कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

CAA और NRC के विरोध-प्रदर्शनों ने देश को दी है प्रेम और धर्म-निरपेक्षता की उम्मीद

भारत को नफ़रत और डर का साम्राज्य बनाने की साजिशों पर करारा अघात हुआ है.

भारतीय गणतंत्र के इतिहास में नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी के ख़िलाफ़ सभी धर्म के लोगों की एकजुटता याद रखी जाएगी. काफी लंबे समय से देश ने धर्म-निरपेक्षता और बंधुता को बचाने के लिए लोगों की इस तरह की लड़ाई नहीं देखी थी. घृणा और नफ़रत की राजनीति से प्रेरित पुलिस जिन लोगों के साथ बर्बरता दिखा रही है, उनके समर्थन में लोग सड़कों पर उतर रहे हैं, उन्हें उम्मीद दिखा रहे हैं और भारत की साझी विरासत के प्रति आश्वस्त कर रहे हैं.

मौजूदा सरकार इस प्रदर्शन को सांप्रदायिक रंग देने की पूरी कोशिश कर रही है. लोगों के भीतर इन प्रदर्शनों के ख़िलाफ़ ग़लत सूचनाएं पहुंचाई जा रही हैं. पुलिस के बल प्रयोग से इन प्रदर्शनों को दबाया जा रहा है. लेकिन, इस समय सरकार का कोई भी हथकंडा काम नहीं आ रहा. पुलिस ने मुस्लिम छात्रों की बहुलता वाले जामिया मिल्लिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी पर ज्यादती की तो बड़ी संख्या में लोगों ने इन छात्रों का साथ दिया. कंपकपाती ठंड में इन छात्रों के समर्थन में लोग दिल्ली के सड़कों पर उतरे और छात्रों की रिहाई तक पुलिस मुख्यालय और विभिन्न थानों पर डटे रहे. देश के 50 से अधिक विश्वविद्यालय के छात्रों और शिक्षकों ने जामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्रों का साथ दिया. कई वकील भी छात्रों की मदद करने के लिए पुलिस थाने के बाहर रात भर खड़े रहे.

प्रधानमंत्री ने प्रदर्शनकारियों पर तंज कसे. उन्होंने कहा कि प्रदर्शन करने वाले लोगों को उनके कपड़ों से पहचाना जा सकता है. प्रधानमंत्री का इशारा सीधे तौर पर मुसलमानों की ओर था. इसके बाद अलग-अलग धर्म के लोगों ने प्रधानमंत्री के इस बयान का भी जवाब दिया. प्रदर्शनों में पुरुष टोपी लगाकर और महिलाएं हिज़ाब लगा कर गईं. हाथों में तिरंगा लहराते हुए इन्होंने देश के मुस्लिम भाई-बहनों के साथ कदम से कदम मिलाया. युवाओं ने प्लेकार्ड्स पर मजाकिया स्लोगन और गाने लिखे. सरकार की नफ़रत भरी नीति का जवाब छात्रों ने प्रेम और अहिंसा के साथ दिया. यही हमारे देश की पहचान है.

हाल के कुछ सालों में यह पहली बार है जब मेरे भीतर की आशावादिता बढ़ी है. मेरा अपना राजनीतिक मत प्रेम और भाईचारे को मानता है. मैं यह मानता रहा हूँ कि नफ़रत और सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ प्रेम और धर्म निरपेक्षता की जीत होगी. लेकिन, कारवां-ए-मोहब्बत की अपनी यात्राओं के दौरान हमने पाया कि देश के युवा सांप्रदायिक घृणा से इतने भर गए हैं कि दिनदहाड़े मुसलमानों-दलितों को मारा-जलाया जाता है और भीड़ में शामिल लोग इस वारदात का वीडियो बनाते हैं. ये लोग बाद में इसे सोशल मीडिया पर डालकर अपनी बहादुरी दिखाने की कोशिश करते हैं. भीड़ से कोई भी शख़्स लिंचिंग के शिकार लोगों को बचाने नहीं आता. पुलिस भी इस हत्यारी भीड़ का मनोबल बढ़ाती है और पीड़ितों पर ही मुक़दमे लाद दिए जाते हैं. भाजपा ने मुसलमानों को अलग-थलग करके बाकी सभी कौमों का ध्रुवीकरण कर दिया है. मुझे इस बात की चिंता हो रही थी कि भारत एक ऐसे अंधकार की चपेट में चला गया है जहां से उसका आना संभव नहीं है. लेकिन, हालिया प्रदर्शनों में जिस तरह हिन्दू और मुसलमानों की एकता देखने को मिली है, वह उत्साहित करने वाली है. मुझे विश्वास है कि देश के करोड़ों लोगों के भीतर फिर से उम्मीद जगी है.

आज से 100 साल पहले महात्मा गांधी ने भी इसी भावना के साथ आज़ादी की लड़ाई शुरू की थी. दक्षिण अफ्रीका से आने के बाद गांधीजी ने भारत की आज़ादी का बीड़ा उठाया. उन्होंने एक ऐसे देश की कल्पना की, जहां नागरिकों के धर्म या पहचान के आधार पर उनसे भेदभाव नहीं किया जाएगा. भारत को लेकर हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दृष्टि कुछ और थी. ये लोग इस देश को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते थे, जहां धार्मिक-अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाए. मुस्लिम लीग का भी मानना था कि मुसलमानों को जब तक अलग देश नहीं मिल जाता तब तक उनका विकास नहीं होगा. आज जो लोग सत्ता में हैं, ऐसा लगता है कि उनका भरोसा गांधीजी से ज्यादा जिन्ना में है. वे गांधीजी को ग़लत और सावरकर-जिन्ना को सही साबित करना चाहते हैं.

इन विरोध-प्रदर्शनों ने मौजूदा सरकार के भीतर खलबली मचा दी है. उत्तर प्रदेश सरकार ने तो मुसलमानों के ख़िलाफ़ जैसे जंग ही छेड़ दी है. प्रधानमंत्री ग़लत तथ्य पेश करके अपनी सरकार का बचाव कर रहे हैं. प्रधानमंत्री कहते हैं कि एनआरसी की चर्चा कहीं हुई ही नहीं हुई है, जबकि सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो वायरल हो रहे हैं जिसमें गृहमंत्री अमित शाह नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी के बीच संबंध बता रहे हैं. वे यह भी बता रहे हैं कि कैसे नागरिकता क़ानून के आने के बाद मुसलमानों को छोड़ बाकी सभी कौम के लोगों को नागरिकता मिल सकेगी. प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भारत में कोई डिटेंशन सेंटर नहीं है, जबकि असम के नारकीय डिटेंशन का दौरा मैं खुद करके आ चुका हूँ. अमित शाह ने खुद सभी राज्यों को डिटेंशन सेंटर बनाने के लिए बोला है. कई राज्यों में डिटेंशन सेंटर के निर्माण का कार्य चालू भी हो चुका है.

इस संघर्ष का अंजाम जो हो, लेकिन नागरिकता क़ानून और एनआरसी के ख़िलाफ़ हो रहे प्रदर्शनों की जीत हो चुकी है. देशभर में एनआरसी लागू करने के सवाल पर अब प्रश्न-चिह्न लग चुका है. नागरिकता क़ानून के बाद देशभर में एनआरसी लागू करने के सवाल ने 20 करोड़ मुसलमानों को आतंकित कर दिया था. अगर ऐसा हो जाता तो देश के बाकी हिस्से के मुसलमानों को भी उसी भय से होकर गुजरना पड़ता जिससे असम में बंगाली मूल के असमिया लोग सालों से गुजर रहे हैं. इन प्रदर्शनों का एक असर यह भी हुआ है कि भाजपा के जिन सहयोगी दलों ने नागरिकता क़ानून के पक्ष में संसद में मतदान किया था, उन्होंने भी अब अपने यहां एनआरसी लागू ना करने की बात कही है. बिहार, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, केरल, राजस्थान जैसे राज्यों ने एनआरसी लागू नहीं करने की बात की है. आने वाले समय में कई अन्य राज्य भी इस मुहिम से जुड़कर एनआरसी को नकारेंगे.

अगर केंद्र सरकार फिर भी एनआरसी लागू करने पर आमादा रहती है तो संवैधानिक संकट की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी क्योंकि एनआरसी को राज्य सरकार के बिना लागू नहीं किया जा सकता. केंद्र सरकार के हाथ में बस इतना है कि वह राज्य की चुनी हुई सरकार को बर्खास्त कर सकती है, लेकिन वह कितनी बार और कितने राज्यों की सरकारों को बर्खास्त करेगी?

इन सबके बावजूद जनता की जागरूकता अभी भी जरूरी है. नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) पर काम शुरू हो चुका है और यह एनआरसी की पहली कड़ी है. अगर राज्य सरकारें एनआरसी को लेकर सच में गंभीर हैं तो उन्हें एनपीआर का भी बहिष्कार करना होगा. अभी तक मात्र केरल सरकार ने कहा है कि वह एनपीआर लागू नहीं करेगी. सबसे अच्छा समाधान हो सकता है कि देशभर की जनता एनपीआर और एनआरसी के ख़िलाफ़ सिविल नाफ़रमानी आंदोलन खुद चलाए. इन प्रक्रियाओं में मांगे जाने वाले किसी भी दस्तावेज को सरकार के सामने पेश नहीं किया जाए.

क्या यह प्रदर्शन चलता रहेगा? इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी. लेकिन, इतना तय है कि अगर ये प्रदर्शन ख़त्म हो जाते हैं फिर भी मौजूदा सरकार की भारत को बदलने की साजिश चुनौतियों से रहित नहीं है. मुसलमानों को अलग-थलग करने की उनकी योजना अब फ़ेल हो चुकी है. भारत को नफ़रत और डर का साम्राज्य बनाने की कोशिश पर करारा अघात हुआ है. आंदोलनकारी छात्रों-नागरिकों ने बता दिया है कि अभी भी करोड़ों लोग भारत को उम्मीद और प्रेम की निग़ाह से ही देखते हैं.

(लेखक पूर्व आईएएस अधिकारी और जाने-माने मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं. यह लेख इंडियन एक्सप्रेस में अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित है. इसका हिन्दी अनुवाद कारवां मीडिया टीम के अभिनव प्रकाश ने किया है.)

You can also read NewsCentral24x7 in English.Click here
+