कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

36 दिनों बाद ख़त्म हुई बिहार के आशा कार्यकर्ताओं की हड़ताल, सरकार ने क्या दिया- झुनझुना?

आशाओं के तीन संगठन बिहार राज्य आशा कार्यकर्ता संघ, आशा संघर्ष समिति और आशा कर्मी संघ ने आशा संयुक्त संघर्ष मंच के अधीन आकर हड़ताल किया था.

“हम त मारय छियय मुक्का कपार में हमरा नोकरी नय मिललय बिहार में, दिनभर घुमयत रहलउ समाज में फुटल कउरी नय भेटल हाथ में. आशा कार्यकर्ता के नय छय वेतन कोना क कटतय हुनको जीवन, कोना गुजर हेतय परिवार में. हम त मारय छियय मुक्का कपार में.” (हमलोग अपना सिर पीट कर रह जाते हैं, दिनभर समाज में घूमने पर भी हमें फूटी कौड़ी भी नसीब नहीं होती. आशा कार्यकर्तओं को कोई वेतन नहीं मिलती ऐसे में उनका जीवन कैसे कटेगा) अपनी स्थानीय भाषा में ये लाइन हमें सुना रही थी मुज़फ्फरपुर ज़िले की आशा और बिहार चिकित्सा एवं जन स्वास्थ्य कर्मचारी संघ के तहत चलने वाले आशा संघर्ष समिति की अध्यक्ष मंजुला कुमारी.

पिछले एक दिसम्बर से राज्यभर की आशा कार्यकर्ताओं द्वारा मांगों को लेकर व्यापक हड़ताल चल रहा था, जिसे बीते 6 जनवरी को बिहार सरकार के आश्वासन के बाद वापस ले लिया गया है. घोषणा के बाद 10 जनवरी से सभी कार्यकर्ता अपने अपने काम पर लौट गई हैं. इसी सिलसिले में जब न्यूज़सेंट्रल24×7 मंजुला जी के पास पहुंचा तब उन्होंने इसी वाक्य के ज़रिए अपनी पीड़ा व्यक्त की. जब उनसे पूछा गया कि क्या वो इस फैसले से खुश हैं? तो उन्होंने कहा कि मजबूरी में हमें ये फैसला मानना पड़ा है, जब सरकार ने अपने हाथ खड़े कर लिए तब हम क्या कर सकते हैं.

आशाओं के तीन संगठन बिहार राज्य आशा कार्यकर्ता संघ, आशा संघर्ष समिति और आशा कर्मी संघ ने आशा संयुक्त संघर्ष मंच के अधीन आकर हड़ताल किया था. इसमें 12 मांगें रखी गई थीं. आशा कर्मी को सरकारी कर्मचारी घोषित कर न्यूनतम मजदूरी मूल्य 18 हजार रुपए देने और इसके अलावा शिक्षित आशा को नर्सिंग में एएनएम के लिए प्रशिक्षित करने जैसे अन्य मांग रखे गए थे. लेकिन, सरकार के साथ चार चरणों में चली वार्ता के बाद इन मांगों को ख़ारिज़ कर दिया गया. वहीं आशा कार्यकर्ता को एक हजार रु महीने मानदेय देने और इसके अतिरिक्त आशा के लिए एएनएम पद पर दस प्रतिशत सीट आरक्षित करने की बात कही गई है.

आकड़ों के मुताबिक प्रदेश में लगभग एक लाख आशा कार्यकर्ता कार्यरत हैं. वर्तमान में  भारत में इनकी संख्या दस लाख है. वहीं बिहार दूसरा राज्य है जहां बड़ी संख्या में आशा अपनी सेवाएं दे रही हैं.   

कौन हैं आशा कार्यकर्ता और क्या है इनका काम

साल 2005 में ग्रामीण भारत तक स्वास्थ्य लाभ और सस्ती दवा सुगमता से पहुंचाने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य़ मिशन की शुरुआत की गई. इसके तहत हर पंचायत में एक हज़ार की आबादी पर एक आशा (एक्रिडिटेड सोशल हेल्थ एक्टिविस्टस् यानि मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता)  को ग्रामीणों तक स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने के लिए नियुक्त किया गया. आशा का चुनाव गांव में रहने वाली महिलाओं के बीच से किया जाता है. यह बिना वेतन काम करने वाली स्वयंसेवी कार्यकर्ता के रुप में कार्य करती हैं.

यह कार्यकर्ता राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के स्वास्थ्य कार्यक्रमों की केंद्र बिंदु हैं. इनका मुख्य काम लोगों को सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली से जोड़ना है. इस कार्यक्रम में 25 साल से 45 साल की महिला को नियुक्त कर तीन से चार हफ्ते का प्रशिक्षण दिया जाता है. इनका काम गर्भवती महिलाओं को प्रसव के लिए अस्पताल तक लाना, प्रसव के बाद मां और बच्चे की देखभाल करना, गर्भवती महिला को अस्पताल की देखरेख में जांच के लिए जागरुक करने के साथ साथ ग्रामीण क्षेत्रों में घूम-घूम कर पोलियो की बूंद पिलाना है. इसके अलावा गांव में टीबी, मलेरिया जैसे और कई बीमारियों वाले मरीजों को ढूंढ कर लाने और इन सब की सूची बनाने की जिम्मेदारी भी इन्हें दी जाती है. आशा को 52 तरह के छोटे-बड़े काम सौंपे गए हैं.

क्या है समस्या

वैसे तो कई परेशानियां हैं मगर काम के बदले मिलने वाली प्रोत्साहन राशि में देरी आशाओं की सबसे जटिल समस्या है. तरयानी ब्लॉक, शिवहर ज़िले की आशा रुक्मिनी देवी कहती हैं, “हम आगे काम करते जा रहे हैं, लेकिन पिछले सालों का पैसा अभी तक अटका हुआ है. बिना वेतन, छुट्टी और समय सीमा के हम 24 घंटे काम करते हैं.”

वही, मंजुला बताती हैं, “जब से ये आंदोलन शुरू हुआ है, तब से कई कार्यकर्ता के बैंक खाते में बकाया पैसा आया है. पिछले कितने साल का पैसा बकाया है पूछने पर वह कहती हैं किसी का साल 2007-08 का पैसा नहीं मिला है तो किसी का 2009-10 का. पहले ऐसी अनियमितता बहुत होती थी.”

मसौढ़ी की मीरा सिंहा कहती हैं कि अब प्रसव का पैसा तो मिल जाता है मगर टीबी, मलेरिया और कुष्ठ रोगों के मरीजों को अस्पताल तक ले जाने पर मिलने वाली राशि का कोई अता पता ही नहीं रहता है.

प्रधानमंत्री द्वारा की गई घोषणा की सच्चाई

साल 2018 के अक्टूबर महीने में केन्द्र सरकार द्वारा आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं को मिलने वाली राशि को दोगुना करने की बात कही गई थी. मगर ज़मीनी हकीकत कुछ और ही है. शिवहर ज़िले की ही एक आशा फैसिलिटेटर सुलेखा का कहना है कि उन्होंने समाचार के माध्यम से सुना था कि प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद उसे 4000 से बढ़कर 6000 रु वेतन के तौर पर मिलेंगे, लेकिन इसकी कोई खबर विभाग द्वारा उन्हें अभी तक नहीं मिली है.

काम के बदले मिलने वाली प्रोत्साहन राशि

आशाओं को अलग अलग काम के बदले अलग अलग प्रोत्साहन राशि दी जाती है. इन कार्यकर्ताओं को महीने में एकमुश्त रकम नहीं मिलती है. केंद्र सरकार द्वारा बीते साल के सितम्बर माह में इनके मानदेय में इज़ाफ़ा किया गया था. जिसके बाद आशा को एक प्रसव पर 600 रुपए मिलते है. आशा को मिलने वाली राशि में 40 प्रतिशत केंद्र और 60 प्रतिशत राज्य का हिस्सा होता है और इन्हें कुल 52 तरह के काम करने पर भुगतान किया जाता है.

आशा की नियुक्ति के बाद क्या आया बदलाव

पूरी दुनिया में बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए कार्य करने वाली संस्था यूनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रेन्स फंड (यूनिसेफ) के एक आर्टिकल के मुताबिक बिहार में करीब 71,000 हजार आशा कार्यकर्ता 1.1 लाख महिलाओं को सुरक्षित प्रसव कराने में मदद कर रही हैं. लेख के अनुसार राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के पहले तीन वर्षों में संस्थागत प्रसव 10.8 लाख से बढ़कर 14.5 लाख हो गया.

इससे पूर्व वर्ष 1999 में केवल 15.9 प्रतिशत महिलाएं ही गर्भधारण के दौरान ज़रूरी जांच प्राप्त कर पाती थी जो बढ़कर 26.4 प्रतिशत हो गया है. वहीं वर्ष 1998 में केवल 14 प्रतिशत महिला प्रसव के दौरान अस्पताल की ओर रुख करती थी और अब यह आंकड़ा बढ़कर 47.9 प्रतिशत हो गया है. इसके अलावा पिछले तीन साल में 12 से 23 महीने के शिशुओं की आबादी में 32.8 प्रतिशत से सीधा 43.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.

क्या चाहती हैं आशा

मंजुला से जब हमने पूछा अब वह सरकार से क्या चाहती है तो उन्होंने कहा कि हम बस इतना चाहते हैं कि माननीय स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे जी ने जो बाते प्रेस कॉन्फ्रेंस में कही हैं, वो सब ज़मीन पर लागू हो जाए वही काफ़ी है.

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