कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

बिहार: आंदोलनरत “आशा” से नहीं मिले नीतीश कुमार, अब FIR करने में लगे हैं उनके सिपहसालार

पूर्वी चंपारण के सिविल सर्जन डॉ. बी. के सिंह ने कहा है कि आंदोलन में शामिल आशा फ़ैसिलिटेटरों पर एफ़आईआर किया जाएगा.

बिहार में पिछले 15 दिनों से आशाकर्मियों की हड़ताल लगातार जारी है. इस क्रम में पिछले 13-14 दिसंबर को राजधानी पटना के गर्दनीबाग में करीब 40 हजार आशा कार्यकर्ताओं ने अपनी मांगों को लेकर विरोध प्रदर्शन किया. सरकार ने इन प्रदर्शनकारियों से मुलाकात नहीं की और न हीं कोई ठोस निर्णय लिया गया. लिहाजा, यह आंदोलन अभी भी जारी है.

इसी क्रम में पूर्वी चंपारण जिले के सिविल सर्जन डॉ. बी. के सिंह ने एक फ़रमान जारी कर दिया है. उन्होंने जिले की आंदोलनरत आशाओं पर एफ़आईआर दर्ज करने के आदेश जारी किए हैं. प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारियों को भेजे अपने आदेश में उन्होंने कहा है कि आशा के इस आंदोलन में आशा फ़ैसिलिटेटर भी शामिल हो रही हैं, जिसकी वज़ह से सरकारी काम को नुकसान हो रहा है. उन्होंने कहा है कि यह हड़ताल आशा कर्मियों का है और आशा फ़ैसिलिटेटर इसमें उनका साथ दे रही है. ऐसे में जो आशा फ़ैसिलिटेटर इस आंदोलन में साथ दे रही हैं, उन्हें चयनमुक्त किया जाए.

इधर आशा संघर्ष समिति की अध्यक्ष मीरा सिन्हा ने न्यूज़सेंट्रल24X7 से बातचीत में कहा है कि यह आंदोलन आशा और आशा फ़ैसिलिटेटर दोनों का है. इनमें दोनों की मांगें शामिल हैं. मीरा सिन्हा बताती हैं कि मैं खुद आशा फ़ैसिलिटेटर हूं और सरकार हमें महीने में बस दिन का भत्ता देती है. हम इसके ख़िलाफ़ आंदोलन में उतरे हैं. हमें महीने का उचित मानदेय दिया जाए.

न्यूज़सेंट्रल24X7 ने सिविल सर्जन डॉ. बी.के सिंह से भी बातचीत की. 12 दिसंबर को न्यूज़सेंट्रल से बातचीत में उन्होंने बताया कि उनके कार्यालय से एफ़आईआर दर्ज़ करने का कोई आदेश नहीं भेजा गया है. इस बीच न्यूज़सेंट्रल24X7 को जिला सिविल सर्जन के आदेश की प्रतिलिपि मिली है. 8 दिसंबर को जारी इस आदेश में उन्होंने एफ़आईआर दर्ज करने की बात कही है.

आशा और आशा फ़ैसिलिटेटर में क्या संबंध है?

सरकार ने 2006 में आशा कार्यकर्ताओं की बहाली की थी. ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार के लिए इनकी नियुक्ति की गई थी. इन आशा कार्यकर्ताओं का मुख्य काम टीकाकरण, बंध्याकरण, प्रसव पूर्व और प्रसव के बाद जच्चे-बच्चे की जांच आदि काम शामिल था.

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साल 2011 में सरकार ने इन्हीं आशा में से कुछ लोगों को चुनकर आशा फ़ैसिलिटेटर बनाया. तब से इन्हें आशा के साथ-साथ आशा फ़ैसिलिटेटर का काम भी देखना था. इसके लिए सरकार हर महीने 1,000 रुपए देती थी. इसके बाद सरकार ने समय-समय पर इस भत्ते को बढ़ाया. अक्टूबर 2018 तक उन्हें हर महीने 4,000 रुपए दिए जाते हैं. अक्टूबर में केंद्र सरकार ने आशा फ़ैसिलिटेटरों को आशा का काम करने से मुक्त कर दिया. अब उन्हें सिर्फ आशा कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी निभाने की बात कही गई.

आशा संघर्ष समिति की अध्यक्ष मीरा सिन्हा ने कहा कि हमारा संगठन आशा और आशा कार्यकर्ताओं दोनों के लिए हैं. क्योंकि सभी आशा फ़ैसिलिटेटर कुछ महीने तक आशा का ही काम करती रही हैं. इसलिए इस आंदोलन में आशा और आशा फ़ैसिलिटटर को अलग करके देखना बिल्कुल ग़लत है. उन्होंने कहा है कि हमारा आंदोलन शांतिपूर्ण है और भविष्य में भी आपात स्वास्थ्य सुविधाओं को बंद करने की हमारी कोई योजना नहीं है.

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