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प्रशांत भूषण के ख़िलाफ़ अवमानना नोटिस पर 100 से अधिक बुद्धिजीवियों ने जताया रोष, कहा – यह एक वरिष्ठ अधिवक्ता को डराने और चुप कराने का स्पष्ट प्रयास

न्यायालय ने मामले पर अगली सुनवाई के लिए सात मार्च की तारीख तय की है.

सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के ख़िलाफ़ दायर अवमानना याचिका पर 100 से अधिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों और पूर्व सिविल सेवकों ने एक संयुक्त बयान जारी किया है. इस बयान में उन्होंने अवमानना याचिका पर गहरी वेदना व्यक्त करते हुए कहा है कि, “ देश में यह एक वरिष्ठ अधिवक्ता को डराने और चुप कराने का स्पष्ट प्रयास है.”

द वायर के अनुसार उच्चतम न्यायालय ने 6 फरवरी को वरिष्ठ वकील और समाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण को अवमानना नोटिस जारी किया. जिसमें उच्चतम न्यायालय ने एम. नागेश्वर राव को सीबीआई का अंतरिम निदेशक नियुक्त करने के न्यायालय के फैसले की कथित तौर पर आलोचना करने वाले ट्वीट के लिए प्रशांत भूषण से अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल तथा केंद्र की अवमानना याचिकाओं पर जवाब मांगा.

भूषण को जवाब देने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया गया है. न्यायालय ने मामले पर अगली सुनवाई के लिए सात मार्च की तारीख तय की है.

वहीं, कार्यकर्ताओं के बयान में कहा गया है कि भूषण अपने ट्वीट के माध्यम से केवल सीबीआई प्रमुख की नियुक्ति की प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता की मांग कर रहे थे. लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के विश्वास और विश्वास को स्थापित करने के लिए पारदर्शिता आवश्यकता है.

साथ ही यह भी कहा गया है कि अदालत में सीलबंद कवर में सौंपी गई साम्रगी की सत्यता पर संदेह और चिंता पैदा होती है. हस्ताक्षरकर्ताओं द्वारा आशंका व्यक्त करते हुए कहा गया कि “सरकार शीर्ष अदालत को गुमराह कर सकती है”,  दुर्भाग्य से इसके लिए वरीष्ठ वकील पर “अदालत की अवमानना का आरोप लगाया जा रहा है.”

ग़ौरतलब है कि एम. नागेश्वर राव की नियुक्ति को लेकर जनवरी अंत में एक और याचिका शीर्ष अदालत में दायर की गयी थी. याचिका में सरकार के फैसले को चुनौती देते हुए कहा कि, “यह नियुक्ति अवैध है. क्योंकि चयन समिति को दरकिनार कर सरकार द्वारा एकतरफ़ा नियुक्ति की गयी  है.”

याचिका में आगे दावा किया गया कि यह आदेश दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम का उल्लंघन है. वहीं,राव की नियुक्ति में पारदर्शिता की कमी और सरकार की प्रोटोकॉल को दरकिनार करना भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे पत्र में कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी उठाया था.

बता दें कि  मोदी सरकार ने पिछले अक्टूबर में राव को अंतरिम सीबीआई निदेशक के रूप में नियुक्त किया था. यह नियुक्ति उच्चस्तरीय चयन समिति की मंजूरी के बिना किया गया था.

द वायर के अनुसार अदालत ने उस समय कहा कि, कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना सरकार के पास सीबीआई निदेशक को एकतरफा रूप से नियुक्त करने की कोई शक्तियां नहीं है. सीबीआई निदेशक के चयन के लिए उच्चाधिकार प्राप्त चयन समिति की सिफारिशों के आधार पर चयन की आवश्यकता होती है.

हालांकि, फैसले के दो दिन बाद, डीओपीटी ने एक आदेश जारी कर राव को अंतरिम सीबीआई निदेशक नियुक्त किया. आदेश में कहा गया है कि यह “पहले की व्यवस्था के अनुसार” किया गया है और यह नहीं दर्शाता था कि इसे चयन समिति द्वारा स्वीकृत किया गया है.

वहीं, 1 फरवरी को मामले में सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने पीठ को अंतरिम सीबीआई निदेशक पर निर्णय लेने वाली संबंधित कागजात सौंपी. वहीं, भूषण ने उसी की एक प्रति की मांग की, तो उन्हें “एजी ने गोपनियता का दावा करते हुए देने से इनकार कर दिया था. इसके बाद एक्टिविस्ट-वकील ने सोशल मीडिया पर चिंता जताई, जो बाद में अवमानना याचिका पर लाया गया.

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