कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

मानदेय बढ़ाने का मोदी जी का वादा निकला झूठा, अपना हक़ माँगने बिहार की आशा कार्यकर्ता बैठीं अनिश्चितकालीन हड़ताल पर

आशा कार्यकर्ताओं को सरकार ने 43 तरह के काम दिए हैं, लेकिन इसके बदले महीने में मुश्किल से 1800 रूपए मिल पाते हैं.

इस साल के सितंबर महीने में प्रधानमंत्री ने अपने चिर परिचित अंदाज में एक बड़ा वादा किया था. प्रधानमंत्री ने कहा था कि देश की आशा, आंगनबाड़ी और एएनएम कार्यकर्ताओं के मानदेय में बढ़ोतरी की जाएगी. उन्होंने कहा था, “जिन लोगों को 3000 रुपए हर महीने मिलते हैं उन्हें अब 4500 रुपए का भुगतान किया जाएगा. और जिन्हें 2200 रुपए मिलते हैं उन्हें 3500 रुपए दिए जाएंगे.” प्रधानमंत्री ने इस फ़ैसले को दिवाली गिफ्ट कहा था.

प्रधानमंत्री ने कहा था कि बढ़े हुए मानदेय को अक्टूबर से लागू किया जाएगा और नवंबर महीने से उनका वेतन इसी बढ़ोतरी के हिसाब से दिया जाएगा. इतना ही नहीं प्रधानमंत्री ने इन कार्यकर्ताओं को जीवन ज्योति बीमा योजना और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना का लाभ देने की बात भी कही थी. लेकिन, दिसंबर का एक हफ़्ता बीत चुका है और प्रधानमंत्री का एक भी वादा पूरा नहीं हो सका है. बिहार के आशा कार्यकर्ता इसी बात से नाराज़ हैं उनका कहना है कि उन्हें एक निश्चित राशि का भुगतान नहीं किया जाता है. साथ ही आशा कार्यकर्ताओं का कहना है कि उनकी नौकरी भी अनिश्चित है पता नहीं कब सरकार उन्हें बाहर कर दे. इन्हीं चिंताओं को लेकर बिहार की आशा कार्यकर्ता पिछले एक दिसम्बर से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर बैठी हैं.

सरकारी आंकड़े के मुताबिक बिहार में कुल 85,879 कार्यकर्ता हैं. पिछले एक हफ्ते से चल रहे हड़ताल के कारण स्वास्थ्य केंद्रों पर ताले लटक गए हैं, स्वास्थ्य विभाग के काम पर बुरा असर पड़ रहा है, लेकिन सरकार ने आशा कार्यकर्ताओं से बात करना अभी तक उचित नहीं समझा है. आशा कार्यकर्ताओं की मुख्य मांगें हैं कि उन्हें सरकारी कर्मचारी की मान्यता दी जाए, उनके लिए एक मासिक वेतन फिक्स की जाए और बीपीएल के दायरे में लाया जाए. अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संगठन की प्रदेश सचिव और आशा कार्यकर्ता संघ की अध्यक्ष शशि यादव का कहना है कि जिला स्तर के चिकित्सा पदाधिकारी और स्वास्थ्य विभाग आशा कार्यकर्ताओं के साथ दुर्व्यवहार करते हैं. उनकी मांग है कि सरकार सभी आशा कार्यकर्ताओं को काम करने का ऐसा माहौल दे जहां महिलाओं को अपमानित नहीं होना पड़े.

कई मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि बिहार की आशा कार्यकर्ताओं को तीन हज़ार का मासिक भुगतान किया जाता है. आशा संघ की अध्यक्ष शशि यादव ने इन ख़बरों को झूठा बताया है. उनका कहना है कि सरकार आशा कार्यकर्ताओं को कोई मासिक वेतन नहीं देती बल्कि टीकाकरण, स्वास्थ्य विभाग के अन्य योजनाओं को पूरा करने के लिए प्रोत्साहन राशि देती है. इसके अलावे आशा कार्यकर्ताओं की ड्यूटी समाज में स्वास्थ्य के लिए लोगों को जागरूक करने, गांव में लोगों को स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने में भी लगाई जाती है. शशि यादव ने कहा कि आशा कार्यकर्ताओं को प्रसूव पूर्व और प्रसव के बाद जच्चा-बच्चा का देखरेख भी करना होता है. इसके अलावे आंगनबाड़ी और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर भी उन्हें नज़र बनाए रखनी होती है.

डाउन टू अर्थ पत्रिका की रिपोर्ट के मुताबिक सरकार आशा कार्यकर्ताओं से मलेरिया और टीबी मरीज़ों की देखरेख सहित कुल 43 तरह के काम कराती है. इन कामों के लिए उन्हें 15 रुपए से लेकर 1000 रुपए तक भुगतान किया  जाता है. हर महीने के आख़िरी में इन प्रोत्साहन राशि को जोड़कर भुगतान किया जाता है. शशि यादव का कहना है, “हमारे लिए प्रोत्साहन राशि भी फिक्स नहीं की गई है. हमारे काम के लिहाज़ से हमारा पेमेंट काफ़ी कम है. स्वास्थ्य विभाग हमें पूरे पैसे भी नहीं देता. कभी कभी तो हमें दो तीन महीने तक अपने पैसे के लिए इंतजार करना पड़ता है. ना ही हमारे लिए काम करने का समय फिक्स है ना काम के बदले पैसे. हम सरकार से मांग करते हैं कि हमें 18000 रुपए का मासिक भुगतान किया जाए.”

भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के नेता दीपंकर भट्टाचार्य ने भी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की बदहाली पर केंद्र सरकार को घेरा है.

पटना की आशा कार्यकर्ता मंजू देवी का कहना है कि कई बार उन्हें काम करने के बाद भी मेहनताना नहीं मिल पाता. न्यूज़सेंट्रल24X7 से बातचीत में उन्होंने बताया कि टीकाकरण में हम अपना जी जान लगा देते हैं. लेकिन, अगर हम 50 प्रतिशत से कम टीकाकरण करते हैं तो हमें एक पैसा भी नहीं मिलता. 80 से 100 प्रतिशत टीकाकरण कराने पर ही हमें पैसे दिए जाते हैं. उनकी मांग है कि सरकार प्रोत्साहन राशि के बदले हर महीने एक निश्चित वेतन दे. आशा संघ की अध्यक्ष शशि यादव ने कहा कि अधिकांश महिलाएं आर्थिक स्थिति कमज़ोर होने की वज़ह से आशा कार्यक्रम से जुड़ी हैं. उन्हें उम्मी है कि सरकार हमें एएनएम की ट्रेनिंग देकर और भी काम ले सकती है. हम चाहते हैं कि हमारा भी प्रमोशन हो नहीं तो पूरी जिंदगी हमें आशा बनकर ही गुज़ारनी पड़ेगी.

जनवरी 2017 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में कुल 93,687 आशा कार्यकर्ताओं के पद हैं, जबकि फिलहाल इनमें कुल 85,879 पदों पर ही आशा कार्यकर्ताओं की बहाली की गई है. सरकार फिलहाल नए स्वास्थ्य कर्मचारियों की बहाली नहीं कर रही है, जिसके कारण मौजूदा कर्मचारियों के ऊपर काम का दबाव बढ़ते जा रहा है. शशि यादव का कहना है कि हम चाहते हैं कि सरकार इन पदों पर भी जल्दी ही बहाली पूरी करे. आशा संघ की अध्यक्ष ने बताया कि हालांकि प्रदेश भर में आशा कार्यकर्ताओं की हड़ताल चल रही है, लेकिन संघ ने मरीज़ों की सुविधा के लिए स्वास्थ्य केंद्रों पर आपातकालीन सुविधाओं को ठप नहीं किया है. आगामी 10 दिसंबर को हर जिले के जिला चिकित्सा पदाधिकारियों को घेरने की योजना है, इसके बाद 11 दिसंबर को आशा कार्यकर्ता जिलाधिकारी के सामने अपना विरोध प्रदर्शन करेंगी. इसके बाद 13 और 14 दिसंबर को राजधानी पटना में प्रदेश भर की आशा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सामने अपनी मांग रखेंगी.

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