कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

ग्राउंड रिपोर्ट: हजारों कर्मचारियों का वेतन और किसानों का बकाया लेकर डूब गया चकिया चीनी मिल, दशकों से न्याय के इंतजार में पीड़ित

पूर्व कृषि मंत्री राधामोहन सिंह के बारे में कर्मचारियों और किसानों का कहना है कि उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर चीनी मिल की संपत्ति को नुक़सान पहुंचाया.

मोदी सरकार में कृषि मंत्री रहे राधामोहन सिंह के गांव से महज 15 किलोमीटर दूर है चकिया का चीनी मिल. 25 सालों से यह चीनी मिल बंद पड़ा है. चीनी मिल बंद होने के साथ ही यहां के 1200 कर्मचारियों के वेतन और हजारों किसानों के करोड़ों रुपए डूब गए. 2014 में जब नरेन्द्र मोदी की कैबिनेट में राधामोहन सिंह को कृषि मंत्री बनाया गया, तो यहां के लोगों को उम्मीद जगी कि अब उनके साथ न्याय होगा. लेकिन, अब चकिया और उसके आसपास के किसानों का कहना है कि राधामोहन सिंह ने इस मिल को चालू कराने के लिए कोई कदम नहीं उठाया, बल्कि अपनी पार्टी के स्थानीय विधायकों और नेताओं के साथ मिलकर चीनी मिल की संपत्ति का नुक़सान कराया.

चकिया शहर के हर हिस्से में इस चीनी मिल के मारे हुए लोग मिल जाते हैं.  ऐसे ही एक शख़्स हैं अमीरी यादव. उम्र कुछ 50-55 के आसपास की होगी. ये मूलत: छपरा जिले के रहनेवाले हैं और फिलहाल चीनी मिल के अपने क्वार्टर के सामने एक छोटी सी दुकान चलाते हैं. अमीरी बताते हैं कि उनके पिता चीनी मिल के स्टाफ थे. फिर पिता के रिटायर होने के बाद 1989 में उनकी बहाली चीनी मिल में इलेक्ट्रिशियन हेल्पर के तौर पर हुई. अमीरी यादव का कहना है, “मैं जब से ज्वाइन किया उसके पहले से ही चीनी मिल घाटे में चल रही थी, फिर 1994 में मिल बंद हो गया. हम लोग बेरोज़गार हो गए. मेरा 2 लाख रुपया चीनी मिल में फंसा हुआ है. पैसे के लिए इलाहाबाद हाइकोर्ट में केस चल रहा है.”

अमीरी यादव, चकिया चीनी मिल के कर्मचारी

ऐसी ही कहानी करीब 90 साल के बुजुर्ग शिव प्रसाद शर्मा की है. साल 1960 के पहले से वे चीनी मिल में ब्रॉयलर इंचार्ज के तौर पर काम कर रहे थे. चीनी मिल बंद होने के बाद उनका 2 लाख रुपया वहां फंसा हुआ है. फिलहाल उन्हें सरकार की तरफ से 1000 रुपए का पेंशन दिया जाता है. शिवप्रसाद शर्मा कहते हैं, “हमें अब किसी सरकार से कोई उम्मीद नहीं है. बस हमारा लाखों रुपया जो फंसा हुआ है वो वापस कर दे, हम फ्री हो जाएंगे.”

बिहार सरकार के गन्ना उद्योग विभाग के मुताबिक बिहार में कुल 28 चीनी मिल हैं, जिसमें 17 चीनी मिल बंद पड़े हैं और 11 फिलहाल परिचालन में हैं. बिहार की 28 चीनी मिलों में 15 मिल बिहार सरकार की थी, जो बंद हो चुकी है. कानपुर की कंपनी बीआईसी (ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन) के पास राज्य की 3 चीनी मिलें थी. इसके अलावे बाकी के 10 चीनी मिल अन्य प्राइवेट कंपनियों के थे. चकिया चीनी मिल का मालिकाना हक बीआईसी के पास था.

क्यों बंद हुआ चकिया चीनी मिल

चकिया चीनी मिल कर्मचारी संघ के महासचिव लक्ष्मी प्रसाद बताते हैं, “साल 1985 के बाद से ही चीनी मिल घाटे में चलने लगी थी. चीनी मिल के घाटे में चलने के कई कारण थे, पहला तो यह कि चीनी मिल जितनी कमाई कर पाती थी, उससे ज्यादा यहां के अधिकारी खर्च करने लगे थे. 1989-90 के आसपास मिल के अधिकारियों ने अपने वेतन एकाएक कई गुना बढ़ा लिए, जिससे मिल पर अतिरिक्त दबाव बढ़ा. बैंक से कर्ज लिए जाने लगे और उन्हें चुकाना मुश्किल हो गया, फिर 05 सितंबर 1994 को मिल आधिकारिक रूप से बंद हो गई.”

लक्ष्मी प्रसाद बताते हैं कि चकिया चीनी मिल को बीआईसी समूह ने चंपारण सुगर कंपनी लिमिटेड के नाम से खोला था. चीनी मिल बंद होने के बाद चंपारण सुगर कंपनी लिमिटेड पर यहां के कर्मचारियों-किसानों के बकाये का भुगतान करने का दबाव बढ़ा. फिर चंपारण सुगर कंपनी लिमिटेड ने इलाहाबाद हाइकोर्ट में केस किया. इस केस की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाइकोर्ट ने इस चीनी मिल को नीलाम करने का फ़ैसला किया. साल 2001-02 में इस मिल की नीलामी मोतिहारी के विष्णुकांत गुप्ता नामक व्यवसायी से 5 करोड़ रुपए में की गई. विष्णुकांत गुप्ता ने कोर्ट से वादा किया कि वह चीनी मिल की संपत्ति को बिना नुक़सान पहुंचाए उसे फिर से चालू कराएंगे. लेकिन, ऐसा नहीं हुआ.

लक्ष्मी प्रसाद, महासचिव, चकिया चीनी मिल कर्मचारी संघ

नीलामी के बाद बैंक वालों ने विष्णुकांत गुप्ता पर दबाव बनाया कि वह चीनी मिल द्वारा लिए गए 5 करोड़ रुपए के कर्ज़ को ब्याज सहित चुकाए. विष्णुकांत गुप्ता ने बैंक को 5 करोड़ रुपए वापस कर दिए, लेकिन यहां के कर्मचारी और किसानों के बकाये का भुगतान नहीं हो सका.

चीनी मिल पर है करोड़ों का बकाया

लक्ष्मी प्रसाद बताते हैं कि जब चकिया का चीनी मिल बंद हुआ उस समय यहां करीब 1200 कर्मचारी थे. इनका करीब 3 करोड़ रुपए का बकाया चीनी मिल के ऊपर है. वहीं किसानों का 4 करोड़ रुपए चीनी मिल नहीं चुका पाया है.

चीनी मिल कर्मचारी संघ के नेता लक्ष्मी प्रसाद का कहना है कि इलाहाबाद हाइकोर्ट ने विष्णुकांत गुप्ता से बैंक के कर्ज वापस कराए हैं, इसलिए हमारे पैसे को भी कोर्ट ही वापस कराए. उनका कहना है कि हमारी लड़ाई अभी भी कोर्ट में जारी है और कोर्ट का कहना है कि दो किस्तों में कर्मचारियों के बकाये का भुगतान किया जाएगा. हालांकि किसानों के बकाये के पैसे का भुगतान करने का कोई फ़ैसला नहीं किया गया है.

अब क्या करते हैं चीनी मिल के पूर्व कर्मचारी

चकिया चीनी मिल के सैकड़ों कर्मचारी अब इस दुनिया में नहीं हैं. कई लोगों की उम्र 60 साल से अधिक की हो गई है. उन्हें सरकार द्वारा हर महीने 1000 रुपए पेंशन के तौर पर दी जाती है. बाकी के लोग या तो कहीं मज़दूरी कर रहे हैं या फिर घर के पास ही दुकान खोलकर गुजारा कर रहे हैं. उन्हें चीनी मिल की तरफ से एक-एक क्वार्टर मिला हुआ है, जिसे खाली करने का फ़रमान समय-समय पर जारी किया जाता है.

इन्हीं दुकानों के सहारे कट रही चीनी मिल कर्मचारियों की जिंदगी

चीनी मिल के कई कर्मचारियों को उम्मीद है कि कोई ऐसी सरकार आएगी जो इस चीनी मिल को चलाएगी और उन्हें फिर से पक्का रोज़गार मिल जाएगा.

चीनी मिल बंद होने की वजह से घाटे में गन्ना किसान

चकिया शहर के पास कल्याणपुर गांव के निवासी मदन सहनी बताते हैं कि जब चीनी मिल चालू था, तब दूर-दूर से लोग यहां गन्ना लेकर आते थे. अब यहां के लोगों को गोपालगंज के चीनी मिल में गन्ना लेकर जाना पड़ता है. वहां गन्ना ले जाने का ख़र्च बहुत ही अधिक होता है और मुनाफ़ा नहीं हो पाता.

मदन सहनी बताते हैं कि गन्ने की खेती से एक बार में जो कमाई पहले हो जाती थी, अब गेहूं-धान उपजाने से दो बार में भी वह कमाई नहीं हो पाती. मदन सहनी चीनी मिल की बर्बादी के लिए स्थानीय नेताओं को जिम्मेदार मानते हैं.

स्थानीय सांसद राधामोहन सिंह के प्रति है खासी नाराज़गी

चकिया के लोग स्थानीय सांसद और मोदी सरकार में कृषि मंत्री रहे राधामोहन सिंह से खासे नाराज़ दिखते हैं. लोगों का आरोप है कि राधामोहन सिंह ने इस चीनी मिल में सहायता करने की बजाय इसे लुटने का काम किया. नवल किशोर ठाकुर का कहना है, “राधामोहन सिंह बस सांढ़-भैंसा का मेला लगाते हैं. ढंग का कोई काम उन्होंने नहीं किया. कृषि मंत्री रहते हुए इधर झांकने भी नहीं आए. चीनी मिल का लोहा चोरी छिपे बिकवाने में उनका हाथ रहा है.”

पूर्वी चम्पारण जिले में तीन चीनी मिल हैं, जिसमें से 2 मिल सालों से बंद पड़ी हैं. चकिया चीनी मिल की तरह मोतिहारी चीनी मिल ने भी हजारों लोगों का रोज़गार छिना है. राधामोहन सिंह के कृषि मंत्री रहते हुए भी चीनी मिल के चालू ना होने की वजह से मोतिहारी के लोग भी काफी नाराज़ हैं. साल 2017 में यहां प्रदर्शन कर रहे चीनी मिल के दो पूर्व कर्मचारियों ने सरेआम आत्मदाह कर लिया था. प्रशासन को नोटिस  देने के बावजूद भी दो मजदूरों की जिंदगी ना बचा पाने के कारण लोग अभी भी आक्रोशित हैं.

बहरहाल, चकिया चीनी मिल अब किसी राजा के ध्वस्त किले की स्थिति में पहुंच चुका है. मिल की संपत्ति के नाम पर कई एकड़ ज़मीन आवारा पड़े हैं. इन पर बकरियां चर रही हैं, बच्चे गिल्ली डंडा खेल रहे हैं और इन्हीं के बीचोंबीच एक क्वार्टर में चकिया डीएसपी का आवास है. स्थानीय लोग कहते हैं कि डीएसपी साहब ग़ैर कानूनी रूप से चीनी मिल की ज़मीन को हथियाए हुए हैं.

चीनी मिल का वीरान कैंपस

नोट: न्यूजसेंट्रल24X7 ने  पूर्व कृषि मंत्री  और मोतिहारी के सांसद राधामोहन सिंह से बात करने की कोशिश की, उनके असिस्टेंट ने कहा कि साहब अभी उपलब्ध नहीं हैं, एक मैसेज छोड़ दिया जाए. न्यूजसेंट्रल ने टेक्स्ट मैसेज छोड़ दिया है. उनका पक्ष आने पर रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.

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