कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

वादा करो कि खुद को कभी भी अपने ही बंधनों में नहीं बांधोगी: दो अजनबी दोस्तों की इलेक्ट्रॉनिक चिट्ठियां

अपने जीवन में तुमने ना सिर्फ अपने पति को खोया है बल्कि पति की चाहत पूरी करने की कोशिश में खुद को ठगा भी है.

मेरे ईमेल के इनबॉक्स में एक संदेश आया. इसके सब्जेक्ट सेक्शन में मेरे उस लेख का शीर्षक लिखा था, जो हाल ही में मिंट लॉन्ज ने छपी थी. मुझे लगा किसी पाठक ने मेरे लेख पर अपनी प्रतिक्रिया भेजी है. मैंने ईमेल ओपन किया. ईमेल की शुरुआत ऐसे हुई थी- डिअर नताशा.

आगे लिखा था- “मैं 45 साल की हूं और मेरी शादी के 25 साल हो चुके हैं. मेरे पति ने मुझे कभी प्यार नहीं किया. हालांकि मैंने उन्हें खुश रखने के लिए क्या नहीं किया. शादी के एक साल के भीतर ही हमदोनों के बीच प्रेम और आत्मीयता ख़त्म हो गई थी. शादी के वक्त मेरे पति ने मेरे परिवार वालों के सामने अपनी उम्र को लेकर झूठ बोला था. मेरे ससुराल वालों ने भी अपने कारोबार को लेकर मेरे घरवालों से झूठ ही बोला. जब इस पर मैंने सवाल उठाए तो पति ने मुझे अपमानित किया. इन सबसे परेशान होकर मैं अपने मायके आ गई तो वे सुधार का एक मौका मांगते हुए मुझे घर ले आए. मुझे याद है कि उन दिनों मेरे मन में आत्महत्या के विचार अक्सर आया करते थे.”

आगे के कुछ लाइनों में महिला ने अपनी मौजूदा स्थिति बताई थी, “हमारा बेटा 22 साल का हो गया है. पढ़ाई और करियर संवारने के लिए उसे विदेश भेजा गया है. पिछले साल मुझे मालूम चला कि मेरे पति का संबंध किसी दूसरी महिला के साथ भी है और उनका 3 साल का एक बच्चा भी है. कुछ साल पहले से ही मुझे पता लग गया था कि मेरे पति का चक्कर अपनी ही ऑफिस के किसी महिला कर्मचारी के साथ चल रहा है.”

ईमेल के आख़िरी पैराग्राफ में ये बातें लिखी हुई थीं, “अब हमलोग अलग हो रहे हैं. वो अक्सर काम के सिलसिले में बाहर जाया करते हैं और मैं घर की ही देखभाल करती रहती हूं. अब जब मैं इन सब बंधनों से आज़ाद हो रही हूं तो खुद को हारा हुआ क्यों महसूस करूं? उम्र के इस पड़ाव पर मैं अपने जीवन को इन खरोचों से उबारने की कल्पना भी नहीं कर सकती थी. मैं अपनी उम्र से ज्यादा बूढ़ी दिखती हूं. मैंने इन सब चीजों को ठीक करने की बहुत कोशिश की. प्लीज़ आप मेरे ईमेल का जवाब जरूर दीजिएगा.”

इस ईमेल का जवाब तसल्ली से देने के लिए मैंने उस महिला से थोड़ा समय मांगा. इस पर उन्होंने मुझे अपने किसी दोस्त सा बर्ताव किया. अगले ईमेल में उन्होंने अपने हाउसिंग सोसाइटी की महिलाओं के साथ बिताई गई छुट्टियों के बारे में बताया. उन्होंने मुझे एक तस्वीर भी भेजी, जो सोसाइटी की महिलाओं ने अपने व्हाट्सऐप ग्रुप के लिए खिंचाई थी. इस ईमेल में उन्होंने लिखा था- “कोई जल्दबाजी नहीं है पर मैं चाहती हूं कि कोई मुझे अपने जीवन में उम्मीद दिखाए. मुझे इस बात का डर है कि अकेलापन मुझे दिन-पर-दिन उगलता ही जा रहा है पर मैं कितनी देर समाज की झूठी बातों में खुद को उलझाए रख सकती हूं. मैं नाउम्मीद हो चुकी हूं. मुझे नहीं पता कि अब मेरे जीने का क्या मतलब है?”

मैंने उनसे पूछा कि क्या हम पुराने दोस्तों की तरह बात कर सकते हैं? ऐसा दोस्त जो मुद्दतों तक दूर रहने के बाद करीब आए हों. मुझे जवाब मिला- “मैं किन्हीं कारणों से ही तुम पर विश्वास करती हूं.”

मैंने जवाब दिया- मैं तुम्हें इस सारी समस्या का जड़ बताता हूं. अपने जीवन में तुमने ना सिर्फ अपने पति को खोया है बल्कि पति की चाहत पूरी करने की कोशिश में खुद को ठगा भी है. आज तुम्हें बुरा महसूस हो रहा है क्योंकि तुम्हारा कोई हमदर्द नहीं बचा है. तुमने खुद को उन सभी चीजों को बचाने में खपा दिया जो कभी इस दुनिया में थे ही नहीं. जिस चीज में कोई जान नहीं थी. उन रिश्तों को बचाने में तुमने अपने साथ ज्यादती की.

आज तुम जिस हालात में हो उसे स्वीकार करो. अपने गुस्से का इजहार करो. खुद को कोसने का मन करे तो कोसो. अपने दुख को गहराई तक महसूस करो. तुमने किसी को प्यार किया और उसके बदले में तुम्हें कुछ नहीं मिला. तुम जिस बेशकीमती चीज को संभाल कर रख रही थी वह अब हमेशा के लिए टूट चुका है. अब तुम्हें इस संसार में अपने प्रेम के लिए दूसरी चीजों की तलाश करनी है. प्रेम तो एक नदी की तरह है, वह अपना रास्ता खुद अख़्तियार कर लेगा.

चित्र साभार: नताशा बधवार

तुम्हारी तकलीफ़ कम होने में वक्त लग सकता है. पच्चीस सालों का वक्त कम नहीं होता और इतने सालों की यादों को भूलना कम तकलीफ़देह नहीं होगा.

हम सभी लोग एक ही समय पर जवान और वृद्ध दोनों होते हैं. तुम्हारे भीतर जो वृद्ध है वह अनुभव वाला और समझदार तो है पर वह कमजोर भी हो चुका है. जीवन के झंझावातों से टकराते हुए वह वृद्ध टूट गया है. तुम्हारे भीतर जो युवा है वह भले ही बुराइयों से भरा हो, लेकिन उसके अंदर जीने की तीव्र इच्छा है. वह तुम्हें जीने की दिशा देगा.

तुमने उम्मीद की थी कि तुम्हारे समर्पण और प्रयास के लिए तुम्हें वाज़िब हक़ मिलेगा. पर हुआ ठीक उल्टा.

अब बदलाव की शुरुआत करो. प्रयास करो कि अब तुम खुद को अपने दायरे से बाहर निकालोगी. यह सब आसान नहीं होगा. शुरुआत में ऐसा तुम्हें लग सकता है कि तुम खुद को धोखा ही दे रही हो . इस प्रक्रिया में कई बार टूटोगी. पर इन सब टकरावों से होते हुए तुम्हें खुद को संभालकर चलना है.

तो क्या करना चाहिए? हर रोज कुछ नया करने की कोशिश करो.

खुद को अपने जीवन के करीबी संबंधों से आज़ाद करो. समय-समय पर तुम कभी बेटी, कभी पत्नी और कभी मां बनती रही हो. इन्हें किरदारों के बदलने के बीच का जो वक्त है वो तुम्हारा अपना स्पेस हो सकता है. इसके लिए एक रूटिन या अनुशासन की जरूरत होगी. तुम्हें लग सकता है कि जो कर रही हो वह ग़लत है. लेकिन, ऐसा करने पर पाओगी कि तुम अपने दुख भूलने लगी हो. फिर धीरे-धीरे तुम इस गम से बाहर निकल जाओगी. जीवन में नई रोशनी दिखेगी.

एक नई शुरुआत करने के लिए 45 की उम्र बिल्कुल फिट है. 55, 65 और 75 किसी भी उम्र में तुम नई शुरुआत कर सकती हो. सभी लोग आपकी तरह भाग्यशाली नहीं हैं. उम्र के बहुत ही शानदार पड़ाव पर तुम आज़ाद हो रही हो. इस समय तुम बुजुर्गियत और जवानी के दोराहे पर खड़ी हो. अपनी पंखों को फैलाओ. जी भर कर घूमो, किताबें पढ़ो, गीत गुनगुनाओ, जो मन में आए करो. खुद को अब गंभीरता के लबादे से बाहर निकालो. जब मन करे कठोर बन जाओ, मन में आए तो शालीन और सहृदय बन जाओ. अपने भीतर के असलियत को पहचानो. उसी के साथ खो जाओ.

उन चीजों की लिस्ट बनाओ जो तुम सबसे पहले बनना चाहती थी. मुझे अगले ईमेल में बताना कि जब तुम किसी और के भरोसे नहीं बल्कि आज़ाद थी तब क्या किया करती थी. अपने अतीत से बाहर आओ.

कुछ महीने बाद मुझे ईमेल मिला. इसमें लिखा था, “मैं चाहती हूं कि तुम मेरी बातों को सबके सामने लाओ. मेरी कहानी दूसरे लोगों के लिए भी मददगार बने. मुझे लगता है इस कहानी से बहुत सारे लोग प्रभावित होंगे.”

चिट्ठी में आगे लिखा था- ऐसा नहीं है कि मैं अब तनाव से मुक्त हो गई हूं. पर अब मैं अपने मौजूदा स्थिति की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले रही हूं. भले ही किश्तों में खुश होती हूं पर इस खुशी के समय मैं खुद को बहुत सुरक्षित महसूस करती हूं. मुझे अब इस बात की चिंता नहीं होती कि मेरी खुशी और इंज्वाय के तरीके से कोई तकलीफ मान सकता है. मैं खुद भी यकीन नहीं कर पाती कि मेरे भीतर कैसे इतनी उत्साह और ऊर्जा आ गई है.

जैसा कि आप जानते हैं. मैं तो किसी की बात नहीं टालती. उस जवान-वृद्ध महिला ने मुझे अपनी कहानी लिखने को कहा, सो मैंने लिख दिया. अब बाकी आपके ऊपर है. आप उस महिला की कहानी से कुछ सीख लेना चाहें तो लीजिए. बदले में उन्हें अपना ढेर सारा प्यार और शुभकामनाएं भेजिए. प्यार भरे आपके शब्द शायद उस महिला के घाव पर मरहम लगा सकें.

नताशा बधवार

नताशा बधवार  “माय डॉटर्स मम” और “इमोर्टल फॉर अ मोमेंट” नामक पुस्तकों की रचनाकार हैं. यह लेख लाइव मिंट में “मेक अ  प्रॉमिस टू नेवर अबंडन योरसेल्फ अगेन” शीर्षक से प्रकाशित हो चुका है. इसका हिन्दी अनुवाद कारवां मीडिया टीम के अभिनव प्रकाश ने किया है. 

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