले जल-मल का उपयोग खेती में किया जाता है.

रिपोर्ट के पहले भाग  में स्वच्छ भारत अभियान के तहत बिहार में चल रहे लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान की वास्तविक चुनौतियों और जमीनी समस्याओं के बारे में बताया गया था.

सूखाग्रस्त क्षेत्रों में पानी की किल्लत, भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप वैकल्पिक शौचालयों का निर्माण न होना, सहायता राशि में देरी और गरीबी कुछ मुख्य कारण हैं,जिनकी वजह से ग्रामीण क्षेत्रों में लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान कारगर होता नहीं दिखता. एक और बड़ा कारण है व्यवहार परिवर्तन न हो पाना, जिसका ज़िक्र विस्तार से पहली रिपोर्ट में किया गया है.

लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान की पड़ताल के दौरान जमुई ज़िले के केडिया गांव में शौचालयों के साथ एक अनूठा प्रयोग होता देखा. चूंकि जमुई सूखाग्रस्त इलाका है, यह शौचालय जमुई की भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रखकर बनाया गया है. इसका नाम है “फायदेमंद शौचालय”. शौचालयों का नाम “फायदेमंद शौचालय” पड़ने का कारण है, इनकी प्रकृति. ये शौचालय किसी भी तरह  से पर्यावरण को दूषित नहीं करते. साथ ही साथ इन शौचालयों में इकट्ठा होने वाले जल-मल का उपयोग खेती में किया जाता है. यह सरकार द्वारा दी जाने वाली 12,000 रुपये की सहायता राशि में आसानी से बनाया भी जा सकता है.

केडिया के पर्यावरणीय “फायदेमंद शौचालय

जमुई ज़िले से तकरीबन 30 किलोमीटर दूर स्थित है केडिया. केडिया की बिहार में एक पहचान यह भी है कि यह बिहार का पहला ऐसा गांव है जहां सौ फीसदी जैविक खेती होती है. फायदेमंद शौचालय का निर्माण भी पर्यावरणीय ज़रूरतों को पूरा करने के उद्देश्य से किया गया.

सरकार स्वच्छ भारत अभियान के तहत ‘इंडियन लैट्रिन’ मॉडल को प्रचारित कर रही है. लीचपीट टंकी वाले इन शौचालयों को बनवाने का खर्चा सरकार द्वारा दी जाने वाली सहायता राशि से ज्यादा आता है. यह ‘इंडियन लैट्रिन’ जमुई जैसे सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लिए मुफीद नहीं है.

जीवित माटी किसान समिति, केडिया,जमुई

फायदेमंद शौचालय में मल और जल दोनों अलग इकट्ठा होता है. इसका स्वरूप मूलत: इंडियन लैट्रिन की तरह ही होता है लेकिन निकास के रास्ते अलग होते हैं. इसमें पैर रखकर बैठने के लिए दो टाइल्स के टुकड़े लगे हैं. मल त्यागने के लिए बीच में एक गड्ढा है. आगे और पीछे दो नालियां हैं. शौचालय में एक छोटी सी जगह पर राख या मिट्टी रखने की जगह है. 8 बाई 6 की ज़मीन पर एक और ऐसा ही मॉडल तैयार किया जाता है. टाइल्स पर बैठने का तरीका कुछ यूं होना चाहिए कि मल सीधे गड्ढे में ही गिरे. मल त्यागने के बाद गड्ढे में राख या मिट्टी डाल दी जाती है. राख या मिट्टी मल की नमी को सोख लेते हैं. यह सड़न की प्रक्रिया को तेज करता है. साथ ही बदबू भी खत्म हो जाती है. फायदेमंद शौचालय में आगे की तरफ बनी नाली में पिशाब की निकासी होती है. इसे एक बड़े से बर्तन में जमा करते हैं. दूसरी तरफ बनी नाली में धोने के पानी की निकासी होती है. यह पानी सीधे खेतों में जाता है.

फायदेमंद शौचालय की टंकी भूजल के स्तर से ऊपर बनती है. टंकी की फर्श लीचपीट की तरह मिट्टी की सतह पर नहीं होती बल्कि सीमेंट की पक्की ज़मीन होती है. टंकी की गहराई तकरीबन 6 फीट होती है. टंकी भर जाने पर उसे ऊपर टीन या लोहे से ढक दिया जाता है. अब उसी कमरे में बने दूसरे फायदेमंद शौचालय का उपयोग शुरू होता है. जिस पहले वाले की टंकी भर जाने पर ढक दी गई थी, 6 से 8 महीने में उसी टंकी में जैविक खाद तैयार हो जाएगी. इसका इस्तेमाल खेतों में उर्वरक के तौर पर किया जा सकता है. पेशाब (जिसे बर्तन में इकट्ठा किया जाता है) 20-22 दिनों में पेशाब में मौजूद क्लोराइड, यूरिया, सोडियम आदि की मात्रा न्यूट्रल हो जाती है और वह खेतों में डाले जाने लायक हो जाती है. मतलब, शौचालय से निकलने वाला जल-मल न बर्बाद होता है, न ही पर्यावरण को किसी भी तरह का कोई नुकसान पहुंचाता है.

फायदेमंद शौचालय

केडिया के राजकुमार बताते हैं, “यह शौचालय हमने केडिया की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए बनवाया था. इंडियन लैट्रिन का प्रयोग अगर एक व्यक्ति दिनभर में एक बार भी करता है तो कम से कम 8 से 10 लीटर पानी की बर्बादी होती ही है. फायदेमंद शौचालय में सिर्फ 1 से 2 लीटर में काम हो जाता है.” फायदेमंद शौचालय में पानी का इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ धोने के लिए ही होता है.

कम खर्च में प्रभावी काम

स्वच्छ भारत अभियान के तहत शौचालय बनवाने के लिए सरकार 12,000 रूपये की सहायता राशि देती है. एक आम लीचपीट शौचालय बनवाने में औसतन 20,000 से25,000 रूपये तक खर्च हो जाते हैं. वहीं फायदेमंद शौचालय बनवाने का खर्च 10,000 से 12,000 रूपया आता है. “दो टाइल्स या ईंट के टुकड़े, दीवार बनाने के लिए हजार ईंटे और टंकी बनवाने का खर्चा- बस इतना ही खर्च है फायदेमंद शौचालय में. बाकी आप शौचालय की जो भी साज-सज्जा करो, वो आपके ऊपर है”, शौचालय बनवाने की बुनियादी ज़रूरतों के बारे में रंजू कुमारी बताती हैं, “कुल मिलाकर फायदेमंद शौचालय का बुनियादी ढांचा10,000 रूपये में तैयार हो जाएगा.”

केडिया में 22 फायदेमंद शौचालय बने हुए हैं. गांव वाले इन शौचालयों का उपयोग भी करते हैं. पर्यावरणीय उपयोगिता होने के बावजूद बिहार सरकार फायदेमंद शौचालयों को लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत स्वीकार करने को तैयार नहीं थी. सरकार की स्वीकृति प्राप्त करने के लिए केडिया के लोगों को लंबी जद्दोजहद करनी पड़ी.

मनोज कुमार तांती सरकारी संघर्ष की कहानी बयां करते हैं. वह बताते हैं, “प्रशासकीय खेमे को फायदेमंद शौचालय की स्वच्छता पर शक था. चूंकि इसमें इंडियन लैट्रिन जैसी सीट नहीं लगी, उन्हें लगता था कि यह कारगर नहीं है.” राजकुमार कहते हैं, “हमें बीडीओ और सरकारी अधिकारियों को बार-बार शौचालय दिखाकर उन्हें इसके फायदे के बारे में समझाना पड़ता था. जो खाद शौचालय की टंकी में मल से बनता था, उसे हाथ में लेकर दिखाना पड़ा कि यह पूर्णत: स्वच्छ है.”

हालांकि बाद में बिहार सरकार ने केडिया के फायदेमंद शौचालयों को लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत सहायता राशि के लिए उपयुक्त पाया. गांव में और भी फायदेमंद शौचालयों का निर्माण हो रहा है. एक तरफ रंजू कुमारी फायदेमंद शौचालयों के फायदे पर खुशी ज़ाहिर करती हैं. दूसरी तरफ वह निराश भी होती हैं कि केडिया जैसे गांवों को अंधाधुंध विकास की मार झेलनी पड़ रही है. “पानी की कमी के बारे में सोचकर हमारे गांवों में फायदेमंद शौचालय बन रहे हैं. लेकिन क्या किसी ने सोचा है कि हमारे गांवों में पानी की ये भीषण कमी कैसे हो रही है?”

रंजू अपने सवाल के दूसरे भाग में स्पष्ट तौर पर शहरों और शहरी जीवनयापन पर सवाल करती हैं, “सैकड़ों फीट की बोरिंग शहरों में, वहां शौचालय भी इंग्लिश और कोमोड वाले बने हैं, जिसमें एक ही बार में 15-18 लीटर पानी बर्बाद हो जाता है. लेकिन पर्यावरण संरक्षण की सारी जवाबदेही गांवों के लोगों के ऊपर डाल दी जाती है.” स्पष्ट रूप से रंजू की बातों में भारत के शहरों और गांवों के बीच की दूरी झलकती है. वह समावेशी विकास की दरकार की ओर ध्यान आकर्षित करती हैं. दुखद है कि अभी भी सरकारें फायदेमंद शौचालयों को बड़े स्तर पर प्रचारित करने से बच रही हैं, जबकि सिर्फ बिहार के जमुई ही नहीं बल्कि समूचे भारत में पानी की कमी महसूस की जा रही है. वहीं सरकार की महत्वाकांक्षी योजना, लीचपीट शौचालयों को बनवाकर भूजल को प्रदूषित करने का जाल बिछा रही है. चिंता की बात यह है कि कहीं स्वच्छ भारत अभियान का ढीला क्रियान्वयन आने वाले वक्त में भारत के लिए अस्वच्छता की बिसात न तैयार कर दे.

इस रिपोर्ट का पहला भाग  यहां पढ़ें. (स्वच्छता अभियान: सूखाग्रस्त क्षेत्रों में फ्लॉप लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान)

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और दिल्ली में निवास करते हैं.

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