कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

यह देश तो मेरा है पर क्या मैं इस देश का हूँ?

लेकिन क्या भारत मुझे अपनाने से इनकार कर देगा? अगर नागरिकता संशोधन विधेयक संसद में पारित हो जाता है तो भारतीय संविधान का मूल ढांचा नष्ट हो जाएगा.

अपने ऊपर होने वाले तमाम हमलों और गतिरोधों के बावजूद भारत का संविधान अभी तक बचता आ रहा था. मई 2019 में नरेन्द्र मोदी सरकार की वापसी के बाद संविधान पर होने वाले हमले और तेज हो गए हैं.

संसद में नागरिकता संशोधन विधेयक पास हो जाने के बाद भारत का संवैधानिक ढांचा ध्वस्त हो जाएगा. हमें इस बात पर जरा भी संदेह नहीं होना चाहिए. इस विधेयक के पास होने के बाद संविधान की आत्मा ही ख़त्म हो जाएगी और उस मलबे से जो एक नया भारत बनेगा वह बहुसंख्यकवाद, बाहुबल और अल्पसंख्यकों के लिए अमानवीयता पर आधारित होगा.

यह विधेयक अधिकार और संबंध के पेचीदा बहसों पर आधारित है. इस विधेयक में इस बहस पर जोर है कि असली भारतीय कौन है और किन शर्तों पर? और असल बहस यह है कि भारत पर किसका अधिकार है? बंगाल से ताल्लुक रखने वाले और असमिया के एक युवा कवि काज़ी नील ने कहा है, “यह देश मेरा है. पर शायद मैं इस देश का कोई नहीं.” वह भारत से प्यार करते हैं, लेकिन भारत उन्हें अपनाने को तैयार नहीं.

नागरिकता किसी भी अधिकार की सबसे बुनियादी शर्त है. इस देश में किसके पास अधिकार होने चाहिए और किसके अधिकारों पर रोक लगाए जाने की जरूरत है?

इन सवालों के जवाब भारतीय संविधान के मानवतावादी और समावेशी ढांचे के भीतर बसे थे. संविधान का केंद्रीय आधार था कि भारत की नागरिकता कभी भी किसी की धार्मिक पहचान से तय नहीं होगी. भारत पर जितना अधिकार यहां के हिन्दुओं, सिखों, बौद्धों और जैनों का है उतना ही अधिकार मुसलमानों, ईसाईयों और पारसियों का भी है.

अधिकार और धर्म के नाम पर राजनीति के सवाल ने देश का बंटवारा किया. मुस्लिम लीग धार्मिक पहचान के आधार पर नागरिकता की वकालत करती थी, जिसकी वजह से भारत दो भागों में बंटा. वी डी सावरकर भी धर्म के आधार पर दो राष्ट्र के सिद्धांत को समर्थन देते थे. लेकिन, भारत की संविधान सभा ने हमेशा उस विचार को ख़ारिज़ किया, जो बताने की कोशिश करता था कि भारत पर सिर्फ यहां के हिन्दुओं का अधिकार है. जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, ” हम उन सभी लोगों को भारतीय मानते हैं जो खुद को भारत का नागरिक कहते हैं.”

नागरिकता संशोधन विधेयक लाकर भाजपा सरकार ने बंटवारे के पुराने जख़्म, डर, चिंता और नफ़रतों को फिर से ताजा कर दिया है. यह विधेयक धार्मिक आधार पर नागरिकता देकर दो राष्ट्र के सिद्धांत को प्रतिपादित करता है, जहां मुसलमानों को नागरिकता से बाहर रखा जाएगा.

सरकार की दलील है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में उत्पीड़न के शिकार धार्मिक अल्पसंख्यकों को शरण देने के लिए यह विधेयक लाया गया है. अगर सरकार की मंशा सच में यही है तो पाकिस्तान के अहमदिया समुदाय के लोग भी कम पीड़ित नहीं हैं. उन्हें तो मसजिद में नमाज़ पढ़ने पर जान से मार दिया जाता है. म्यांमार के अल्पसंख्यक रोहिंग्या भी तो शोषण झेल रहे हैं और चीन के उईगर मुसलमानों पर भी अत्याचार हो रहे हैं. इस आधार पर तो इन सभी अल्पसंख्यकों को नागरिकता दी जानी चाहिए.

1987 से पहले उन सभी लोगों को भारत का नागरिक माना जाता था, जिनका जन्म भारत में हुआ हो. इसके बाद बांग्लादेश से हो रहे अवैध घुसपैठ के नाम पर आंदोलन तेज हुए. तब भारत ने नागरिकता संबंधी नियम में एक बदलाव किए. नए नियम में कहा गया कि नागरिकता के लिए शर्त होगी कि आवेदक के माता-पिता में से कम से कम कोई एक भारत का नागरिक हो. 2004 में एक और संशोधन हुआ. नए संशोधन के मुताबिक मां-बाप में से कोई एक भारतीय नागरिक हो और दूसरा भारत में अवैध तरीके से नहीं रह रहा हो.

असम और केंद्र की भाजपा सरकार की सबसे बड़ी दिक्कत है कि एनआरसी की लिस्ट से बाहर किए जाने वाले लोगों में मुसलमानों से ज्यादा बांग्ला भाषी हिन्दू हैं. अगर उनलोगों को अवैध प्रवासी घोषित किया जाता है तो 2004 के प्रावधानों के अनुसार उनकी आनेवाली पीढ़ियों को भी भारत की नागरिकता नहीं मिल सकेगी. इस राजनीतिक दुविधा से निकलने के लिए भाजपा के पास नागरिकता संशोधन विधेयक का ही एकमात्र सहारा है. इसके पास होने के बाद बंगाली हिन्दुओं को शरणार्थी कहा जाएगा और बांग्ला मुसलमानों को अवैध घोषित कर दिया जाएगा. भले ही उन्होंने अपने पूरे जीवन में किसी और देश के बारे में ना जाना हो ना कभी किसी दूसरे देश से प्रेम किया हो.

असम में एनआरसी से बाहर हुए बांग्ला भाषी हिन्दुओं को बांग्लादेश के पीड़ित शरणार्थी करार देने के लिए भी कई नियमों का उल्लंघन करना पड़ेगा. इनमें से किसी भी व्यक्ति ने अपने आधिकारिक दस्तावेज़ों में नहीं कहा है कि वे बांग्लादेश से अवैध तरीके से भारत में आए हैं. अपने दस्तावेज़ों में उन्होंने यह बताने की कोशिश की है कि वे भारत के ही नागरिक हैं. नागरिकता संशोधन विधेयक लागू होने के बाद भारत की नागरिकता लेने के लिए उन्हें खुद को विदेशी बताना पड़ेगा. यहां सबूतों का भी मामला सामने आएगा. वे कैसे साबित करेंगे कि वे पड़ोसी देश के नागरिक हैं और उत्पीड़न के कारण भारत आए हैं? सच तो यह है कि ज्यादातर लोग बॉर्डर पार करके आए ही नहीं हैं, लेकिन उनके पास दस्तावेज़ नहीं है, जिससे अधिकारियों को बता सकें कि वे भारत के ही नागरिक हैं.

नागरिकता संशोधन विधेयक राष्ट्रीय स्तर पर एनआरसी का अगुआ है. नागरिकता संशोधन विधेयक पारित करके सरकार यह बताना चाहती है कि ग़ैर-मुस्लिम किसी भी समुदाय के लोगों को दस्तावेज़ ना होने पर भी शरणार्थी माना जाएगा और भारत की नागरिकता दी जाएगी. इसका मतलब है कि नागरिकता संशोधन विधेयक के बाद एनआरसी लागू करके सरकार मुसलमानों के ऊपर नागरिकता साबित करने का दबाव डालना चाहती है. हिन्दुस्तान में बहुत सारे लोग होंगे जिनके लिए नागरिकता संबंधी दस्तावेज़ जमा कराना असंभव है, लेकिन सिर्फ मुसलमानों को ही डिटेंशन सेंटरों में रखा जाएगा और उनके अधिकारों को छीन लिया जाएगा.

और चूंकि यह विधेयक दस्तावेज़ों की बात करती है तो मेरा धर्म किस दस्तावेज़ के आधार पर साबित होगा? फिलहाल तो कोई भी व्यक्ति जनगणना के वक्त ही अपना धर्म जाहिर करता है जो सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज होता है. ऐसा भी हो सकता है कि मेरा जन्म एक खास धर्म में हुआ हो और बड़ा होने पर मैं धर्म को नकार दूं. मेरे मां-बाप नास्तिक भी तो हो सकते हैं. लेकिन, अगर धर्म के आधार पर ही किसी की नागरिकता तय होने लगे तो सरकार किन दस्तावेज़ों के बल पर किसी को शरणार्थी घोषित करेगी और किसी को डिटेंशन सेंटरों में भेजेगी?

समानता और धार्मिक ग़ैर-बराबरी की बिनाह पर बने इस देश में अगर किसी व्यक्ति को उसकी धार्मिक पहचान के आधार पर नागरिकता से महरूम किया जा रहा है तो समझना चाहिए कि एक धर्म-निरपेक्ष देश के रूप में भारत का ख़ात्मा हो रहा है.

नागरिकता संशोधन विधेयक और एनआरसी भारत के धर्म-निरपेक्ष संविधान पर अभूतपूर्व हमले कर रहा है. आजाद भारत के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ. इसके ख़िलाफ़ देशभर में सिविल नाफ़रमानी या सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाए जाने की जरूरत है. इस आंदोलन की रूपरेखा भी हम और आप जैसे लोग ही तय करें.

अपनी तरफ से सत्याग्रह के लिए मैंने अपना अलग रास्ता चुना है. अगर नागरिकता संशोधन विधेयक पारित हो जाता है तो मुस्लिम भाई-बहनों को समर्थन देते हुए मैं खुद को मुसलमान घोषित करूँगा. जब देशभर में एनआरसी की घोषणा होगी तो मैं उसका बहिष्कार करूँगा और कोई भी दस्तावेज़ अधिकारियों के सामने प्रस्तुत नहीं करूँगा. इसके बाद मैं सरकार से मांग करूँगा कि वह मुझे भी वही सजा दे जो मुस्लिम भाई-बहनों को दिया जाना है. सरकार चाहे तो मुझे डिटेंशन सेंटर में बंद करे या फिर नागरिकता का अधिकार मुझसे छीन ले.

(लेखक पूर्व आईएएस और जाने माने मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं. यह लेख इंडियन एक्सप्रेस के प्रिंट संस्करण में “दिस लैंड इज़ माइन” शीर्षक से प्रकाशित हो चुका है. इसका हिन्दी अनुवाद कारवां मीडिया टीम के अभिनव प्रकाश ने किया है.)

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