कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

पूंजी निवेश के ज़रिये उपनिवेश बनाने का प्रतिक है श्रीलंका संकट: पुण्य प्रसून बाजपेयी

"इन हालातों को सिर्फ श्रीलंका के राजनीतिक धटनाक्रम के तहत देखना अब भूल होगी. क्योंकि राष्ट्रपति सिरीसेना और राजपक्षे दोनों ही चीन के प्रोजेक्ट के कितने हिमायती है ये किसी से छुपा नहीं है."

पड़ोसी देशों के कतार में पहली बार श्रीलंका में राजनीतिक संकट के पीछे जिस तरह चीन के विस्तार को देखा जा रहा है, वह एक नए संकट की आहट भी है और संकेत भी कि अब वाकई युद्द विश्व बाज़ार पर कब्ज़ा करने के लिए पूंजी के ज़रिये होंगे न कि हथियारों के ज़रिये. ये सवाल इसलिए क्योंकि श्रीलंका के ऱाष्ट्रपति सिरीसेना ने जिस तरह प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिघें को बर्ख़ास्त कर पूर्व राष्ट्रपति महिन्दा राजपक्षे को प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त किया, जबकि रानिल विक्रमसिंघे के पास राजपक्षे से ज़्यादा सीट हैं. और उसके बाद के घटनाक्रम में संसद को ही भंग कर नए चुनाव के एलान की तरफ बढ़ना पड़ा.

इन हालातों को सिर्फ श्रीलंका के राजनीतिक धटनाक्रम के तहत देखना अब भूल होगी. क्योंकि राष्ट्रपति सिरीसेना और राजपक्षे दोनों ही चीन के प्रोजेक्ट के कितने हिमायती है ये किसी से छुपा नहीं है. और जिस तरह चीन ने श्रीलंका में पूंजी के ज़रिये अपना विस्तार किया वह भारत के लिए नए संकट की आहट इसलिए है क्योंकि दुनिया एक बार फिर उस उपनिवेशी सोच के दायरे में लौट रही है जिसके लिए पहला विश्वयुद्द हुआ. ये लकीर बेहद महीन है लेकिन आधुनिक वक़्त में या कहे इक्ससवी सदी में उपनिवेश बनाने के लिए किसी भी देश को कैसे क़र्ज़ तले दबाया जाता है और पिर मनमानी की जाती है ये एक के बाद एक कई घटनाओ से साफ से होने लगा है और भारत की विदेश नीति इस दौड़ में न सिर्फ चूकी है बल्कि चीन का सामना करने में इतने मुश्किल हालात भी पैदा हुए हैं कि एक वक़्त बिना किसी एंजेडे के सबंध ठीक करने भर के लिए प्रधानमंत्री मोदी दो दिन की चीन यात्रा पर चले जाते हैं.

दरअसल बात श्रीलंका से ही शुरु करें तो भारत और चीन दोनों ही श्रीलंका में भारी पूंजी निवेश की दौड़ लगा रहे हैं और राजनीतिक उठापटक की स्थिति श्रीलंका में तभी गहराती है जब कोलंबो पोर्ट को लेकर कैबिनेट की बैठक में भारत-जापान के साथ साझा वेंचर को ख़ारिज कर चीन को परियोजना देने की बात होती है. तब श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे इसका विरोध करते हैं और उसके बाद राष्ट्रपति सिरीसेना 26 अक्टूबर को प्रधानमंत्री रानिल को ही बर्ख़ास्त कर चीन के हिमायती रहे राजपक्षे को प्रधानमंत्री बना देते हैं. और मौजूदा सच तो यही है कि कोलंबो पोर्ट ही नहीं बल्कि कोलंबो में क़रीब डेढ़ बिलियन डालर का निवेश चीन होटल, जहाज़, मोटर रेसिंग ट्रैक तक बना रहा है. इसके मायने दो तरह से समझे जा सकते हैं. पहला, इससे पहले श्रीलंका चीन के सरकारी बैंकों का क़र्ज़ चुका नहीं पाया तो उसे हम्बनटोटा बंदरगाह सौ बरस के लिए चीन के हवाले करना पड़ा और अब कोलंबो पोर्ट भी अगर उस दिशा में जा रहा है तो दूसरे हालात सामरिक संकट के हैं. क्योंकि भारत के लिए चीन उस संकट की तरह है जहां वह अपने मिलिट्री बेस का विस्तार पड़ोसी देशों में कर रहा है. कोलंबो तक अगर चीन पहुंचता है तो भारत के लिए संकट कई स्तर पर होगा. यानी श्रीलंका के राजनीतिक संकट को सिर्फ श्रीलंका के दायरे में देखना अब मूर्खतापूर्ण ही होगा. ठीक वैसे ही जैसे चीन मालदीव में घुस चुका है. नेपाल में चीन हिमालय तक सड़क के ज़रिये दस्तक देने को तैयार हो रहा है. भूटान में नई वाम सोच वाली सत्ता के साथ निकटता के ज़रिये डोकलाम की ज़मीन के बदले दूसरी ज़मीन देने पर सहमति बनाने की दिशा में काम कर रहा है. और बांगलादेश जिस तरह हथियारों को लेकर चीन पर निर्भर है. क़रीब 31 अरब डालर लगाकर बांग्लादेश की दर्जन भर परियोजनाओं पर काम कर रहा है. हालांकि पहली बार बांग्लादेश ने पद्मा नदी पर बनने वाले 20 किलोमिटर लंबे पुल समेत कई अन्य परियोजनाओं को लेकर 2015 में हुए चीन के साथ समझौते से अब पांव पीछे खिंचे हैं. लेकिन जिस तरह बांग्लादेश ने ढाका स्टाक एक्सचेंस को 11.99 करोड डालर में चीन को बेच दिया और इसी के सामानातंर पाकिस्तान की इक्नामी भी अब चीन ही संभाले हुए है.

तो क्या पाकिस्तन चीन का नया उपनिवेश है? और नए हालात में क्या इस बात से इंकार किया जा सकता है चीन की विस्तारवादी नीति पूंजी निवेश कर कई देशों को उपनिवेश बनाने की ही दिशा में जा रही है?

दरअसल ये पूरी प्रक्रिया भारत के लिए खतरनाक है. लेकिन समझना ये भी होगा कि इसी दौर में भारत की विदेश नीति ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन को खत्म कर दिया. पड़ोसियों के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए सार्क मंच भी ठप कर दिया. यानी जिस गुटनिरपेक्ष मंच के ज़रिये भारत दुनिया के ताक़तवर देशों के सामने खड़ा हो सकता था, अपनी वैदेशिक सौदेबाज़ी के दायरे को विस्तार दे सकता था, उसे अमेरिकी राह पर चलते हुए खत्म कर गया. तो क्या भारत की विदेश नीति आर्थिक हितों को पाने के लिए अमेरिकी उपनिवेश बनने की दिशा में जाने लगी है?

ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि आज भारत की इक्नामी तो खासी बड़ी है. लेकिन अमेरिका तय करता है कि भारत ईरान से तेल ले या नहीं. या फिर रुस के साथ हथियारों के समझौते पर उस विरोध भारत के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है. जबकि एक सच तो ये भी है कि इंदिरा गांधी के दौर में भारत की अर्थव्यवस्था आज सरीखे मज़बूत भी नहीं थी. लेकिन तब इंदिरा गांधी अमेरिका से भी टकरा रही थीं. वाजपेयी के दौर में भी परमाणु परिक्षण अमेरिका को दरकिनार करने की सोच के साथ हुए.

तो आखिरी सवाल ये खड़ा हो सकता है कि अब रास्ता क्या है. दरअसल भारत का संकट भी राजनीतिक सत्ता को पाने या गंवाने पर जिस तरह जा टिका है उससे सारी नीतिया किस तरह प्रभावित हो रही हैं ये सभी के सामने है. क्योंकि हम ज़्यादा से ज़्यादा क्षेत्र में विदेश पूंजी और विदेशी ताक़तों पर निर्भर होते जा रहे हैं. ताज़ा मिसाल रिज़र्व बैंक की है जो देश के आर्थिक संकट का एक नायाब चेहरा है. चुनावी बरस होने की वजह से सत्ता चाहती है रिज़र्व बैंक 3 लाख करोड रिज़र्व राशि मार्केट में झोंके.

यानी इतनी बड़ी राशि के बाज़ार में आने से तीन असर साफ पड़ेंगे. पहला , डालर और मंहगा होगा. दूसरा मंहगाई बढ़ेगी. तीसरा पेट्रोल की कीमतें और बढ़ेंगी. यानी सत्ता में बने रहने की तिकड़म अगर देश की इक्नामी से खिलवाड़ करें तो ये सवाल आने वाले वक़्त में किसी भी सत्ता से पूछा जा सकता है कि विदेशी निवेश के ज़रिये राजनीतिक सत्ता जब उपनिवेश बन जाती है तो फिर देश को उपनिवेश बनाने से कोई कैसे रोकेगा.

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