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विकास का ढिंढोरा पीटने के नाम पर आम जनता के ऊपर हमला कर रही है मोदी सरकारः ‘रेलवे निजीकरण’ के ख़िलाफ़ मजदूरों और कर्मचारियों का धरना प्रदर्शन

प्रदर्शन में शामिल कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार रेलवे को कॉर्पोरेट हाथों में देकर उनकी रोज़ी-रोटी छीन रही है.

दिल्ली के जंतर-मंतर पर बीते बुधवार (10 जुलाई) को विभिन्न इलाकों से आए मजदूरों और रेलवे कर्मचारियों ने मोदी सरकार के ‘रेल निजीकरण’ के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया. ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियंस (ऐक्टू) के बैनर तले आयोजित प्रदर्शन में लोगों ने रेलवे के निजीकरण के कारण पैदा होने वाली समस्याओं को लेकर आवाज उठाई और मोदी सरकार के ख़िलाफ़ जमकर नारेबाजी की.

रेल कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही देश की संपत्ति- भारतीय रेलवे को बेचने का ऐलान कर दिया है. रेल कर्मचारी  रेलवे में रिक्त पदों की भर्ती, रेलवे अपरेंटिस की समस्याओं, सातवें वेतन आयोग की अनियमितताओं इत्यादि मांगों को लंबे समय से  उठाते रहे हैं. लेकिन, कर्मचारियों की मांग सुनने की बजाय मोदी सरकार भारतीय रेलवे को बेचने का काम कर रही है. मोदी सरकार ने रेलवे की महत्वपूर्ण ट्रेनों का परिचालन भी निजी हाथों में देने का फैसला किया है.

जानें क्या है रेलवे 100-डे एक्शन प्लानः

केंद्र की मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान रेलवे के सभी उत्पादन इकाइयों (कोच फैक्ट्री) को 100 दिन के एक्शन प्लान के अंतर्गत एक कंपनी के हाथों सौंपने का प्रस्ताव दिया है. मंत्रालय की तरफ से बीते 18 जून को पेश किए प्रस्ताव के अनुसार अगले 100 दिनों की उत्पादन इकाइयों के निगमीकरण के लिए गहन अध्ययन किया जाएगा. देश की 7 उत्पादन इकाइयों को भारतीय रेलवे की नई इकाई इंडियन रेलवे रोलिंग स्टॉक (रेल के डिब्बे और इंजन) कंपनी के अधीन किया जाएगा. कंपनी का एक सीएमडी होगा. उत्पादन इकाईयां कंपनी के बोर्ड या सीएमडी को अपनी रिपोर्ट देंगी.

मंत्रालय का मानना है कि इससे रेलवे और इकाई दोनों को फायदा होगा. साथ ही निर्यात बढ़ेगा और परिचालन क्षमता को भी बढ़ावा मिलेगा. मंत्रालय ने कहा है कि इसके लिए रेल कर्मचारी संगठनों से भी वार्ता की जाएगी.

धरना प्रदर्शन पर बैठे लोगों का क्या कहना हैः

प्रदर्शन को संबोधित करते हुए ऐक्टू दिल्ली के अध्यक्ष संतोष राय ने कहा, “रेलवे का निजीकरण केवल रेल कर्मचारियों का नहीं बल्कि देश के सवा-सौ करोड़ जनता का मुद्दा है. रेल जनता की संपत्ति है, संसद में बहुमत मिलने का मतलब ये नहीं हो सकता कि मोदी सरकार रेल को निजी हाथों में बेच दे, ये जनता से गद्दारी है. सरकार रेलवे की उत्पादन इकाइयों को पहले निगमीकरण और फिर निजीकरण करने की योजना तैयार कर चुकी है.

मोदी सरकार के ख़िलाफ़ नारेबाजी करते प्रदर्शनकारी (फ़ोटो- शिवानी भंडारी)

संतोष राय ने न्यूज़सेन्ट्रल24X7 से बातचीत करते हुए बताया, “यह केवल रेलवे निजीकरण का मामला नहीं है. साल 2014 में मोदी सरकार बहुमत से सत्ता में आई और रेलवे बजट (जो आम बजट से अगल पेश किया जाता था) को खत्म कर दिया. वो निजीकरण की शुरुआत थी. यह केवल रेलवे कर्मचारियों पर हमला नहीं है बल्कि आम जनता पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा. इस निजीकरण से रेलवे में कर्मचारियों की भर्ती पर ताला लग जाएगा, मौजूदा कर्मचारियों की छंटनी होगी. प्लान-100 के चलते सभी शर्ते और कानून कॉर्पोरेट के हाथ दे दिया जाएगा.”

उन्होंने कहा, “हजारों लोग जो रोज अलग-अलग शहरों से आवागमन करते हैं, निजीकरण के कारण उनका रेल का सफर महंगा हो जाएगा. रेलवे में सिर्फ पैसे वाले लोग सफर कर पाएंगे. ये सरकार जय श्री राम और भारत माता की जय के नारे देती है, इस नारे के पीछे देश के सारे सरकारी उद्योग को कॉर्पोरेट घरनों के हाथ सौंपने की साजिश चल रही है.”

संतोष राय, ऐक्टू के दिल्ली अध्यक्ष, (फ़ोटो- शिवानी भंडारी)

संतोष राय ने कहा, “सरकार ने तेजस एक्सप्रेस का संचालन निजी हाथों में सौंपने का फैसला किया है, जो बिल्कुल गलत है. हम जनता के ऊपर हो रहे इस हमले का विरोध करेंगे.”

इंडियन रेलवे एम्प्लाइज फेडरेशन (IREF) के कर्मचारी किशन कुमार ने न्यूज़सेन्ट्रल24X7 से बातचीत करते हुए कहा, “रेल कर्मचारी उत्पादन इकाइयों को लेकर लगातर संघर्ष करते रहे हैं. सरकार द्वारा रेलवे कोच फैक्टरियों का निगमीकरण कर, उन्हें बेचने की साजिश रेल कर्मचारियों को मंजूर नहीं है.”

उत्तर रेलवे कर्मचारी संघ (NREU) के मनीष हरिनंदन जो दिल्ली रेलवे डिवीजन में सेक्रेटरी के पद पर कार्यरत हैं ने कहा, “दुर्भाग्य की बात है कि रेल चलाने के स्थान पर हम रेलवे को बचाने के लिए धरना दे रहे हैं, अपना रोज़गार बचा रहे हैं.”

मनीष हरिनन्दन, दिल्ली डिवीज़न के सेक्रेटरी (फ़ोटो- शिवानी भंडारी)

उन्होंने कहा, “सरकारी कर्मचारी होने के नाते जो तनख्वाह मुझे मिलती है वो निजीकरण की वजह से आधी हो जाएगी. इस मंहगाई में इतनी कम सैलेरी में अपने परिवार का भरण-पोषण कैसे करेंगे?”

मोदी सरकार पर विकास का ढिंढोरा पीटने का आरोप लगाते हुए ऐक्टू की दिल्ली सचिव श्वेता राज ने कहा कि विकास का ढिंढोरा पीटने के नाम पर मोदी सरकार आम जनता के ऊपर हमला कर रही है और लगातार निजीकरण को बढ़ावा दे रही है. मोदी सरकार 100 दिन के प्लान के साथ आई है. उस प्लान के अंतर्गत कोच फैक्ट्री को निजी कंपनियों को सौंप दिया गया है.

उन्होंने कहा, “पिछले कार्यकाल में लगातार रेल भाड़ों में बढ़ोतरी, रेल बजट को खत्म कर देना, विवेक देबरॉय कमिटी व नीति आयोग की सिफारिशों को लागू करने की ओर बढ़ना, ये सभी मोदी सरकार के जनविरोधी होने का सबूत है.”

श्वेता राज, ऐक्टू दिल्ली सचिव (फ़ोटो- शिवानी भंडारी)

श्वेता राज ने कहा कि मोदी सरकार मजदूरों-गरीबों को धर्म के नाम पर लड़ाकर, देश बेचने की योजना चला रही है. इसका उदाहरण- रेलवे और तमाम सार्वजनिक उपक्रमों को बेचना है.

प्रदर्शन में मौजूद निर्माण मज़दूरों ने अपनी बात रखते हुए कहा कि अगर रेल को निजी हाथों में बेच दिया जाएगा, तो उनके लिए रेल से सफर करना बहुत मुश्किल हो जाएगा. रेल कम पैसों में लंबी दूरी तय करने का सबसे सस्ता साधन है. लेकिन निजीकरण के कारण रेलवे का सफर करना उनकी जेब की क्षमता से ज्यादा महंगा हो जाएगा.

ग़ौरतलब है कि रेलवे कर्मचारी सरकार द्वारा सात उत्पादन फैक्ट्री व कुछ रेलगाड़ियों को निगमीकरण व निजीकरण के फैसले का जमकर विरोध कर रहे हैं. बीते 6 जुलाई को हरियाण के रेवाड़ी में नोर्थ वेस्टर्न रेलवे एंपलाइज यूनियन ने सरकार के फैसले के ख़िलाफ़ विरोध प्रकट करते हुए जमकर नारेबाजी की थी.

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