कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

दिल्ली: पिछले दो सालों में पुलिस हिरासत में 7 लोगों की मौत, आरटीआई से मिली जानकारी

पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स(पीडूयीएसआर) नामक एक संस्था ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में आरटीआई लगाकर यह सूचना प्राप्त की.

एक आरटीआई की जानकारी के अनुसार 2016-18 के बीच केवल दिल्ली में ही पुलिस हिरासत में सात लोगों की मौत हो गई. पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स(पीडूयीएसआर) नामक एक संस्था ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में आरटीआई लगाकर यह सूचना प्राप्त की. पुलिस हिरासत में हुए मौतों पर इस संस्था ने एक लंबी रिपोर्ट तैयार की है. रिपोर्ट के अनुसार इस प्रकार के अमानवीय मौत में न्याय पाना आज भी पहले के तरह मुश्किल है.

रिपोर्ट में बताया गया है कि यदि किसी व्यक्ति की पुलिस हिरासत में मौत हो जाती है तो ज़्यादा संभवाना है कि पुलिस प्रशासन उसे आत्महत्या करार देगी. नहीं तो भागने की नाकाम कोशिश भी बताया जा सकता है. इसके साथ ही इन मामलों में कोई गवाह नहीं होता इसलिए पुलिस के ख़िलाफ़ कोई आपराधिक मामला दर्ज करना भी एक बड़ी समस्या है. मजिस्ट्रेट जांच से सामान्यत पीड़ितों को न्याय नहीं मिलता. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि यह जांच पूर्ण रूपेण पुलिस द्वारा उपलब्ध कराए सबूतों पर ही टिकी होती है. इन मामलों में मुआवज़ा देने का कोई मापदंड भी नहीं बनाया गया है.

रिपोर्ट तमाम बिंदूओं का विश्लेषण करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि पुलिस को लगातार दंड मुक्ति प्राप्त है इसलिए यह घटनाएं रूक नहीं रही है. पुलिस हिरासत में हुए मौतों पर आपाराधिक मामला दर्ज करने की संख्या भी न के बराबर है.

बता दें कि पिछले दिनों बिहार के सीतामढ़ी में दो मुस्लिम युवकों की पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी. न्यूज़सेंट्रल24X7 ने सबसे पहले इस संवेदनशील घटना की रिपोर्टिंग की, तब जाकर यह मामला प्रकाश में आ पाया. बाद में मानवाधिकार आयोग के तरफ़ से बिहार सरकार को नोटिस जारी किया गया.

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