कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

आरबीआई पर मोदी का शिकंजा: रिज़र्व बैंक में सरकारी हस्तक्षेप क्यों है अर्थव्यवस्था के लिए ख़तरनाक, जानिए पूरा मामला

मोदी सरकार आरबीआई के लिए धारा 7 का इस्तेमाल करने जा रही है, जो 83 साल के इतिहास में आजतक नहीं हुआ है.

आरबीआई और केंद्र सरकार के बीच द्वंद्व अब जगज़ाहिर हो चुका है. हालिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि उर्जित पटेल आरबीआई गवर्नर के पद से इस्तीफ़ा दे सकते हैं. दूसरी ओर ऐसी ख़बरें भी सामने आ रही हैं कि केंद्र सरकार धारा 7 का फ़ायदा उठाते हुए आरबीआई को कई निर्देश भी दे सकती है. इन तमाम ख़बरों के बीच आइए जानते हैं उन बातों के बारे में जो आरबीआई और सरकार के बीच कड़वाहट का सबब बनी हुई है. साथ ही जानेंगे धारा-7 के बारे में जो आरबीआई की स्वयत्तता के आड़े आ रहा है.

आरबीआई और केंद्र सरकार के बीच विवाद का कारण:

इस मसले को जानने के लिए सबसे पहले यह समझने की ज़रुरत है कि आखिर किन मुद्दों की वजह से आरबीआई और सरकार के बीच तनाव है. इस तनाव की सबसे बड़ी वजह हाल के दिनों में केंद्र सरकार का आरबीआई में हस्तक्षेप करना है. बीबीसी हिंदी की रिपोर्ट के मुताबिक़ अर्थव्यवस्था में लगातार आई मंदी, अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी, डॉलर के मुकाबले लगातार कमज़ोर होता रुपया और बैंकिंग सेक्टर में बढ़ते एनपीए की वज़ह से सरकार और आरबीआई के बीच रार ठनी है. बीते हफ़्ते आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने रिज़र्व बैंक की स्वयत्तता पर प्रश्न उठाते हुए कहा था ‘सरकार आरबीआई की आज़ादी का सम्मान करे. अगर सरकार ऐसा नहीं करेगी तो उसे बाज़ार की नाराजगी झेलनी पड़ेगी. जिसके बाद से सरकार और आरबीआई के बीच तनाव और कड़वाहट मैदानी जंग की तरह दिख रही है.’

क्या है धारा 7 और इसे लेकर क्यों है विवाद:

आरबीआई एक्ट की धारा-7 के अनुसार सरकार को यह अधिकार होता है कि वह रिज़र्व बैंक को निर्देश जारी कर सकती है. यदि आसान शब्दों में कहा जाए तो धारा 7 कहीं न कहीं आरबीआई गवर्नर के अधिकारों को कमज़ोर करने की भूमिका निभाता है. धारा 7 में केंद्र सरकार जनहित को ध्यान में रखते हुए और रिज़र्व बैंक के गवर्नर से सलाह करके उन्हें निर्देश जारी कर सकती है. धारा 7 के लागू होने के बाद बैंक कार्य से जुड़े फ़ैसले आरबीआई गवर्नर के स्थान पर रिज़र्व बैंक के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स लेंगे. गवर्नर और उसके द्वारा नामित डिप्टी गवर्नर के न होने की स्थिति में भी ‘सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स’ के पास सरकार के दिए निर्देशों का पालन करने का अधिकार होगा. यानी ‘बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स’ वे सारे फ़ैसले लेने के लिए स्वतंत्र होगा, जो आमतौर पर रिज़र्व बैंक द्वारा लिए जाते हैं. यानी धारा 7 लागू किए जाने से आरबीआई की स्वायत्तता एक तरह से समाप्त हो सकती है.

आरबीआई की प्रतिक्रिया क्या है:

पिछले कुछ दिनों से मीडिया में लगातार ख़बरें आ रही हैं कि आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल अपने पद से इस्तीफ़ा दे सकते हैं. हालांकि इस बात की अभी तक कोई साफ तौर पर पुष्टि नहीं हुई है. फ़र्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार रिज़र्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने 19 नवंबर, 2018 को बोर्ड की बैठक बुलाई है, जहां रिज़र्व बैंक और सरकार के बीच कड़वाहट वाले मुद्दों पर विस्तार से चर्चा होगी. बीते शुक्रवार को आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने अपने भाषण में अर्जेंटीना में 2010 के आर्थिक संकट के बारे में चेतावनी देते हुए कहा था ‘अर्जेंटीना के केंद्रीय बैंक के गवर्नर को जमा पूंजी सरकार को देने के लिए मज़बूर किया गया था, जिसकी वजह से अर्जेंटीना को डिफ़ॉल्टर होना पड़ा. अर्जेंटीना को उसके केंद्रीय बैंक के मामलों में सरकार के हस्तक्षेप की भारी क़ीमत चुकानी पड़ी थी.’ उन्होंने कहा था कि जो सरकारें केंद्रीय बैंकों की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करती हैं, उन्हें बाज़ार संकट में कभी न कभी फंसना पड़ता है. अर्थव्यवस्था सुलगने लगती है और अहम संस्थाओं की भूमिका खोखली हो जाती है. विरल आचार्य का कहना है कि उनके इस भाषण को गवर्नर उर्जित पटेल की सहमति थी.

इसका क्या नुकसान हो सकता है:

धारा 7 लागू होने से आरबीआई की स्वयत्तता पर प्रहार होता ही है. इसके साथ-साथ आरबीआई गवर्नर के अधिकार भी कमज़ोर हो जाते हैं. रिज़र्व बैंक द्वारा लिए जाने वाले फ़ैसलों पर केंद्र सरकार का निर्देश कार्य करता है. यह एक प्रकार से आरबीआई की स्वतंत्रता को समाप्त करता है.

इससे पहले भी कभी आरबीआई और केंद्र सरकार के बीच हुई है खींचतान?

एक रिपोर्ट के मुताबिक़ यदि देखा जाए तो आरबीआई के 83 वर्षों के इतिहास में कभी भी किसी सरकार ने धारा-7 का इस्तेमाल नहीं किया था. यदि मोदी सरकार धारा-7 को लागू करती है तो यह इतिहास में पहली ऐसी सरकार होगी जो आरबीआई की स्वायत्तता पर हस्तक्षेप करेंगी.

 गौरतलब है कि केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने ट्वीट कर कहा कि “हमने 1991, 2008 और 2013 में भी धारा-7 लागू नहीं किया. उन्होंने कहा, ‘मौजूदा समय में इस धारा को लागू किए जाने की क्या ज़रुरत है. इससे पता चलता है कि सरकार अर्थव्यवस्था के बारे में तथ्यों को छुपा रही है और इसके लिए बुरी तरह से हाथ-पांव मार रही है. रिपोर्टों से पता चल रहा है कि सरकार ने आरबीआई ऐक्ट धारा-7 लागू करके रिज़र्व बैंक को ऐसे निर्देश दिए हैं जो पहले कभी नहीं दिए गए. मुझे डर है कि अब और भी बुरी ख़बरें सुनने को मिलेंगी.’

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