कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

आरएसएस के एक दलित स्वयंसेवक की कहानी, जिसके घर का खाना खाने से संघ के लोगों ने किया इनकार, देखें विडियो

इस घटना के बाद मेरे अंदर एक विद्रोह पैदा हो गया. मुझे लगा कि मैं जिस हिंदू राष्ट्र को बनाना चाहता हूं उसमें मेरी जगह कहां है.

भंवर मेघवंशी जो वेब पोर्टल शून्यकाल के संपादक हैं. सालों पहले भंवर मेघवंशी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सदस्य हुआ करते थे. लेकिन एक घटना ने उन्हें  आरएसएस की विचारधारा से परिचित करवा दिया.

एक यूट्यूब चैनल दलित कैमरा  को दिए एक साक्षात्कार में भंवर मेघवंशी ने बताया कि संघ के लोगों का रवैया एक दलित व्यक्ति के लिए किस प्रकार का होता है.

आरएसएस के साथ जुड़े के सफर का जिक्र करते हुए मेघवंशी ने बताया कि वे 13 साल की उम्र में आरएसएस से जुड़े थे. लेकिन धीरे-धीरे एहसास हुआ कि यह एक शाखा है और यहां आने का प्रयोजन होता है. शाखा से जुड़ने के बाद उनके भीतर देशभक्ति की भावना जागी. तब वह संघ में रहकर देश और  हिंदू समाज के लिए, एक प्रचारक के तौर पर पूरी ज़िंदगी काम करना चाहते थे.

उन्होंने आगे कहा कि पांच सालों तक वह संघ से जुड़े रहने के बाद मैं संघ के प्रचारक के रूप में काम करना चाहता था. लेकिन संघ ने कहा तुम एक प्रचारक नहीं विचारक हो. क्योंकि तुम्हारा दिमाग मजबूत है. हमें प्रचारक के लिए गर्दन से नीचे वाला हिस्सा मजबूत चाहिए. इसलिए तुम्हारे लिए प्रचारक बनना कठिन है.

साथ ही दूसरी बात उन्होंने कही कि, “हिंदू समाज ऊंचा है और तुम उस कम्यूनिटी से आते हो जिनके प्रति बाकी समाज का सोच ठीक नहीं है. इसलिए प्रचारक के नाते तुम किसी के घर में जाओगे, बैठोगे, बातें करोगे. लेकिन तुम्हारी जाति पता लगने पर लोगों का व्यवहार तुम्हारे प्रति बदल जाएगा. जिसकी वजह से तुम्हें दुख होगा और तुम विरोध करोगे. इसलिए तुम प्रचारक नहीं बल्कि विस्तारक के रूप में काम करो.”

मेघवंशी के अनुसार, 1992 में पूरे देश में राम मंदिर को लेकर एक आंदोलन चलाया गया था. भीड़वाड़ा में भी राम मंदिर के लिए रैली निकाली जा रही थी. रैली शुक्रवार को निकाली जानी थी और रैली को मस्जिद के रास्ते से होकर जाना था. तब ज़िला प्रशासन ने मस्जिद के रास्ते से जाने पर रोक लगा दी. जिसे लेकर बहस हो गई और पीछे से कुछ लोगों ने पत्थर फेंकना शुरू कर दिया.

इसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज और हवाई फायर किया. लेकिन जब बात नहीं बनी तो पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी. पुलिस की फायरिंग से दो लोगों की मौत हो गई. जिन दो लोगों की मौत हुई उनका आंदोलन से कोई मतलब नहीं था. लेकिन दोनों हिंदू थे इसलिए उन्हें शहीद घोषित कर दिया गया. इसके बाद उन शहीदों का अस्थि-कलश यात्रा निकाला गया और वह अस्थि-कलश यात्रा मेरे गांव में भी आया. जिसमें संघ के कुछ लोग आये थे.

हमारे घर में खाना बना और तब मेरे पिताजी ने कहा कि ये लोग हमारे घर खाना नहीं खायेंगे. मैंने पिताजी से कहा कि आप हमारे संगठन के बारे में नहीं जानते हैं. वहां सभी हिंदू एक जैसै हैं. सब एक साथ बैठते है और एक साथ खाना खाते हैं. संघ के सदस्य रात के समय मेरे गांव आए. इसके बाद हमारी मीटिंग हुई. मीटिंग खत्म होते ही मैंने सबसे कहा कि खाना यहीं तैयार है.

तब आरएसएस के एक बड़े नेता जो उस वक्त वहां मौजूद थे. वे मुझे पकड़ कर भीड़ से थोड़ा अलग ले गए और कहा, “बंधु आप तो राष्ट्र भक्त हैं. आप तो जानते हैं कि हमारे समाज में कितनी विषमताएं हैं. हम तो खा लेंगे आपके यहां… आप तो जानते हैं क्योंकि आपने हमारे यहां खाया है. इसलिए हम भी आपके यहां खा सकते हैं क्योंकि संघ सबको बराबर का अधिकार देता है. लेकिन हमारे साथ जो साधु-संत है उन्हें यहां खाने में दिकक्त होगी.”

इसलिए आप खाना पैक कर दीजिए और हम आगे वाले गांव में इनको यह खाना खिला देंगे. उनकी बातों से यह ज़ाहिर हो गया कि वे एक दलित बस्ती में एक दलित स्वयंसेवक के घर में बना खाना बैठकर खाने को तैयार नहीं थे. ये सब सुनकर मुझे बहुत झटका लगा.

उन्होंने आगे कहा है कि आरएसएस की यात्रा में मेरे साथ मेरा एक ब्राह्म्ण मित्र पुरुषोत्तम भी थे. हमने स्कूल भी साथ में ही किया था और शाखा भी साथ ही जाते थे. उस दिन वो भी उस अस्थि-कलश यात्रा में शामिल थे. दूसरे दिन पुरुषोत्तम मेरे घर पर बर्तन लौटाने आए और उन्होंने मुझे बताया कि दूसरे गांव में घूसने से पहले ही आपके घर का खाना फेंक दिया गया. अगले गांव में जा कर उन्होंने एक ब्राह्मण के घर में रात के 11 बजे खाना बनवाया और खाया.

इस बात पर मुझे यकीन नहीं हुआ कि संघ के लोग ऐसा कर सकते हैं. फिर मैं अपने मित्र  के साथ साइकिल पर बैठ कर उस जगह पर गए. जहां खाना फ़ेंका गया था. वहां जाकर मैंने देखा कि मेरे घर का खाना फेंक दिया गया था.

इस घटना के बाद मेरे अंदर एक विद्रोह पैदा हो गया. मुझे लगा कि मैं जिस हिंदू राष्ट्र को बनाना चाहता हूं उसमें मेरी जगह कहां है. जिस संघ की सेवा में मैं पूरी जिंदगी लगा देना चाहता था उसमें मेरे लिए ही जगह नहीं है तो मेरे कम्यूनिटी के लिए जगह कैसे हो सकती है.

इस घटना को लेकर मैने संघ से बात करने की सोची. आरएसएस का जो ढांचा है उसमें सवाल पूछने की गूंजाइश नहीं है. वहां सिर्फ आदेश मिलता है जिसका पालन किया जाता है. फिर भी मैंने उनसे इस बारे में पूछा, “तब उन्होंने कहा कि ऐसा कुछ भी हमारी तरफ से नहीं किया गया है. यह अपने आप हो गया और यह कोई बड़ी बात नहीं है.”

तब मैंने उनसे कहा कि,  “यह आपके लिए बड़ी बात नहीं है लेकिन मेरे लिए है. क्योंकि यदि आप मेरे घर का खाना नहीं खा सकते तो फिर मैं क्यों आपके लिए काम करूंगा.”

मैंने कहा कि मैं इस कहानी को पूरे देश के सामने रखूंगा. मैंने यह कहानी लिखी और कई जगहों पर भेजी. मैंने आरएसएस के तत्कालिन चीफ को भी एक चिठ्ठी लिखी और कई अख़बारों को भेजी. लेकिन कोई भी अख़बार उस चिठ्ठी और कहानी को छापने के लिए तैयार नहीं था.

उसके बाद मैंने सोचा कि मुझे खुद एक अख़बार निकालना चाहिए और उसमें यहीं कहानी लिखना चाहता था. तब अख़बार निकालने के लिए मैंने आवेदन दिया.

1993 में हमने ‘दहकते अंगारे’ नामक अख़बार की शुरूआत की और उस अख़बार के पहले संपादकीय में मैंने संघ की कहानी को छापा और उसमें मैंने लिखा कि, “मैं हिंदू नहीं रहना चाहता. मैं ऐसे धर्म में नहीं रहना चाहता जिसमें हमारा इतना अपमान होता है.”

ग़ौरतलब है कि भंवर मेघवंशी एक पत्रकार होने के साथ पिछले कई सालों से मानवधिकार के मुद्दे के तहत, दलित व आदिवासियों के लिए काम कर रहे हैं. एक एक्टिविस्ट होने के साथ ही उन्होंने मजदूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस) में योगदान दिया है.

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