कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

स्वयंसेवक की किस्सागोई में भाजपा का भविष्य अंधकारमय तो नहीं- पुण्य प्रसून बाजपेयी

जेएनयू और डीयू दोनों में मौजूदा सत्ता ने अपनी विचारधारा के लिहाज से वाइस चासलंर नियुक्त किया. जेएनयू के वाइस चांसलर ने तो जेएनयू का ट्रासंफॉर्मेशन बीजेपी के अनुकूल कर दिया. पर डीयू के वाइस चांसलर ने कुछ भी नहीं किया. और डीयू का आलम तो ये है कि बीते तीन बरस से सबकुछ जस का तस यानी स्टैंडसिट्ल है. यहां तक कि कोई नियुक्ति नहीं.

कह नहीं सकता देश बीस बरस पीछे चला गया बीजेपी. क्यों? क्योंकि समझ दिशाहीन है. झटके में चाय की चुस्कियों के बीच संघ को बरसों बरस से नाप रहे और खुद स्वयंसेवक से सियासी चालों में माहिर तो नहीं कहे लेकिन, समझदार शख़्स की जुबां से जब ये बात निकली तो मैं भी चौंक गया. दीपावली का दिन और दोपहर में ग्रीन टी. बात तो इसी से शुरू हुई कि स्वयंसेवकों को भी ग्रीन टी पंसद आती है, जबकि दिल्ली का झंडेवालान हो या नागपुर का रेशमबाग, कुल्हड़ में चाय तो दूध के साथ उबाल कर कड़क ही मिलती है. फिर जायका कैसे बदल रहा है. और शायद जायके बदलने की टिप्पणी ने ही वरिष्ठ स्वयंसेवक को अंदर से हिला दिया और वह एकाएक बोल पड़े कल तक फैजाबाद में अयोध्या थी. अब अयोध्या में फ़ैजाबाद होगा. पर पता नहीं योगी जी फ़ैजाबाद को कितना जानते हैं. दरअसल, मुग़लिया सल्तनत के वक्त से हीं फ़ैजाबाद नवाबों के लिए बाजार के तौर पर स्थापित किया गया. और बीते ढाई सौ बरस से फ़ैजाबाद में अयोध्या गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रतीक बना रहा. लेकिन, नया सवाल है कि फ़ैजाबाद के भीतर अयोध्या की मौजूदगी अपनी संस्कृति-सभ्यता को समेटे रही. लेकिन, अब अयोध्या में जब फ़ैजाबाद होगा, तो संस्कृतियों की विविधता को कैसे संभालेगा या बैलेंस होगा. अयोध्या अगर फ़ैजाबाद में ना होता तो फिर मौजूदा वक्त में फ़ैजाबाद की पहचान भी क्या होती. या यों कहें कि कौन पूछता फैजाबाद को.

ठीक कह रहें है आप. पर इसका एक मतलब तो यह भी देश के सामाजिक-आर्थिक हालातों पर दौर करने की स्थिति में सत्ता तभी आती है, जब वहां कोई ऐसा मुद्दा हो जिसके आसरे सियासत साधी जा सकती है.

कह सकते हैं.

कह नहीं सकते. बल्कि यूपी में ही घूम घूम कर देख लिजिए. चलिए बनारस ही देख लीजिए. वहां रहने वाले लोगों के हालात बेहतर हों क्या इस पर कभी किसी ने गौर किया? जबकि इस सच को हर कोई जानता है कि संकटमोचन मंदिर के बाहर फूल-माला, रूद्राक्ष तक की दुकान को मुस्लिम चलाते हैं. यही हाला अयोध्या का भी है.
पर नाम बदलने से अंतर क्या होगा? जो है वह रहेगा सिर्फ नाम ही तो बदला है.
मान्यवर, आप चाय भी पीजिए..आपने ऐसा गंभीर मुद्दा छेड़ दिया है कि कई कप चाय हम पी जाएं तो भी नतीजे पर नहीं पहुंचेंगे.

नतीजा ना सही लेकिन, आप खुद क्या सोचते हैं ये तो आपको कहना ही चाहिए. कह तो रहा है. क्योंकि मै संघ के विस्तार की जगह संघ को सिमटते हुए देख रहा हूं. और मेरी चिन्ता यही है कि रहने वाले लोग ही अगर दशहत में रहेंगे तो कल कोई दूसरी सत्ता होगी तो वह हमें डरायेगी. और फिर इसी तरह सियासत तो बांट कर चल पड़ेगी लेकिन, संघ की नींव बांटने वाली तो कभी नहीं रही.

तो क्या आप योगी जी को दोषी मानते हैं?
मैं योगी या मोदी की बात नहीं कर रहा हूं. मैं सिर्फ हालातों का जिक्र कर आपका ध्यान उस दिशा में ले जाना चाह रहा हूं, जहां आप ये समझ पाएं कि जब देश को कोई दृष्टि नहीं होगी, तो उसके परिणाम ऐसे हीं निकलेंगे, जैसे आज निकल रहे हैं.

तो क्या मौजूदा वक्त अतीत के फैसलों का परिणाम है?

अतीत मत कहिए…अतीत से लगता है जैसे हम इतिहास के पन्नों को खंगाल रहे हैं. जरा समझने की कोशिश कीजिए. आडवाणी की रथयात्रा से क्या निकला.

मुझे तो लगता है रथयात्रा ने बीजेपी को राजनीतिक तौर पर स्थापित कर दिया. और उसके बाद संघ के स्वयंसेवक अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बन गए. और वाजपेयी ने राजनीति को इस तरह मथा कि इमरजेन्सी के बाद जो जनता पार्टी आधे दर्जन राजनीतिक दलों से निकले नेताओं को ना जोड़ सकी, वाजपेयी की अगुवाई में बीजेपी दो दर्जन से ज्यादा दलों को साथ लेकर कांग्रेस का विकल्प बनने लगी.

हां, कुछ गलत नहीं कहा आपने. सही कह रहे हैं, लेकिन इसी लकीर को हमारी दृष्टि से भी समझें कि रथयात्रा संघ की नहीं राजनीति की जरुरत थी. संघ तो धर्म के नाम पर समाज को बांटना ही नहीं चाहता था. फिर भी समाज बंटा. वोट बंटे. और हुआ क्या. 1992 के बाद चुनाव में बीजेपी को कहां कहां सत्ता मिल गई. 1996 में सत्ता मिली भी तो सिर्फ तेरह दिन के लिए. और 1998 में भी लड़खड़ा रही थी. वो तो करगिल ने राहत दी. पर ध्यान दीजिए रथयात्रा बीजेपी को पीछे ले गई. वाजपेयी जब सत्ता के बाहर थे और बीजेपी को सत्ता में लाने के लिए कार्य कर रहे थे तब उनके बोल और सत्ता चलाते समय उनके बोल अलग अलग क्यों हो गया. आपने ये कभी सोचा?

हां, वाजपेयी सत्ता बरकरार रखना चाहते थे, तो संघ के एजेंडे को उन्होंने सत्ता के लिए त्याग दिया.

वाह …तब तो नरेन्द्र मोदी के पास तो पांच बरस के लिए बहुमत के साथ सत्ता है. फिर उन्होंने संघ के उन्हीं एंजेडे पर आंखें क्यों मूंद लीं. जिन मुद्दों को आप संघ का एजेंडा कह रहे हैं? ये सवाल तो है. लेकिन, मोदी के दौर में सत्ता समीकरण उन्हें दूसरी वजहों से इजाजत नहीं देते हैं कि वह संघ के एजेंडे को लागू कराने में लग जाएं.

तब तो हर काल में आप सत्ता की वजहों को ही परखेगें. और फिर एजेंडा क्या मायने रखता है? वैसे ये आपके लिए एजेंडा होगा पर हमारे लिए जनमानस से जुडा मुद्दा होता है. और वोटर भी जनमानस हीं होता है. फिर संघ और सत्ता में अंतर क्या है? दोनों ही जनमानस को ध्यान में रखते हैं.

देखिए आप स्थिति को उलझाइए मत. अपने मत पर स्पष्ट रहिए. क्योंकि बात ये हो रही है कि पूर्व की परिस्थितियों ने ही मौदूदा वक्त को परिणाम के कटघरे में ला खड़ा कर दिया है. और इसे कौन कैसे संभालेगा ये सबसे बड़ा सवाल बनता जा रहा है.

और बातचीत के बीच में ही दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक कॉलेज के प्रिंसिपल आ गए तो उन्हें भी विषय दिलचस्प लगने लगा और झटके में ये कहते हुए बीच में कूद पड़े कि कुछ बात डीयू और जेएनयू की भी करनी चाहिए.

क्यों? झटके में हम दोनों ही बोल पड़े?

विश्लेषण आपलोग कीजिए, लेकिन मेरी बातों पर गौर कीजिए. जेएनयू और डीयू दोनों में मौजूदा सत्ता ने अपनी विचारधारा के लिहाज से वाइस चासलंर नियुक्त किया. जेएनयू के वाइस चांसलर ने तो जेएनयू का ट्रासंफॉर्मेशन बीजेपी के अनुकूल कर दिया. पर डीयू के वाइस चांसलर ने कुछ भी नहीं किया. और डीयू का आलम तो ये है कि बीते तीन बरस से सबकुछ जस का तस यानी स्टैंडसिट्ल है. यहां तक कि कोई नियुक्ति नहीं. केन्द्र से आया रुपया भी लौटा देते हैं. यानी एक तरफ़ जो चाहते थे कि वाइस चांसलर त्यागी जी सत्तानुकुल कुछ निर्णय लें, वह भी उन्होंने नहीं लिया.

वजह?

सवाल वजह का नहीं. आपलोग जिन बातों को कह रहे हैं कि कैसे धीरे-धीरे हालात और ख़राब हो रहे हैं, मैं उसे माइक्रो लेवल पर बताना चाह रहा हूं कि डीयू इतना बड़ा है और उसमें विचारों का समावेश शिक्षकों के स्तर पर इतना व्यापक है कि सत्ता के करीबियों के अंतर्विरोध ही किसी भी निर्णय पर आपस में ज्यादा तीखे स्तर पर टकराते हैं. यानी आपकी बहस उसी दिशा में जा रही है कि सत्ता के अंतर्विरोध कोई काम होने नहीं देते. और होते हैं तो वह सत्ता के शीर्ष का निर्णय होता है. और उसी निर्णय के अक्स तले सत्ता बरकरार रहती है या फिर चली जाती है. और उसी मुताबिक उससे जुड़े सामाजिक-राजनीतिक संगठनों का विश्लेषण होता है.

नहीं, मेरा ये कहना नहीं है. मै बताना चाह रहा हूं कि वाजपेयी ने अपने सत्ता काल में बीजेपी को कांग्रेस की तर्ज़ पर एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर गढ़ा. जहां कांग्रेस की जगह बीजेपी लेने को तैयार हो रही थी. किसी भी राजनीतिक दल को तब बीजेपी के साथ आने में परहेज नहीं था. ये समझे कि हर नेता वाजपेयी के साथ खड़ा नज़र आता था. और याद कीजिए ये हालात देश को दो पार्टी की दिशा में ले जा रहे थे. यानी एक तरफ़ कांग्रेस और दूसरी तरफ़ बीजेपी.

पर अड़ंगा तो संघ ने ही डाला.

देखिए कुछ हालातों को समझे. संघ का मतलब सिर्फ़ सरसंघचालक नहीं होता. जैसे बीजेपी का मतलब सिर्फ बीजेपी का अध्यक्ष नहीं होता. पर धीरे-धीरे नेतृत्व को ही पार्टी या संगठन मान लिया गया तो उसके परिणाम तो सामने आएंगे ही. मान लीजिए वाजपेयी के दौर में संघ नेतृत्व की तरफ़ से कोई गलती हुई. तो क्या उसे बाद में संघ ने सुधारा नहीं. पिछले दिनों सरसंघचालक मोहन भागवत ने तो गुरु गोलवलकर तक की थ्योरी को उस वक्त की जरूरत बता दिया.

तो आप ये कह रहे हैं कि मोहन भागवत ने संघ के कंधे पर पड़े पुराने बस्ते को उतार दिया. जिसेस बिना बैग एंड बैगेज वह किसी भी रास्ते बिना जवाब दिए जा सकता है.
आप ऐसा भी सोच सकते हैं. लेकिन, जो बात डीयू-जेएनयू के संदर्भ से निकली उसे भी समझें. जेएनयू हमेशा से वाम धारा के साथ रहा. लेकिन, उसके साथ रिसर्च विंग भी था. और अब राइट सोच है लेकिन रिसर्च गायब है. तो आजादी के नारों से जेएनयू को गढ़ना या ढहना शुरू हो गया. यानी थिंकिंग प्रोसेस गायब है.

यही हालात तो राजनीति में भी है.

हां, अब आप पटरी पर लौटे. दरअसल, नया संकट क्या है? थ्योरी बहुत सारी है, लेकिन कोई रिसर्च नहीं है. जैसे वाजपेयी के दौर में कांग्रेस एक विचार के तौर पर स्थापित था, तो उसे वाजपेयी ने ख़ारिज़ नहीं किया, बल्कि उसके समानांतार बीजेपी की सत्ता को उसी से निकले एलीमेंट को जोड़ कर दिखा दिया. लेकिन, अब योगी जो कर रहे हैं या मोदी जो कर रहे हैं, उसका कोई ओर-छोर आप पकड़ नहीं पाएंगे. यानी दोनों पूर्ण बहुमत के साथ ताकतवर तरीके से मौजूद हैं. दोनों चाहे तो क्या नहीं कर सकते. लेकिन, वाजपेयी के दौर में जो फ्रिज़ एलीमेंट अलग-थलग पड़ गये थे, अब के दौर में वहीं फ्रिज एलीमेंट प्रभावी हो चले हैं. यानी बीजेपी 2019 के बाद कितनी पीछे जायेगी ये उसके अंतर्विरोध ही तय करेगें. क्योंकि अब बीजेपी की पहचान फिर वहीं 1990 वाली हो चली है. और दूसरी तरफ़ कांग्रेस भी इस हालात को समझी है तो कांग्रेस की सोच लेफ्ट होते हुए वाजपेयी के बीजेपी वाले हालात से मेल खाने लगी है. तो ऐसे में कांग्रेस को पटरी पर आने के लिए अब ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पडेगी. लेकिन, बीजेपी और अगर आगे जाना है तो उसके भीतर से कौन सा नया नेतृत्व निकलेगा अब सबका ध्यान इसी पर रहेगा.

तो क्या इसके लिए मौजूदा सत्ता ही जिम्मेदार है?

देखिए सत्ता बड़ा ही वृहत शब्द है. आपको मानना होगा कि इसके लिए जिम्मेदार नेतृत्व ही होता है. और नेतृत्व नरेन्द्र मोदी के हाथ में है. जो बीजेपी को कैसे नए तरीके से गढ़ रहे हैं या गढ़ना चाह रहे हैं ये समझने के लिए उनके निर्णयों या उनके पुराने करीबियों के जरीये समझा जा सकता है.

ये करीबी क्या गुजरात के हैं?

गुजरात तो नहीं कहूंगा, लेकिन गुजरात के वक्त से है ये कहा जा सकता है. खास तौर से तब का वक्त जब गुजरात के सीएम नरेन्द्र मोदी अमेरिका के ब्लैक लिस्ट में थे. पर एक शख़्स उन्हें जापान ले जाता है और वहीं शख़्स मोदी के निशाने पर आ जाता है. तो पहले ग्रीन टी और बनवाता हूं …फिर बताऊंगा

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