कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

बिहार : पहली बार बिजली आने से कितनी बदली जीवनशैली?

आजादी के बाद पहली बार बिजली पहुंचने वाले गांव की ग्राउड रिपोर्ट

80 साल की  शुभकला देवी को बल्ब का जलना किसी जादू की तरह लगता है।

वह इलेक्ट्रिक बोर्ड में लगा स्विच दबाती हैं और बल्ब की दुधिया रोशनी हर तरफ बिखर जाती है। उधर, रोशनी बिखरती है और इधर झुर्रियों से भरा उनका चेहरा भी खिल जाता है।

वह बहुत कम बोलती हैं। बहुत सवाल पूछने पर भी उनका जबाव बमुश्किल तीन-चार शब्दों में सिमट जाता है। अलबत्ता, उनका खिला हुआ चेहरा बहुत कुछ बोल जाता है।

घर में बिजली आ गई, कैसा महसूस कर रही हैं ?

सवाल सुनकर उनके चेहरे कई इंच लंबी मुस्कान फैल जाती है। वह जबाव देती हैं, ‘पहिले अन्हार मे छलऊ ह। अखन इजोत में छी (पहले अंधेरे में रहते थे। अब उजाले में हैं)!’

शुभकला देवी के चेहरे पर दिखती बिजली आने की खुशी

शुभकला देवी बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में मुजफ्फरपुर शहर से तकरीबन 50 किलोमीटर दूर बसे विशनपुर गांव में रहती हैं।

यह गांव मुजफ्फरपुर के कटरा प्रखंड के नगवारा पंचायत में पड़ता है। आजादी के पहले से ही यह गांव वजूद में है। मगर, बिजली यहां पहली बार पहुंची है। 25 दिन पहले। हालांकि, अभी कुछ ही घरों में कनेक्शन दिया गया है।

यहां रहनेवाले बड़े-बुजुर्गों को कभी उम्मीद भी नहीं थी कि उनके जीते-जी यहां बिजली आएगी। यह उनके लिए किसी सपने के सच होने जैसा है।

गांव विशनपुर

 

आग उगलती दोपहर में भी 70 वर्षीय लाल ठाकुर अपने मकान में बड़े सुकून में हैं। नए खरीदे गए पंखे की हनहनाटक उन्हें शास्त्रीय संगीत की धुन की तरह लगती है।

वह कहते हैं, ‘बिजली नहीं थी, तो हाथ से पंखा झलते थे। बिजली आ जाने से गरमी में बहुत बड़ा सहारा मिला है। रात में भी बिजली रहती है। अच्छी व्यवस्था हुई है। हमलोग समझते थे कि हमारी जिंदगी अंधकार में ही गुजर जाएगी, लेकिन आखिरकार बिजली आ गई।’

बिजली आने के बाद पंखे की हवा में आराम करते लाल ठाकुर

लाल ठाकुर अब टीवी खरीदने का मन बना रहे हैं। हालांकि, ऐसा नहीं है कि वह पहली बार टीवी देखेंगे। बहुत पहले उनके घर में टीवी हुआ करता था, लेकिन उसे चलाने के लिए अलग तरह की मशक्कत करनी पड़ती थी।

पुराने दिनों को वह याद करते हैं,  ‘बड़ी दिक्कत होती थी। टीवी चलाने के लिए पहले बैटरी को चार्ज कराना पड़ता था। फिर उसे लगाना पड़ता था। लेकिन, ये (बिजली आने) हो जाने से सहज हो गया। सही विकास तो बिजली ही है।’

विशनपुर गांव के निवासी अधेड़ राजेश ठाकुर पहले कलकत्ता में रहते थे, लेकिन पिछले 20 वर्षों से गुजरात में गाड़ी चलाते हैं। वह दो महीने की छुट्टी पर घर आए हुए हैं।

बिजली आ जाने से उन्हें दूसरी तरह की खुशी है। इसकी वजह भी है। वह कहते हैं, ‘गुजरात के मेरे साथी मुझे यह कहकर शर्मिंदा कर देते थे कि अभी तक मेरे गांव में बिजली नहीं है और घरों में घासलेट (किरासन तेल) से ढिबरी जलती है। अब वे ऐसा नहीं कह सकेंगे, क्योंकि मेरे घर में बिजली आ गई है।’

राजेश ठाकुर ने कहा, ‘बिजली आ जाने से घर-परिवार के लोग-बच्चे टीवी देखकर टाइम पास कर लेंगे। देश दुनिया में क्या होता है, अभी नहीं मालूम पड़ता है। टीबी-ऊबी रहने से सब मालूम पड़ेगा कि कहां-क्या हो रहा है।’

विशनपुर के कुछ घरों में आज बिजली पहुंची है, तो इसमें सरकार की भूमिका कम और स्थानीय लोगों का संघर्ष अधिक है। अगर स्थानीय लोगों और कुछ समाजसेवियों ने आंदोलन न चलाया होता, तो आज भी गांव में बिजली मयस्सर नहीं होती।

विशनपुर के पड़ोस के गांव जजुआर के निवासी व सामाजिक कार्यकर्ता पिंटू कुमार विद्रोही कहते हैं, ‘हम 2010-2011 से ही आंदोलन कर रहे थे। यहां के एक दर्जन से अधिक गांव बिजली से वंचित थे। हमने सबसे पहले इन गांवों के युवाओं को जोड़ा और ब्लॉक से लेकर दिल्ली तक आंदोलन चलाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मीदी को चिट्ठी लिखी। साथ ही हमने बिजली मंत्री पीयूष गोयल से भी कई दफे मुलाकात की।’

पीयूष गोयल ने जब इस आशय को लेकर राज्य सरकार के साथ पत्राचार किया, तो राज्य सरकार ने बताया कि विशनपुर व अन्य गांवों में लंबे समय से बिजली की सुविधा है।

जब तहकीकात की गई, तो पता चला कि असल में जगन्नाथ मिश्रा के मुख्यमंत्री रहते हुए विशनपुर व अन्य कुछेक गांवों में बिजली के पोल लगाए गए थे, लेकिन किन्हीं कारणों से उन पोलों से होकर कभी बिजली नहीं दौड़ी। हां, सरकार के रिकॉर्ड में यह दर्ज हो गया कि इन गांवों में बिजली पहुंच रही है।

गांव में बिजली पहुंचाने के लिए लगाया गया लैंपपोस्ट

 

पिंटू कुमार विद्रोही कहते हैं, ‘जब हमें यह बताया गया कि वहां बिजली लंबे समय से दी जा रही है, तो हमने सच्चाई बताने के लिए गांवों की तस्वीरें खींची और अधिकारियों को दिया। तब जाकर सरकार की कानों पर जूं रेंगा।’

सामाजिक कार्यकर्ता विक्की कुमार ने कहा, ‘इतने सालों तक आंदोलन के बाद अब जाकर हमें भरोसा हो रहा है कि नई पीढ़ी जो लालटेन और दीया युग में जी रही है, उसे रोशनी मिल जाएगी।’

21वीं सदी में भी किसी गांव में बिजली नहीं होना सरासर सरकार की विफलता है, लेकिन यह विफलता कुछ लोगों के लिए कमाई का जरिया भी होता है। खासकर ऐसे समय में जब स्मार्ट फोन एक महत्वपूर्ण गैजेट की शक्ल ले चुका है, बिजली और भी जरूरी हो जाती है, जिसके लिए लोग अतिरिक्त खर्च भी कर सकते हैं।

पैक्स अध्यक्ष संजय ठाकुर कहते हैं, ‘बिजली नहीं थी, तो गांव के लोग जेनरेटर के माध्यम से कुछ घरों में तीन घंटे के लिए बिजली पहुंचाते थे। इसी तीन घंटे में हमलोग मोबाइल चार्ज कर लिया करते और दूसरे जरूरी काम भी निबटा लेते।’

विशनपुर गांव के दूसरे छोर पर रहनेवाले 72 वर्षीय चंदेश्वर साव के घर में बिजली पहुंचनी बाकी है।

वह अपनी छोटी सी गोमटी में झूल रहे बुझे हुए सफेद बल्ब की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं, ‘जेनरेटर से जो बिजली आती है, उसमें हम एक बल्ब जलाते हैं। इसके एवज में हर महीने 100 रुपए देना पड़ता है।’

संजय ठाकुर ने कहा, ‘गांव में बिजली आए 25 दिन हुए हैं। बिजली अभी चौबीसों घंटे रहती है। यह अच्छी बात है।’

जब संसाधन उपलब्ध न हो, तो लोग जुगाड़ तकनीक का सहारा भी लेते हैं। इस गांव के कुछ लोग भी इसी तकनीक से उजाला करते थे। वासुदेव ठाकुर उन्हीं लोगों में शुमार हैं।

वासुदेव ठाकुर ने ढिबरी और जुगाड़ तकनीक से बननेवाली रोशनी में स्नातक किया और फिलहाल वह रेलवे में नौकरी के लिए तैयारी कर रहे हैं। वासुदेव बताते हैं, ‘टार्ज जलाने की तीन बैटरी लेकर उससे गोबर गैस बनाते थे और उसमें पांच रुपए का छोटे बल्ब लगाकर रोशनी का इंतजाम करते थे। उसी में पढ़ते थे। लेकिन, वह ज्यादा समय नहीं चल पाता था। तब ढिबरी का ही सहारा होता था।’

अब बिजली आ जाने से वासुदेव जैसे छात्रों को पढ़ने में सहूलियत होने लगी है। वह कहते हैं, ‘ढिबरी की रोशनी में पढ़ाई करने में बड़ी दिक्कत होती थी। आंधी तूफान आता,तो ढिबरी बुझ जाती थी, जिससे पढ़ाई पूरी तरह बाधित रहती। अब बिजली आ गई है, तो पढ़ाई-लिखाई में भी सुविधा है। बिना किसी व्यवधान के हमलोग पढ़ पा रहे हैं।’

स्कूल छात्र अंशु कुमार झा के लिए बिजली की रोशनी में पढ़ाई का बिल्कुल अलग अनुभव है। बिजली आने की खुशी उसके चेहरे पर साफ दिख जाती है। वह कहते हैं, ‘रात में हमलोग दीया जलाकर पढ़ते थे। बहुत परेशानी होती। बिजली आने से बहुत सुविधा हुई है। गर्मी से भी राहत मिल रही है।’

जिन घरों में बिजली आ चुकी है, वहां की सुविधाएं-सहूलियतें उन लोगों को चिढ़ा रही हैं, जिनके घरों में अभी तक बिजली नहीं पहुंची है।

चन्देश्वर साव ने कहा, ‘बिजली आ जाएगी, तो बहुत अच्छा होगा। हमलोग दो-तीन कमरों में बल्ब जला पाएंगे। हम जैसे गरीब लोग पंखा भी लगवा सकते हैं। 24 घंटे रोशनी रहेगी, तो बच्चों की पढ़ाई-लिखाई भी ठीक से हो पाएगी।’

ज्यादा बल्ब जलेंगे और पंखा चलेगा, तो हर महीने का खर्च भी तो बढ़ेगा?

इस सवाल पर चंदेश्वर कहते हैं, ‘अभी मिट्टी तेल (किरासन तेल) और जेनरेटर पर जितना खर्च हो जाता है, उतने में ही बिजली का बिल चुकता हो जाएगा। इसलिए बिजली बिल की कोई चिंता नहीं है। जल्द से जल्द बिजली आ जाए, बस!’

चंदेश्वर साव

कटरा ब्लॉक के प्रखंड विकास पदाधिकारी वीरेंद्र कुमार ने आश्वस्त किया कि बाकी घरों में बिजली जल्द पहुंचा दी जाएगी। उन्होंने कहा, ‘पोल और ट्रांसफॉर्मर की कमी के चलते सभी गांवों के घरों तक बिजली नहीं पहुंचाई जा सकी है, लेकिन हमलोग युद्धस्तर पर प्रयास कर रहे हैं कि जितनी जल्दी हो सके, सभी गांवों को रोशन कर दें।’

गौरतलब है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पिछले साल दिसंबर में घोषणा की थी कि बिहार में शत-प्रतिशत विद्युतीकरण हो गया है। यानी कि बिहार के सभी घरों में बिजली पहुंच गई है, लेकिन ये सच नहीं है।

मुजफ्फरपुर के केवल कटरा ब्लॉक (इसी ब्लॉक में विशनपुर गांव भी आता है) के ही एक दर्जन गांवों में बिजली नहीं पहुंची है। वहीं, मीडिया रपट बताती है कि पश्चिमी चम्पारण के 22 गांवों के लोग अब भी लालटेन और दीया के युग में ही जी रहे हैं। इनके अलावा और भी कई जिले हैं, जहां के गांवों में बिजली दूर की कौड़ी हैं।

इन गांवों में न जाने कितने चंदेश्वर साव बिजली आने का इंतजार कर रहे हैं। कितनी ही शुभकला देवी स्विच दबाते ही बल्ब में रोशनी दौड़ जाने के रोमांच को महसूस कर लेना चाहती हैं और कितने ही बच्चे बिजली के रोशनी में पढ़ाई करने की उम्मीद पाले बैठे हैं।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और पटना में रहते हैं।)

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