कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

2019 के लोकसभा चुनाव में किन मुद्दों की आशा करता है दलित समाज, यहां जानिए

राष्ट्रीय दलित मानवाधिकार अभियान के महासचिव एन पॉल दिवाकर ने कहा कि आज का दौर दलितों के लिए काफ़ी गंभीर है.

आगामी लोकसभा चुनाव दलितों के असल मुद्दों पर लड़ा जाए इसके लिए ‘राष्ट्रीय दलित मानवाधिकार अभियान’  ने सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ‘दलित घोषणापत्र’ जारी किया. इस घोषणा पत्र में 12 विषयगत मांगों का शामिल किया गया, जिसमें दलित समाज के लिए वास्तविक लोकतंत्र के साथ-साथ सामाजिक आर्थिक न्याय की मांग की गई.

दिल्ली स्थित प्रेस क्लब में मीडिया से मुख़ातिब होते हुए इस अभियान के महासचिव एन पॉल दिवाकर ने कहा कि आज का दौर दलितों के लिए काफ़ी गंभीर है. यह केवल दलितों पर हिंसा का ही रूप नहीं बल्कि इसके कई आयाम हैं. यह प्रावधान, बजट, योजना और कोटा में दलितों की हक़मारी का है.

दलित आर्थिक अधिकार आंदोलन- राष्ट्रीय दलित मानवाधिकार अभियान के महासिचव बीना जे पलिकल ने कहा कि “मोदी जी कहते हैं कि हम दुनिया के पांचवीं सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हैं, लेकिन इसका क्या फ़ायदा जब आज भी लोग दूसरे का मैला साफ़ कर रहे हैं और उसे ढो रहे हैं.”

बीना पलिकल ने आगे कहा कि केंद्र सरकार जिस प्रकार सवर्णों के दस प्रतिशत आरक्षण को लागू करने के लिए जिस प्रकार उतारू दिख रही है, यदि वो दलितों के योजनाओं के लिए भी इसी प्रकार प्रयास करती तो आज तस्वीर कुछ और होती. किसी भी राजनीतिक पार्टी का घोषणापत्र बस घोषणा ही न हो, बल्कि उसका सही क्रियान्वयन भी होना चाहिए.

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अंत में अभियान के महासचिव वी. ए. रमेश नाथन ने घोषणापत्र के मूल्य बातों को सामने रखा. उन्होंने कहा कि इस सरकार के चार सालों में दलित समाज असुरक्षा के माहौल में हैं. सरकार को दलित और आदिवासी समाज के हितों का ख़्याल नहीं है. सरकार की तरफ़ से और न्यायालय के तरफ़..हर जगह से दलितों को निराशा हाथ लग रही है.”

क्या है राष्ट्रीय दलित मानवाधिकार अभियान( एनसीडीएचआर)

एनसीडीएचआर दलित मानवाधिकार रक्षकों, शिक्षाविदों और वकीलों का एक आंदोलन है. इससे जुड़े लोग जाति-आधारित भेदभाव को सक्रिय रूप में देखते हैं. एनसीडीएचआर ने संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ जैसे मानवाधिकार निकायों के साथ काम किया है और दलित अधिकारों और चिंताओं को उठाने में सफ़ल रहा है.

इस अभियान के सचिव रमेश नाथन ने घोषणापत्र पढ़ते अपनी मांगों को सामने रखा:

1. सरकार बनने के  दो साल के भीतर मैनुअल स्कैवेंजिंग की अमानवीय प्रथा को समाप्त करना.

2.दलित और आदिवासी महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा को रोकना, जातिवाद और पितृसत्ता से बाहर निकालना

3. अंतरजातीय विवाहित जोड़ों की सुरक्षा के लिए कानून बनाना

4. शैक्षिक संस्थानों में बच्चों के ख़िलाफ़ भेदभाव और हिंसा को रोकना

5. एससी और एसटी परिवारों के पास योजनाओं की सीधी पहुंच के लिए आर्थिक योजनाओं का परिचय देना.

6. एसटी और एससी परिवार को खेती के लिए 5 एकड़ कृषि योग्य भूमि वितरित करना

7. दलित मुसलमानों और दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के लिए संवैधानिक संशोधन

8. चुनावी प्रक्रिया में लोकतंत्र का संवर्धन और संरक्षण सुनिश्चित करना, स्वतंत्र निष्पक्ष और हिंसा मुक्त चुनाव

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