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क्या संवैधानिक संस्थाओं को नष्ट करना सरदार पटेल की विरासत है? – प्रोफेसर अपूर्वानंद

“भाजपा सरकार संवैधानिक संस्थाओं को अपने कब्ज़े में करना चाहती है.”

“उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए फ़ैसले पर उम्मीद की जाती है कि देश को चलाने वाले राजनीतिक दल कम से कम इस फ़ैसले का सम्मान करेंगे. लेकिन देखा यह गया कि भारत के शासक दल (भाजपा) ने ही उच्चतम न्यायालय के फ़ैसले का उल्लंघन किया और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने केरल सरकार को धमकी दी कि यदि केरल सरकार इस फ़ैसले को लागू करती है या उन लोगों पर सख्ती करती है जो इस फ़ैसले का विरोध कर रहें हैं, तो केरल सरकार को उखाड़ कर फेंक दिया जाएगा.” यह कहना था दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर अपूर्वानंद का.

प्रोफेसर अपूर्वानंद ने न्यूज़सेंट्रल24×7 के साथ अपनी बात-चीत के दौरान पाकिस्तान और भारत की तुलना करते हुए कहा कि सबरीमला पर उच्चतम न्यायालय के फ़ैसले की तुलना पाकिस्तानी उच्चतम न्यायलय के फ़ैसले से की जा सकती है, जो कि भारत के न्यायालय के फ़ैसले से ज़्यादा साहसी फ़ैसला था.

दरअसल पाकिस्तान उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में मौत की सज़ा सुनाई गई आसिया बीबी को रिहा कर दिया जिन पर पैगम्बर मोहम्मद और क़ुरान की बेईज्ज़ती करने का आरोप था. पाकिस्तान में यह सबसे बड़ा जुर्म माना जाता है जिसकी सज़ा मौत होती है. हालांकि आसिया बीबी को पाकिस्तान की निचली अदालतों ने मौत की सज़ा सुनाई थी, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने एक साहसी फ़ैसला लेते हुए आसिया बीबी को रिहाई दे दी. न्यायालय के फ़ैसले के बाद पाकिस्तान में बड़ा आंदोलन शुरू हो गया और फ़ैसला सुनाने वाले न्यायाधीशों को जान से मारने की धमकी भी दी गई.

प्रोफेसर अपूर्वानंद ने कहा, “इन दोनों ही फ़ैसलों में एक तरह की समानता देखी जा सकती है कि उच्चतम न्यायालयों के फ़ैसलों का विरोध किया गया है. लेकिन फर्क सिर्फ इतना है कि पाकिस्तान में मौजूदा राजनीतिक शासक दल और अन्य राजनीतिक दल उच्चतम न्यायालय के फ़ैसले से सहमत हैं और उसके साथ है.” उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाते हुए कहा कि भारत में मौजूदा शासक दल सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को अनुमति देने के फ़ैसले का विरोध करने के लिए लोगों को उक्सा रहा है और आंदोलन संगठित कर रहा है. इस प्रकार भारत में न्याय व्यवस्था की धज्जियां उड़ रही हैं. उन्होंने सवाल किया कि अगर भारत का शासक दल ही (भाजपा) संविधान का उल्लघन करने के लिए आंदोलन का नेतृव्य करेगा तो फिर भारत किस दिशा में जाएगा.

अपनी बात को जारी रखते हुए अपूर्वानंद ने कहा कि यदि दूसरी ओर देखा जाए तो भाजपा ने 31 अक्टूबर को सरदार वल्लभ भाई पटेल की भव्य मूर्ति का अनावरण किया और यह कहा कि देश में पहली बार सरदार पटेल की विरासत को स्वीकार किया गया है.

उन्होंने पूछा, “आख़िर सरदार पटेल की विरासत क्या है और सरदार पटेल को कैसे याद किया जा सकता है?” अपूर्वानंद ने सरदार पटेल के जीवन के बारे में बताते हुए कहा कि सरदार पटेल आज़ाद भारत में बहुत कम समय के लिए गृहमंत्री के रूप में काम कर पाए. पटेल ने भारत के संविधान निर्माण में मुख्य भूमिका निभाई थी और आज़ादी से पहले सरदार पटेल को किसान आंदोलन के नेता के रूप में जाना जाता था.

इसलिए सरदार पटेल की विरासत के दो स्तर हैं. पहली तो किसान आंदोलन या न्याय आंदोलन के नेता के रूप में और दूसरी आज़ाद भारत के संवैधानिक संस्थाओं के निर्माताओं के रूप में है. तो यदि आज सरदार पटेल की विरासत को याद किया जाए तो उनकी असली विरासत है भारत की संवैधानिक संस्थाएं. यानी अगर भारत में जनतंत्र को चलना है तो वह इन्हीं संस्थाओं के बल पर चलेगा. भारत की न्यायपालिका, कार्यपालिका, चुनाव आयोग और भारत में बनी दूसरी संस्थाएं जिनमें सीबीआई और रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया शामिल हैं.

प्रोफेसर अपूर्वानंद ने संस्थाओं में हाल के विवादों और तनाव की ओर इशारा करते हुए कहा, “यह बात भी तय है कि इन सारी संस्थाओं में तनाव भरा रिश्ता है और यह तनाव का कारण सरकार द्वारा इन संस्थाओं पर कब्ज़ा करने या उन्हें अपने अनुसार चलाने का प्रलोभन हो सकता है. लेकिन सरदार पटेल इन संस्थाओं की स्वयत्तता के पक्ष में थे.”

उन्होंने भाजपा द्वारा सरकारी संस्थाओं पर हस्तक्षेप किए जाने के बारे में कहा कि पिछले कुछ समय से यह विवाद उठ रहा है कि रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया पर भारत सरकार अपना कब्ज़ा करना चाहती है. सीबीआई के भीतर जो विवाद चल रहा है और वह विवाद स्वयं भारत सरकार द्वारा खड़ा किया गया है. और सरकार सीबीआई पर भी कब्ज़ा करना चाहती है. उन्होंने कहा, “भाजपा सरकार ने एक तरह से चुनाव आयोग को नाकारा बनाकर अपने अनुसार कर लिया है. न्यायपालिका में सरकार का हस्तक्षेप देखा जा सकता है और सबसे स्वतंत्र संस्था यानी मीडिया को उसने नाकारा और लाचर बना दिया है और मीडिया का एक बड़ा हिस्सा ख़ुद सरकार का अनुचर बनने में गौरव महसूस करता है.”

प्रोफेसर अपूर्वानंद ने प्रश्न उठाया कि क्या यह सब जो हो रहा है यह सरदार पटेल की विरासत है? संवैधानिक संस्थाओं को नष्ट करना सरदार पटेल की विरासत है जिन्हें उन्होंने सरोजनी नायडू,जवाहरलाल नेहरू और अन्य नेताओं की मदद से कायम किया था? उन्होंने पूछा कि जो लोग इन संस्थाओं को नष्ट कर रहे हैं वही सरदार पटेल की मूर्ति खड़ी करके उनका सम्मान कर रहे हैं या खुलेआम उनका मज़ाक बना रहे हैं?

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