कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

मुसलमानों के लिए भय और विस्थापन लेकर आएगा नागरिकता संशोधन बिल

महात्मा गांधी, भीमराव अंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू और मौलाना आज़ाद जैसे नेताओं ने हमें वह देश दिया था जिसपर यहां के सभी लोगों का बराबर का अधिकार था.

जिस अनहोनी के भय में हम अभी तक जी रहे थे, वह एक ख़तरनाक तूफान बनकर हमारे सामने आ गया है. यह तूफान भारत की मूल आत्मा को तबाह कर सकता है. हमलोग यह मानकर चल रहे थे कि एक खास धर्म को निशाने पर लेकर बन रहा नागरिकता संशोधन कानून पूर्वोत्तर के राज्यों तक ही सीमित रहेगा. लोग यह भी समझ रहे थे कि देशभर में एनआरसी लागू करने वाले बयान 2019 के चुनाव में वोट बटोरने के लिए दिए जा रहे हैं और चुनाव बीतते ही सबकुछ शांत हो जाएगा. लेकिन, अब यह स्पष्ट हो गया है कि केंद्र सरकार, सत्ताधारी भाजपा और आरएसएस नागरिकता संशोधन विधेयक और एनआरसी को देशभर में अपने एजेंडे के तौर पर लागू करना चाहती है.

गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में घोषणा की थी कि भारत की सरजमीं से हर घुसपैठिए को बाहर किया जाएगा. अब गृहमंत्री ने राज्यों से कहा है कि अवैध विदेशियों के लिए विदेशी न्यायाधिकरण (डिटेंशन सेंटर) बनाए जाएं. इससे अमित शाह ने पूर्वोत्तर की तरह देशभर में (दूसरे राज्यों के हितों की रक्षा के नाम पर) नागरिकता संशोधन विधेयक को पास करने की अपनी मंशा को और भी मजबूती से सामने रखा है. भाजपा शासित राज्यों के कई मुख्यमंत्री भी अपने यहां एनआरसी लागू करने की बात कह चुके हैं. इधर, मोहन भागवत ने कहा है कि एनआरसी लागू होने से किसी भी हिन्दू को कोई नुक़सान नहीं पहुंचेगा.

इस कारण बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश सहित महानगरों तक में रहने वाले मुसलमान दहशत और भय के माहौल में जी रहे हैं. इनके पास कई तरह के सवाल हैं, जिनका कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिल रहा. मसलन, उन्हें अपनी नागरिकता साबित करने के लिए किस तरह के दस्तावेज़ देने होंगे? 1971, 1947,1951 और 1987 में से किस वर्ष को नागरिकता साबित करने का आधार बनाया जाएगा? जो लोग अपनी नागरिकता से जुड़ा दस्तावेज़ नहीं दे पाएंगे उनके साथ क्या होगा? सत्ता में बैठे लोग किसी भी सवाल का जवाब नहीं दे रहे हैं और यह आशंका दिन-प्रति-दिन बढ़ती जा रही है. यहां तक कि दिल्ली में हमारे आश्रय गृह में रह रहे मुसलमान भी पूछ रहे हैं कि “हमारा क्या होगा? हमारे पास तो कोई भी दस्तावेज नहीं है.” इन सबके बीच दूसरे धर्मों के लोग बिल्कुल आराम से जी रहे हैं.

आजादी के 40 साल बाद यानी 1987 तक वे सभी लोग भारतीय नागरिक माने जाते थे, जिनका जन्म भारत में हुआ हो. 1987 में इस नियम में संशोधन किया गया. तब इस प्रक्रिया में जोड़ा गया कि जिसके माता-पिता में से कम से कम कोई एक भारतीय नागरिक होंगे उन्हें ही भारतीय माना जाएगा. 2003 में एक और बदलाव हुआ. नागरिकता के लिए यह अनिवार्य किया गया कि माता-पिता में से कोई एक भारतीय नागरिक हो और दूसरा अवैध रूप से भारत में ना रह रहा हो.

1987 और 2003 के संशोधनों ने एक ऐसी नींव रखी जिसका परिणाम एनआरसी और नागरिकता संशोधन विधेयक जैसे फैसले के रूप में हमारे सामने है. अगर नागरिकता संशोधन विधेयक पारित हो जाता है तो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए ग़ैर-मुस्लिम लोगों को भारत की नागरिकता दी जा सकेगी. 2003 के संशोधन में इस संशोधन के प्रावधानों को जोड़ने के बाद यह निष्कर्ष निकलता है कि ऐसे मुसलमान जो यह साबित नहीं कर पाए कि वे भारत में अवैध तरीके से नहीं रह रहे हैं, अवैध घुसपैठिए माने जाएंगे. ना सिर्फ उन्हें बल्कि उनके बच्चे और आने वाली पीढ़ी को भी भारत की नागरिकता नहीं दी जाएगी. यह अनंतकाल तक चलता रहेगा क्योंकि कानून में कहीं भी ऐसा नहीं कहा गया है कि ऐसे लोग कभी भी भारत के नागरिक बन पाएंगे या नहीं. भले ही वे भारत में पैदा हुए हों और उन्होंने अपने पूरे जीवन में किसी दूसरे देश के बारे में कभी सोचा भी ना हो.

यह तय है कि नागरिकता संशोधन विधेयक पास होने के बाद ग़ैर-मुस्लिम लोगों पर एनआरसी का कोई भी प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि इस कानून के अनुसार दस्तावेज़ ना होने पर भी ग़ैर-मुस्लिम लोगों को नागरिकता दी जा सकेगी. दूसरी ओर, मुसलमानों को साबित करना पड़ेगा कि उनके पूर्वज भारत में अवैध तरीके से नहीं आए थे. ग़ैर-मुस्लिम लोगों को भी अपना दस्तावेज़ दिखाना पड़ सकता है, लेकिन दस्तावेज़ की कमी की वजह से उन्हें घुसपैठिया नहीं कहा जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने भी अब जनता के जिम्मे ही यह भार छोड़ दिया है कि वह जन्म प्रमाण पत्र, वोटर आईडी कार्ड जैसे दस्तावेज़ों के आधार पर अपनी नागरिकता साबित करे. इन सभी दस्तावेज़ों में वर्तनी की इतनी ख़ामियां हैं कि इनके रहते हुए भी नागरिकता साबित करने में दिक्कत आ सकती है. इस मुद्दे को और भी चिंताजनक बनाते हुए गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों और यहां तक कि जिलाधिकारियों को भी निर्देश दिए हैं कि जिला स्तर पर विदेशी न्यायाधिकरण (फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल) बनाए जाएं. जिला स्तर पर बने ये न्यायाधिकरण ही तय करेंगे कि उनके यहां नागरिकता साबित करने के लिए किस दस्तावेज़ की जरूरत होगी.

विपक्ष की आपसी टूट और ढुलमुल रवैये के बीच सरकार को यह उम्मीद है कि नागरिकता संशोधन बिल राज्यसभा में भी पारित हो जाएगा. लेकिन, इस विधेयक को लाने से काफी पहले ही केंद्र सरकार ने 2015 में एक अधिसूचना जारी की थी कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के ग़ैर-मुस्लिम अवैध प्रवासियों को कठोर कानूनी प्रक्रियाओं से छूट मिलेगी. 2018 में सरकार ने उन्हें नागरिकता देने की दिशा में जोरशोर से काम करना शुरू कर दिया.

यह सच है कि 2015 में जारी की गई अधिसूचना और नागरिकता संशोधन विधेयक को भारतीय संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों को ताक पर रखकर आगे लाया गया है. इन अधिकारों में से एक है समानता का अधिकार. अगर पड़ोसी देशों में अत्याचार झेलने वाले लोगों को भारत की नागरिकता दी जा रही है, तो म्यांमार के रोहिंग्या, चीन के उइगर मुसलमान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के शिया-अहमदियों को भी यह हक मिलना चाहिए. साथ ही साथ इन देशों में रहने वाले सेक्यूलर ब्लॉगरों और समलैंगिक मुसलमानों (जिनके साथ ज्यादतियां की जाती हैं) को नागरिकता देने पर भी विचार करना चाहिए.

ये सभी संशोधन भारतीय संविधान की मूल आत्मा पंथ-निरपेक्षता पर चोट करते हैं. महात्मा गांधी, भीमराव अंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू और मौलाना आज़ाद जैसे नेताओं ने हमें वह देश दिया था जिसपर यहां के सभी लोगों का बराबर का अधिकार था. किसी भी व्यक्ति के धार्मिक पहचान या आस्था के आधार पर भेदभाव नहीं रखा गया था. भारत को ऐसा देश नहीं बनना था, जो धार्मिक पहचान के आधार पर अपने नागरिकों को अपनाए या दूर करे.

आज से सौ साल पहले हिन्दू महासभा ने तथा सन 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ऐसे भारत का सपना देखा था, जहां हिन्दुओं का राज होगा और मुसलमानों को या तो देश से बाहर निकाला जाएगा या दोयम दर्जे की नागरिकता दी जाएगी. आज की सरकार मानती है कि 100 साल बाद उनका समय आ गया है. नागरिकता संशोधन विधेयक और उसके बाद देशभर में एनआरसी लागू करने से देश के करोड़ों मुसलमान भय, उत्पीड़न और विस्थापन के शिकार होंगे.

आने वाले महीनों में एक भयानक तूफान भारत को अपनी चपेट में लेने की चेतावनी दे रहा है. यह तूफान भारत के मूल ढांचे और इसके सिद्धांतों को नष्ट कर देगा. हमारे मुसलमान भाई और बहन इस तूफान को स्पष्ट रूप से देख रहे हैं और हम सभी लोग बेपरवाह होकर अपने जीवन में मस्त हैं.

क्या हमें यह नहीं मानना चाहिए कि नागरिकता संशोधन विधेयक जैसे कानून लाने भारत के धर्म-निरपेक्ष लोकतांत्रिक संविधान की हत्या हो जाएगी?

लेखक जाने-माने मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं. यह लेख 3 अक्टूबर 2019 को द इंडियन एक्सप्रेस के प्रिंट संस्करण में “द राइजिंग स्टॉर्म” शीर्षक से प्रकाशित हो चुका है, जिसका अनुवाद अभिनव प्रकाश ने किया है.

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