कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

अडानी पर मेहरबान मोदी सरकार, छत्तीसगढ़ के परसा वनक्षेत्र में खनन करने की मिली मंजूरी

2009 में यूपीए सरकार ने इस परियोजना पर रोक लगाई थी.

मोदी सरकार ने छत्तीसगढ़ के हसदेव आरंद वन क्षेत्र में अडानी ग्रुप को खनन की अनुमति दे दी है. 2009 में यूपीए सरकार ने इस क्षेत्र को प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित किया था. इस पूरी प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी करने के आरोप लग रहे हैं.

हिन्दुस्तान टाइम्स में जयश्री नंदी की रिपोर्ट के मुताबिक मोदी सरकार के इस फ़ैसले से वन संरक्षण के क्षेत्र में भारत को दूरगामी परिणाम झेलने होंगे. रिपोर्ट के मुताबिक हसदेव आरंद देश के सबसे बड़े वन क्षेत्रों में से एक है. इसका क्षेत्रफल 1,70,000 हेक्टेयर है. राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड के 30 कोयला खदानों में से एक परसा का खदान अब अडानी इंडस्ट्रीज़ के राजस्थान कोलरिज लिमिटेड द्वारा संचालित किया जाएगा.

हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक इस खनन परियोजना को इसी साल के फ़रवरी महीने में पहली मंजूरी मिल गई थी. हालांकि इसके लिए गठित कमेटी ने कहा था कि इस वनक्षेत्र की 841 हेक्टेयर भूमि, जिसे खनन के लिए इस्तेमाल किया जाना है, वह काफ़ी घना वन क्षेत्र है. इससे पहले कमेटी की कई बैठकों में इन तथ्यों पर विस्तार से चर्चा की गई थी.

हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक 15 फरवरी 2018 की बैठक में ईएसी ने राज्य आदिवासी कल्याण विभाग से पूछा कि इस परियोजना के लिए ग्रामसभा के स्तर पर लोगों की मंजूरी है या नहीं. इसके साथ ही इस परियोजना से आदिवासियों के जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में भी पूछा गया था. इसके साथ ही राज्य वन्यजीव बोर्ड की सलाह भी इस मसले पर पूछी गई थी. इस वन क्षेत्र से हाथियों का एक कॉरिडोर भी गुजरता है, जिसे इस परियोजना के कारण होने वाले नुक़सान की आशंका जताई गई थी.

हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक 24 जुलाई 2018 की बैठक में ईएसी ने कहा कि राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड ने दो विषयों पर जानकारी भेजी है, लेकिन ग्राम सभा की सहमति से जुड़ी कोई बात सामने नहीं आई. ईएसी ने यह भी पूछा था कि क्या हसदेव आरंद में कोयला खदान को लेकर कोई मुक़दमा पेंडिंग है?

रिपोर्ट के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट में हसदेव आरंद को लेकर दो मुक़दमे दायर हुए हैं. पहला मुकदमा छत्तीसगढ़ के वकील सुदीप श्रीवास्तव द्वारा दायर किया गया है, जिसमें उन्होंने मांग की थी कि अडानी ग्रुप के साथ हुए संयुक्त उद्यम और कोयला वितरण समझौते को रद्द किया जाए.

दूसरी याचिका राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड द्वारा डाली गई है. इसमें नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल के उन निर्देशों को ख़त्म करने की मांग की गई थी, जिसके अनुसार छत्तीसगढ़ के कुछ वनक्षेत्रों में खनन को प्रतिबंधित किया गया है.

वन सलाहकार समिति ने इस मामले में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल से भी राय मांगी थी. इस पर जवाब मिला था कि जो भी केस चल रहे हैं, उनका परसा कोयला ब्लॉक पर कोई असर नहीं है. इसके बाद समिति ने इस खदान को मंजूरी देने की दिशा में काम करना शुरू कर दिया. हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक 21 फरवरी की बैठक में वन सलाहकार समिति ने माना कि परसा खदान को लेकर सुप्रीम कोर्ट और छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में मुक़दमा चल रहा है.

20 फरवरी को छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने वन सलाहकार समिति को पत्र लिखकर बताया था कि छ्त्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के दो गांवों के लोगों ने जिला कलक्टर के पास शिकायत की थी कि ग्राम सभा में उनकी बातों को तोड़ मरोड़ कर सहमति के तौर पर पेश किया गया.

सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के शोधार्थी कांची कोहली ने हिन्दुस्तान टाइम्स को बताया कि परसा में खदान परियोजना शुरू करने से मध्य भारत के एकमात्र बचे हुए इस वन क्षेत्र को काफ़ी नुक़सान होगी. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया में वन कानूनों का उल्लंघन किया गया है और यह परियोजना मानवाधिकार से भी छेड़छाड़ करता है.

हिन्दुस्तान टाइम्स से बातचीत में अडानी ग्रुप के प्रवक्ता ने कहा, “अडानी समूह एक जिम्मेदार कॉरपोरेट संस्था है और पर्यावरण और समुदायों के प्रति हमारी जागरूकता इस बात का सबूत है. खनन जिम्मेदारियों के अलावे अडानी ग्रुप छत्तीसगढ़ में सोलर पावर, शहरी गैस वितरण और सड़क निर्माण जैसी कई चीजों में दिलचस्पी रखता है. हम छत्तीसगढ़ की जनता और उसके परिस्थितियों के प्रति जवाबदेह हैं. हम देश की ऊर्जा की रक्षा करने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं.”

 

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