कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

अपने किए पर पश्चाताप करने के बजाय एम जे अकबर ने चुना बदले का रास्ता

एम जे अकबर की पितृसत्तात्मक सोच और बदले की भावना का सबूत है प्रिया रमानी के ख़िलाफ़ मानहानि का मुक़दमा

#Metoo अभियान के तहत प्रिया रमानी एवं कई अन्य महिला पत्रकारों के एम जे अकबर के ख़िलाफ़ आरोप लगाने के बाद, एम जे अकबार ने आज सोमवार को एक निजी मानहानि की शिकायत दर्ज की।

एक बात जो यहाँ निश्चित तौर पर खटक रही है वह यह है कि जहां इतनी सारी महिलाओं ने एम जे अकबर पर इलज़ाम लगाए, वहां सिर्फ और सिर्फ प्रिया रमानी पर ही मानहानि का आरोप लगाने का क्या मतलब था? क्या माननीय केंद्रीय मंत्री ने ऐसा इसलिए किया कि प्रिया रमानी वो पहली महिला थीं जिन्होंने मुखर रूप से उनकी करतूतों के बारे में ट्विटर पर बात की या इसलिए कि प्रिया रमानी ने अकबर के अपराधों से पीड़ित दूसरी महिला पत्रकारों को प्रोत्साहित किया कि वे खुलकर अपनी बात रखें? क्या एक महिला पर इस तरह से हमला करके माननीय केंद्रीय मंत्री जी बाकी पीड़ित महिलाएं को चुप करवाने के लिए एक उदाहरण स्थापित करना चाहते हैं?

इस मानहानि के शिकायत को दर्ज करने से निश्चित तौर पर अकबर का पितृसत्तात्मक और महिला विरोधी चेहरा और साथ ही बदला लेने की तीव्र भावना बिलकुल साफ़ नज़र आ रहे हैं।

ज्ञात हो कि केंद्रीय मंत्री एम जे अकबर ने कल रविवार को विदेश से लौटने के बाद ख़ुद पर लगे आरोपों को बेबुनियाद और राजनितिक उद्देश्यों से प्रभावित बताया था। गौरतलब है कि करीब 14 महिला पत्रकारों ने अकबर के ख़िलाफ़ आरोप लगाए हैं जिनमें से एक भारत की नागरिक भी नहीं हैं। इसके अलावा जिन महिलाओं ने अपनी आपबीती खुलकर साझा की, उन्होंने स्पष्ट रूप से अपने निजी और पेशेवर जिंदगियों को दांव पर लगाकर ऐसा किया। तो ऐसे में सवाल इस बात पर उठता है कि अकबर किस तरह के राजनितिक उद्देश्यों की बात कर रहे हैं।

इन सब में समझने वाली बात यह भी है कि एक तरफ जहां बाकी मामलों में पत्रकारों को अपने पदों से इस्तीफ़ा देना पड़ा या आरोपियों से जुड़े संस्थानों ने उन्हें मामलों में जांच ख़त्म होने तक लम्बी छुट्टी पर भेज दिया, ऐसे में इतने सारे आरोप लगने के बावजूद मोदी जी के छत्रछाया में अकबर अब तक अपने पद पर आसीन हैं

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