कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

भारत में गरीबों को न्याय नहीं मिलता: दबंगों ने जिस मुसलमान युवक को बेरहमी से पीटा, कथित तौर पर पेशाब पिलाया-उसने बयां किया अपना दर्द

बीते 10 मई को ज़मीनी विवाद के रंजिश में दबंगों ने सद्दाम को बहुत बेरहमी तरीके से पीटा, फिर प्यास लगने पर कथित तौर पर पेशाब पिला दिया था.

कटिहार: 2 जून, रविवार का दिन. बीते रात की बारिश ने ज़मीन की तपिश को शांत कर दिया है. लेकिन बीस दिन गुजर जाने के बाद भी सद्दाम हुसैन(25) के जख़्म हरे हैं. बहुत मुश्किल से अपनी पीठ का जख़्म दिखाते हुए कहता है, “कहां है न्याय सर? कहां है? भारतीय संविधान में न्याय की व्यवस्था है..पर एक गरीब को न्याय नहीं मिलता. बीस दिन पहले दंबगों ने मुझे बांधकर हथौड़े और सरिए से पीटा. जब प्यास लगी तो पेशाब पिला दिया. सर मैं रोज़ा में था. और पुलिस आई तो उसने क्या किया..? मुझे उसी हालत में मनिहारी थाना के हाजत(हवालात) में बंद कर दी. मैं छटपटाता रहा और कहता रहा कि मेरा इलाज करवा दो.”

जेल से छूटने पर अपने गांव नया टोला बहादुरपुर(मनिहारी) आने के बाद से सद्दाम अधिकतर समय खाट पर ही पड़ा रहता है. पीठ के जख़्म के निशान अभी ताज़े हैं और पैर का घाव अभी भी नासूर बना है. चलने में परेशानी है. डॉक्टर ने ज़्यादा बोलने से भी मना किया है.

सद्दाम हुसैन, फ़ोटो-दीपक कुमार

10 मई, 2019. लोकसभा चुनाव की शोरगुल में जो ख़बरें दब गईं, उसमें एक ख़बर सद्दाम हुसैन की भी थी. ज़मीनी विवाद के रंजिश में दबंगों ने सद्दाम को बहुत बेरहमी तरीके से पीटा, फिर प्यास लगने पर कथित तौर पर पेशाब पिला दिया. सद्दाम उस समय रोज़े में था. मामले में दोनों तरफ़ से एफ़आईआर दर्ज कराई गई. पुलिस ने एफ़आईआर को आधार बनाकर दोनों तरफ़ से एक-एक व्यक्ति को हिरासत में ली. जिसमें सद्दाम भी शामिल था. सद्दाम पर आरोप है कि उसने दूसरे पक्ष के घर में आग लगा दी.

सद्दाम  जिस चारपाई पर लेटा है, उसके सिराहने उनकी मां नरगिस फातिमा भी बैठी हैं.  बताती हैं, “सद्दाम बगल के बांध(अलकनंदा बांध) पर अपना क्लीनिक खोला है. उस दिन सुबह क्लीनिक पर दो रोगियों को बैठा कर आया था. सुई लेकर घर से जा ही रहा था कि बीच में उन्होंने इसे पकड़ लिया. घर में खींच कर ले गए..बहुत पिटाई किए.”

फातिमा ख़ून के धब्बे से मटमैल सद्दाम की फट्टी जीन्स दिखाती हैं. रुआंसे भरी आवाज़ में कहती हैं, “अभी रोज़ा में हूं..पश्चिम की ओर हाथ कर के बोल रही हूं. झूठ नहीं बोलूंगी. फेकू कर्मकार(दूसरा पक्ष) के बेटे ने मुझे दो लाठी ऐसे जगह पर मारे कि मैं किसी को दिखा नहीं पाई. मैं चिखती चिल्लाती रही लेकिन पुलिस वालों ने मुझे मेरे बाबू को नहीं देखने दिया”

सद्दाम की मां नरगिस फ़ातिमा, फ़ोटो-दीपक कुमार

सद्दाम के अनुसार पुलिस उसे गिरफ़्तार कर आगे मनिहारी थाने के हाजत में रखती है. जब वहां हालत खराब होती है तो अनुमंडल अस्पताल ले जाती है. फिर वहां से सदर अस्पताल कटिहार रेफर कर दिया जाता है.

सद्दाम का चचेरा भाई मोहम्मद वसीम(25) मोबाइल में तस्वीरें दिखाते हुए कहता है, “सद्दाम चार दिन तक कटिहार के सदर अस्पताल में था. पुलिस चारों दिन अस्पताल में भी हथकड़ी लगाकर रखती है. जब ठीक हुआ तो तुरंत जेल में डाल दी. यह कहां का इंसाफ़ है कि पीड़ित जेल में जाए और अपराधी आज़ादी से घूमे?”

वसीम दिल्ली के पालम में मज़दूरी का काम करता है, बताता है कि, “12 साल से ज़मीन का विवाद है. पिछले तीन सालों से हर रमजान में किसी न किसी को यह लोग मारते ही हैं. इस बार इनका निशाना सद्दाम बना है. जब मैं 14 साल का भी नहीं था तो फ़र्जी केस फंसाकर मुझे जेल में डलवा दिया गया. तब से मैं इस मामले को देख रहा हूं. इसमें प्रशासन हमेशा धार्मिक आधार पर काम करती नज़र आता है. हमलोग थाना में शिकायत करने जाते है कि उससे पहले ही हम पर फ़र्जी मुक़दमे दायर हो जाते हैं. आख़िर हमलोग कहां जाएं?”

घायल सद्दाम( फ़ाइल फ़ोटो)

12 सालों से चल रहा है ज़मीन विवाद का मामला

सद्दाम हुसैन के पिता अब्दुल सत्तार(52) चार भाई हैं. अब्दुल रज्जाक(55) बड़े भाई हैं तो अबदुल रऊफ़(50) और अब्दुल सोभान(40) दो छोटे भाई हैं. 50 साल पहले इनके पिता इजाबुल हक़ ने नंद कुमार दुबे और सुदामा दुबे से नया टोला बहादुरपुर में 66 डिसमिल की ज़मीन खरीदी थी. तब से इनकी ज़मीन का रसीद कटते आ रहा है.

अब्दुल रऊफ़ बताते हैं, ” जब दुबे परिवार अपनी ज़मीन बेचकर कहीं चले जाते हैं तो बाद के सर्वेक्षण में पता चला कि उनकी जमीन 66 डिसमिल न होकर उससे ज़्यादा 99 डिसमिल की है. हमने सोचा कि 66 डिसमिल तो अपना है ही…बाकी दुबे परिवार की 33 डिसमिल ज़मीन को उनके परिवार के सदस्यों के आने के इंतज़ार में छोड़ दिया जाए. आख़िर हम बेईमानी क्यों करेंगे. हमने दुबे परिवार के बची जमीन के मार्फ़त(नंदकिशोर दुबे के नाम पर) एक बार रसीद भी कटवा लिया था. ताकी उनकी ज़मीन सुरक्षित रहे. लेकिन 2007 में मामला गड़बड़ हो जाता है. जब हम नंदकिशोर दुबे की ज़मीन की मार्फ़ती रसीद कटवाने पहुंचे तो कर्मचारी बोला कि इस 33 डिसमिल ज़मीन से 14 डिसमिल ज़मीन अब घट गया है. जब मैंने इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि इसका वासगीत पर्चा(भूमिहीन परिवार को ज़मीन के लिए जारी किए जाने वाला अधिकार पत्र) बन गया है.”

रऊफ़ आगे बताते हैं, “हमने उस समय पूछा कि किसके नाम से वासगीत पर्चा बना है तो उसने बताया कि फेकू कर्मकार, बैजनाथ कर्मकार, दिलीप कर्मकार और मंदिर के नाम पर 14 डिसमिल का पर्चा बन गया है. हमने जब इसको लेकर ब्लॉक में पता किया तो वहां इस वासगीत पर्चा को कोई रिकॉर्ड ही नहीं मिला. इन्होंने नकली पर्चा तो बनवा लिया है..लेकिन उसमें चौहदी का विवरण नहीं है. बस दो तरफ़ की चौहदी है…दो तरफ़ कुछ लिखा नहीं है. तब से विवाद बहुत बढ़ गया है.”

कर्मकार परिवार को मिला वासगीत पर्चा, जिसमें दो तरफ़ की ही चौहदी का विवरण है.

सद्दाम हुसैन के बड़े पापा अब्दुल रज्जाक कहते हैं, “हमने झगड़ा झंझट से दूर रहने के लिए ही 2007 में कोर्ट में टाइटल सूट केस फाइल कर दिया था. हमारे पास तमाम सबूत हैं..हमारी गवाही हो चुकी है. हमने कर्मकार परिवार से भी कहा कि कोर्ट में तुम अपना सबूत रखो लेकिन यह लोग 12 साल में एक पर्चा भी कोर्ट में दाखिल नहीं कर पाए. जबरदस्ती अब हमारी ज़मीन पर भी घर उठा रहे हैं. अब हम ये कैसे होने दे सकते हैं.”

सद्दाम के परिवार पर इसी ज़मीन विवाद को लेकर मनिहारी और आमदाबाद थाने में विभिन्न धाराओं के तहत कई केस दर्ज हैं. स्थानीय प्रशासन इस मामले को सुलझाने में नकामयाब साबित हुआ है.

रऊफ़ बताते हैं, “अब हम शिकायत करने थाना नहीं जाते हैं. क्योंकि जब जाते हैं तो हम पर उलटे एफ़आईआर दर्ज कर दिया जाता है.”

वो 2007 से अब तक दर्ज एफ़आईआर विवरण को दिखाते हैं, “आप दर्ज एफ़आईआर का नंबर देखिए…यदि मेरे द्वारा दर्ज कराए गए एफआईआर का नंबर 65 है तो उनका 66 होगा…मेरा 151 है तो उनका 152 होगा. यानी हर केस में काउन्टर केस. कई बार तो हम थाना शिकायत करने पहुंचे उससे पहले ही हम पर मुक़दमा दर्ज रहता है..जाते ही पुलिस हमें हाजत में डाल देती है. इसलिए अब केस भी सीधे कोर्ट में ही कर रहे हैं. प्रशासन पर बिल्कुल भरोसा नहीं रह गया है.”

सद्दाम के चाचा अब्दुल रऊफ़

हालांकि दूसरे पक्ष के बैजनाथ कर्मकार सद्दाम के परिवार को दोषी ठहराते हैं. वो कहते हैं कि “10 मई को पेशाब पिलाने वाला मामला बिल्कुल झूठ है. सुबह 8-9 बजे की घटना है. उस समय किसी को प्यास कैसे लग सकती है. यह लोग 2007 से ही हमें परेशान कर रहे हैं. हमारे घरों पर बड़े-बड़े पत्थर चलाया करते हैं.”

कोर्ट में सबूत जमा करने को लेकर जब बैजनाथ कर्मकार से सवाल किया जाता है तो वो कहते हैं, “वासगीत पर्चा पर क्या सबूत पेश करें. सरकार कह रही हैं कि हम बसने के लिए ज़मीन देते हैं क़ानूनी लड़ाई लड़ने के लिए नहीं. अब वो लोग टाइटल सूट केस दर्ज किए हैं तो हम उनके पीछे-पीछे फॉलो कर रहे हैं.”

न्यूज़सेन्ट्रल ने इस बाबत मनिहारी थाना को भी फ़ोन लगाया. थाने के तरफ़ से यह जानकारी दी गई कि यह मामला पूरी तरीके से ज़मीन विवाद का है. पेशाब पिलाने जैसा कोई मामला नहीं आया है. पीड़ित के बयान के आधार पर ही एफ़आईआर दर्ज किया गया है. फिर दोनों तरफ़ से एक-एक व्यक्ति को हिरासत में भी लिया गया. मामला को बढ़ाने के लिए ऐसी बातें बताई जा रही है.

सद्दाम हुसैन द्वारा दर्ज कराई गई एफ़आईआर

हालांकि एफ़आईआर को लेकर सद्दाम का कहना है कि अस्पताल में मुझसे बयान नहीं लिया गया. पहले से ही पुलिस एफ़आईआर लिखकर रखी थी जिस पर मुझसे बस साइन करवा लिया गया. सद्दाम कहते हैं, ” मैं बार-बार कह रहा हूं मेरे साथ ग़लत हुआ है. लेकिन क्या कहेंगे जिसके साथ यह हुआ उसे ही पुलिस जेल में डाल देती है. अब न्याय की क्या उम्मीद करूं. यह न्याय नहीं है सर. यह न्याय नहीं है.”

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