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पुणे पुलिस नवलखा और तेलतुंबडे के ख़िलाफ़ कोई सख्त कार्यवाही नहीं करेगी – बॉम्बे उच्च न्यायालय

उच्च न्यायालय द्वारा मामले में अगली सुनवाई 26 अक्टूबर की जाएगी।

शुक्रवार को बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि पुणे पुलिस अगले सप्ताह तक भीमा-कोरेगांव मामले में आरोपी मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा और प्रोफ़ेसर आनंद तेलतुंबडे के ख़िलाफ़ कोई सख़्त कार्रवाई नहीं करेगी। जस्टिस आरवी मोर और भारती डांग्रे की एक खंडपीठ ने अदालत से 26 अक्टूबर को इस मामले को रद्द करने का आग्रह करते हुए कहा कि वे नवलखा और तेलतुंबडे द्वारा दायर याचिकाओं को सुनेंगे।

शुक्रवार को अतिरिक्त सरकारी अभियोजक अरुणा कामत-पाई ने अदालत को बताया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए आदेश के अनुसार नवलखा को 26 अक्टूबर तक गिरफ़्तारी से सुरक्षित किया गया था। इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने 26 अक्टूबर को सुनवाई के लिए दायर याचिकाओं में कहा, “सुनवाई की अगली तारीख़ तक कोई सख़्त क़दम (जैसे – गिरफ़्तारी) नहीं उठाया जाएगा।”

ग़ौरतलब है कि पुणे पुलिस ने इस साल अगस्त में नवलखा, तेलतुंबडे और चार अन्य कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराया था।

नवलखा, प्रमुख तेलुगु कवि वारावरा राव, कार्यकर्ता अरुण फ़ेरेरा और वेरनॉन गोंसाल्व और ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज को गिरफ़्तार कर लिया गया था। हालांकि, तेलतुंबडे को गिरफ़्तार नहीं किया गया था, लेकिन उनके घर की छानबीन की गई थी। नवलखा और तेलतुंबडे इस मामले को लेकर इस महीने बॉम्बे हाईकोर्ट गए और अपने ख़िलाफ़ दर्ज पहली सूचना रिपोर्ट (एफ़आईआर) को रद्द करने की मांग की। उनका कहना था कि उनके ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं है, और उन्हें ग़लत तरीक़े से फंसाया जा रहा था।

पुणे पुलिस द्वारा नवलखा और चार अन्य की गिरफ़्तारी के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि उन्हें नज़रबंद रखा जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने बाद में मामले में दख़ल देने से इंकार कर दिया और कहा कि पुणे पुलिस इसकी जांच के साथ आगे बढ़ सकती है। इस महीने की शुरुआत में दिल्ली उच्च न्यायालय ने नवलखा को नज़रबंदी से मुक्त कर दिया और कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें राहत देने के लिए चार सप्ताह के भीतर उपयुक्त मंच तक पहुंचने की स्वतंत्रता दी है।

ज्ञात हो कि पुणे पुलिस ने दावा किया था कि उन्होंने अभियुक्तों के बीच दस्तावेज़ों का आदान-प्रदान और ईमेल ज़ब्त किए थे जिन्होंने कथित तौर पर माओवादी नेताओं के साथ संबंधों और हथियारों और फण्ड की आपूर्ति में उनकी भूमिकाओं का ख़ुलासा किया था। बता दें कि पिछले साल 31 दिसंबर को पुणे में एल्गार परिषद के सम्मेलन के बाद भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा के सम्बन्ध में दर्ज हुई प्राथमिकी की कड़ी में 28 अगस्त को पांच मनावाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया गया था।

पीटीआई इनपुट्स पर आधारित

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