कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

ग्राउंड रिपोर्ट: “जब से यह सरकार बनी है, चारों तरफ़ तो दंगे ही हो रहे हैं” सांप्रदायिक दंगे की आहट से जूझता नवादा का कोनीबर गांव

5 मई को बच्चों की लड़ाई से मामला तूल पकड़ा और धीरे-धीरे सांप्रदायिक रंग ले लिया.

7 मई, रात के 11 बजे. बिहार के नवादा ज़िले का कोनीबर गांव कूप अंधेरा में डूबा है. एकाध घर की मुंडेरों पर बल्ब टिमटिमा रहे हैं. बाकी गली-मुहल्ले की स्ट्रीट लाइटें बुझा दी गई हैं. बीते दिनों बच्चों की आपसी लड़ाई के एक मामूली झगड़े ने सांप्रदायिक रंग पकड़ लिया था, जिससे दोनों पक्ष ख़ौफ़ में जी रहे हैं.

मैं जिस घर की छत पर लेटा हूं, वो बिल्कुल खाली है. घर के मालिक कभी-कभार ही पर्व-त्यौहार पर यहां आते हैं. मेरे साथ अहमद नेयाज़ (25) भी हैं. नेयाज़ लेटे-लेटे ही दूर का घर दिखाता है, “आप देख रहे हैं न वो घर, मेरा घर वही है. लेकिन मैं डर से यहां छिपा हूं. सारे मर्द लोग गांव से बाहर चले गए हैं. केस में 28 लोगों का नाम है…इसमें मेरा भी हो सकता है.”

नेयाज़ बहुत परेशान है. बार-बार अपने मोबाइल में सरकारी परीक्षा की तैयारी कराने वाला विडियो देखता है…और फिर उसे बीच में रोक कर पूछने लगता है, “मैं लड़ाई में नहीं गया था.. क्या मेरा भी नाम उन्होंने डाल दिया होगा? डाल ही दिए होंगे, मुझे वे पहचानते हैं, मैं उनके साथ बचपन से क्रिकेट खेलते आया हूं. आप एफ़आईआर की कॉपी देखेंगे तो प्लीज़ बताइएगा.”

नेयाज़ अहमद ने इस बार रेलवे ग्रुप डी की परीक्षा पास की है. बस ज्वाइनिंग लेटर का इंतज़ार ही कर रहा था कि गांव में यह कांड हो गया. छोटी-सी लड़ाई ने हिंदू-मुसलमान सांप्रदायिकता का रूप ले लिया. दोनों तरफ़ से 11 लोग जेल चले गए. बाकी नामज़द लोगों को पुलिस खोज रही थी.

कोनीबर गांव, फ़ोटो-दीपक कुमार

कांड की शुरुआत बच्चों के बीच लड़ाई से हुई. 5 मई की शाम को कोनीबर बिहारी बिगहा टोला (यादवों का टोला) में साइकिल की घंटी बजाने को लेकर बच्चों की बीच बहस हो जाती है. साइकिल सवार (मुस्लिम टोले के लड़के) को बिगहा टोले के कुछ लड़के एक-दो थप्पड़ जड़ देते हैं. बाद में थप्पड़ मारने की शिकायत को लेकर लड़के के परिजन बिहारी बिगहा पहुंचते हैं. लेकिन, बात बनने की बजाय और बिगड़ जाती है. फिर गाली गलौज और मारपीट शुरू हो जाती है. रात में ही मुस्लिम टोले की तरफ़ से नरहट थाने में केस दर्ज कर दिया जाता है.

लेकिन मामला यहीं नहीं रूकता. अगले सुबह तकरीबन 11 बजे गांव से बाहर जाते दो मुस्लिम लड़कों की पिटाई कर दी जाती है. फिर मुस्लिम टोले की तरफ़ से भी लोग बिहारी बिगहा पहुंचकर लड़ाई-झगड़ा कर देते हैं. मामला काफ़ी आगे बढ़ जाता है और साम्प्रदायिक रंग लेने लगता है. फिर भारी संख्या में पुलिस जवान पहुंचकर स्थिति को काबू में करते हैं.

मोहम्मद परवेज भी बगल वाले छत पर टहल रहे हैं. बार-बार आकर नेयाज़ को सतर्क रहने की हिदायत देते हैं. कहते हैं, “मैं रिलायंस में सेल्स मैन हूं. ईद के लिए घर पर आया था. पर यह मामला हो गया. यह रात मेरे जीवन की सबसे भारी रात है. आज तक गांव में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. लेकिन इस बार…….” वो आगे चुप हो जाते हैं.

गांव में ऐसा पहली बार हुआ है. यह बात हर आदमी की जुबान पर है. लेकिन यह अचानक क्यों हो गया कोई नहीं बता पा रहा है.

मैं 6 मई की शाम को कोनीबर पहुंचा हूं. तनाव बरकरार है. पुलिस मुस्लिम टोले के बाहर ही डेरा जमाई दिखती है. मेरे वहां पहुंचते ही दूर से आवाज़ आती है- इधर आ जाइए. ध्यान से देखा तो एक लड़की मेरे पास भागी चली आ रही है, “जी मैं सईद निशा, मैंने ही आपको फ़ोन किया था.”

मैं उसे घबराए देख पहला सवाल यही करता हूं कि अब कैसा है माहौल? निशा कहती हैं, “आगे घर चलिए…बाहर ठीक नहीं. हम वहीं इत्मिनान से बात करते हैं. सुनसान संकरी गली से एक पुराने घर पहुंच जाता हूं, जहां तीन-चार महिलाएं पहले से ही बैठी हैं.”

गांव के माहौल के बार में बात करती महिलाएं, फ़ोटो-दीपक कुमार

बुज़ुर्ग महिला हसीना खातून (70) जो काफ़ी डरी हुई दिखाई देती हैं, कहती हैं, “पहली दफ़ा मैं देख रही हूं. पहले कभी लगा ही नहीं कि वो अलग जात है और मैं अलग. उनकी खुशी में हमलोग शामिल होते आए हैं और हमारे खुशी में वे लोग. पर आज तो दम आ रहा है और दम जा रहा है. हम तो सभी के लिए मरेंगे…मेरे लिए सब बराबर हैं.”

रिज़वाना काज़मी (52) जो कि आंगनवाड़ी सेविका हैं, कहती हैं, “हमलोग का आपस में काफ़ी भाईचारा है. लेकिन मुझे उस वक्त घबराहट हुई, जब यहां ‘बजरंग बली की जय’ और ‘जय श्रीराम’ के नारे लगे. जब उधर से यह आवाज़ आई तो हमने यह महसूस किया कि अब हम सुरक्षित नहीं हैं. फिर भी हमें विश्वास है कि हमारा गांव आज भी और गांवों से अलग है. सबकुछ सही हो जाएगा.”

और गांवों से अलग होने के बावजूद भी आपके गांव का छोटा सा झगड़ा सांप्रदायिक रंग ले लेता है, इस सवाल के जवाब में बगल में बैठीं नूरुस सबा कहती हैं, “जब से यह सरकार बनी है, चारों तरफ़ तो दंगे ही हो रहे हैं. आख़िर ऐसा क्यों है? पिछले कुछ सालों से यहां रामनवमी भी अलग तरीके से मनाई जा रही है. मुझे तो यहां के लोगों से नहीं सरकार से शिकायत है.”

कोनीबर नरहट थाना क्षेत्र का एक छोटा सा गांव है. मुश्किल से सौ घर होंगे. दोनों समुदायों की आबादी यहां बराबर है. बिहारी बिगहा के लोग मुस्लिम टोले के खेतों में काम करते हैं. इसलिए हमेशा एक-दूसरे के यहां आना जाना लगा रहता है. नवादा में सांप्रदायिक दंगों का रिकॉर्ड होने के बावजूद यह गांव इन झंझटों से काफ़ी दूर रहा है. लेकिन इस बार सबकुछ ठीक नहीं है.

मोहम्मद महताब आलम, जिसकी उम्र अभी मात्र 14 साल की है. सिर और बाजू पर गंभीर चोटें आई हैं. कहता है, “मुझे मुसलमान कहकर मारा गया है. लाठी-डंडे लेकर इतने लोग जुट गए थे. मैं और मेरा दोस्त सुबह में तो टिकट लेने के लिए गांव से बाहर जा रहे थे.”

मोहम्मद महताब आलम, फ़ोटो- दीपक कुमार

मुस्लिम टोले का कहना है कि बिहारी बिगहा छोटा सा टोला है. जहां ज़्यादा घर नहीं हैं. लेकिन इस मामले में बाहरी लोग भी शामिल हो रहे हैं. धार्मिक आधार पर भीड़ जुटाया गया है. हम यह नहीं कहेंगे कि हमने बचाव में कुछ नहीं किया.

नाम नहीं बताने के शर्त में एक लड़का बताता है, “इसमें हमारे तरफ़ से गलती नहीं हुई है. लेकिन जब हमारे लोगों का मारा गया तो हमने भी रिएक्शन के तौर पर कदम उठाए. बाद में फायरिंग भी हुई, पर पता नहीं कौन किया.”

आपसी झगड़े में बिहारी बिगहा टोले को भी नुकसान पहुंचा है. किसी के घर की दीवार ढहा दी गई है तो किसी के मोटर तोड़ दिए गए हैं. लोगों में काफ़ी गुस्सा है. एकाध को छोड़कर बाकी लोग किसी प्रकार के समझौते के पक्ष में नहीं दिख रहे हैं.

एक व्यक्ति नाम नहीं बताने के शर्त में कहता है, “सर हमें मामला को आगे नहीं बढ़ाना है. हम भी यही चाहते हैं कि अब यह खत्म हो. हम उनके खेतों में काम करते हैं.” लेकिन उस भीड़ में इस आदमी की आवाज़ दब गई है. बात अब हिंदू और मुसलमान पर आ गई है.

आपसी झगड़े में बिहारी बिगहा टोले को भी नुकसान पहुंचा है, फ़ोटो- दीपक कुमार

हालांकि तनाव के बीच भी मुस्लिम लोगों के तरफ़ से समझौते का हाथ बढ़ाया जा रहा है. कुछ लोग बिहारी बिगहा से भी तैयार हैं. लेकिन एक-बार हिंदू मुसलमान हो जाने के बाद मामला अब पहले जैसा नहीं रह गया है. नेयाज़ अहमद कहता है, “हम लोग एक ही टीम में क्रिकेट खेलते थे. हमारी अलग टीम नहीं थी. लेकिन क्या यह अब एक हो पाएगा? शायद नहीं. अब मामला धार्मिक हो गया है.”

मुसलमानों के बीच एक और डर है. 10 जून का डर. उस दिन कोनीबर में ही यज्ञ का आयोजन होना है. लोगों को लगता है कि उस दिन यज्ञ के बहाने आए बाहर के लोग कुछ उत्पात न मचाए. वैसे भी अब इस मामले की जानकारी आस-पास फ़ैल गई है.

हालांकि नरहट थाना के पुविस अवर निरीक्षक धमेन्द्र कुमार कहते हैं कि “मामला छोटा था. पुलिस ने स्थिति पर काबू पा लिया है. दोनों तरफ़ से लोगों को जेल में डाला गया है. यज्ञ को देखते हुए भी 10 जून को पुलिस तैनात रहेगी.”

समझौते को लेकर कोनीबर के लोगों की बैठक, फ़ोटो-दीपक कुमार

मोहम्मद तारीक़ पेशे से वकील हैं, जिनका गांव में काफ़ी सम्मान है. 7 मई की सुबह इस केस के सिलसिले में ऑटो से ही नरहट थाना जा रहे हैं. जैसे ही वो बिहारी बिगहा पहुंचते हैं-ड्राइवर को गाड़ी रोकने के लिए कहते हैं. उन्हें देख बिहारी बिघहा के लोग उनके पास आ जाते हैं, अपना दुख दर्द उन्हें सुनाते हैं. भीड़ से एक बुज़ुर्ग महिला उनके पास आकर हाथ जोड़कर रोने लगती है. कहती हैं, “मेरा बाबू, कल से जेल में है…आप थाना जा रहे हैं..बाबू का बचा लीजिए.

तारीक़ साहब महिला को ढांढस देते हुए कहते हैं, “चुप रहो अम्मा..सब ठीक हो जाएगा. मैं जा रहा हूं न…”

नवादा से चंदन सिंह सांसद हैं. इस सिलसिले न्यूज़सेंट्रल24×7 ने उन्हें कई बार फ़ोन मिलाया लेकिन बात नहीं हो पाई. बात होते ही रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.

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