कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

“कॉलेज में ना शिक्षक हैं ना किताबें, कैसे पढ़ें छात्र”: पिथौरागढ़ के पुस्तक-शिक्षक आंदोलन के समर्थन में दिल्ली में धरना प्रदर्शन

“नेता जी पलायन रोकना चाहते हैं विकास करना चाहते हैं, लेकिन पुस्तकालयों में किताबें और बच्चों को शिक्षा नहीं दे सकते.”

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले में इन दिनों लक्ष्मण सिंह महर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय (LSMPG) के छात्रों का किताब और शिक्षकों की मांग को लेकर अनोखा प्रदर्शन चल रहा है. छात्र मुंह में काली पट्टी बांधकर गांधीवादी तरीके से धरना प्रदर्शन कर रहे हैं. लेकिन, 25 दिनों से लगातार चल रहे इस धरना प्रदर्शन का राज्य की भाजपा सरकार पर कोई प्रभाव पड़ता नजर नहीं आ रहा है.

बीते रविवार (14 जुलाई) को दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिथौरागढ़ के छात्रों के प्रदर्शन को समर्थन देने के लिए अलग-अलग कॉलेजों के छात्र और दिल्ली में रह रहे पिथौरागढ़ के लोगों ने धरना प्रदर्शन का आयोजन किया.

धरने में शामिल हुए छात्रों का कहना है कि शिक्षा कोई मुद्दा नहीं बल्कि हर बच्चे का अधिकार है. लेकिन, आज शिक्षा की स्थिति यह है कि छात्रों के पास पढ़ने के लिए पर्याप्त किताबें और पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं.

क्या है शिक्षक-पुस्तक आंदोलनः

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले में LSMPG कॉलेज के छात्र लंबे समय से पुस्तकों और शिक्षकों की कमी का सामना कर रहे हैं. इस कॉलेज में 7 हज़ार बच्चे पढ़ते हैं. लेकिन, इन्हें पढ़ाने के लिए न तो पर्याप्त मात्रा में शिक्षक हैं ना छात्रों के स्वाध्याय के लिए किताबें. स्थिति यह है कि हर विभाग में बमुश्किल 1-2 शिक्षक हैं, जिनके भरोसे यह कॉलेज चल रहा है.

मुंह में काली पट्टी बांधकर धरना प्रदर्शन (फ़ोटो- शिवानी भंडारी)

कॉलेज के पुस्तकालय में 80 के दशक की किताबें हैं. राजनीतिक विज्ञान की किताबों में अभी तक सोवियत संघ का विघटन भी नहीं हुआ है न बर्लिन की दीवार गिरी है. ऐसे में इन पुस्तकों में उत्तराखंड का इतिहास और राजनीति का पाठ होना तो भूल ही जाइए. शिक्षक-पुस्तक आंदोलन ना सिर्फ यहां के मौजूदा छात्र बल्कि इसके पूर्व छात्र और उनके अभिभावकों का समर्थन प्राप्त है ताकि आने वाली पीढ़ी को शिक्षा के लिए पलायन न करना पड़े.

LSMPG कॉलेज का इतिहासः

1963 में जब यह कॉलेज बना था तो आगरा यूनिवर्सिटी का हिस्सा था, लेकिन 70 के दशक में पहाड़ी यूनिवर्सिटी की मांग उठी. इसके बाद 1973 में गढ़वाल और कुमाऊं के लिए यूनिवर्सिटी बनाई गई. LSMPC कुमाऊं यूनिवर्सिटी के अंदर आने वाला दूसरा बड़ा कॉलेज है. लेकिन इस कॉलेज के मौजूदा हालात पहाड़ों में शिक्षा के स्तर की असलियत को दर्शाता है.

पिथौरागढ़ के आंदोलन को दिल्ली में समर्थनः  

धरना प्रदर्शन में शामिल विपुल उपाध्याय कहते हैं, “मैं पिथौरागढ़ का रहना वाला हूं, लेकिन मैं दिल्ली के कॉलेज में पढ़ता हूं क्योंकि वहां के कॉलेजों में सुविधाओं का अभाव है. शिक्षक और पुस्तकों की समस्या का मुद्दा नया नहीं है. यह काफी पहले से है. मध्यम वर्ग के छात्र अच्छी शिक्षा प्राप्त नहीं पाते हैं. अच्छी किताबों और टीचरों की कमी रह जाती है. यह हमारे देश की बहुत बड़ी कमी है.”

(फ़ोटो- शिवानी भंडारी)

उन्होंने आगे कहा, “राज्य सरकार छात्रों की मांग जल्द से जल्द पूरा करे और कॉलेजों में शिक्षा संबंधी कमियों को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए.”

दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र आशीष ने न्यूज़सेन्ट्रल24×7 से बातचीत करते हुए कहा, “किताबों और टीचरों की कमी को लेकर जो आवाज़ पिथौरागढ़ में उठाई गई है ऐसी ही स्थिति दिल्ली यूनिवर्सिटी के कॉलेजों की भी है. पत्रकारिता के कोर्स की पुस्तकें बहुत कम और सीमित हैं. जहां अन्य कोर्सों की 100 किताबें लाइब्रेरी में होती हैं तो पत्रकारिता की सिर्फ 15 किताबें मौजूद हैं.” उन्होंने सरकार से पूछा, “सरकार पुरानी या कम किताबों के बल पर नया भारत बनाने का प्रयास कैसे कर सकती है?” उन्होंने आरोप लगाया कि आज की तारीख में शिक्षा पूरी तरह से व्यवसाय बन चुकी है.

धरने में शामिल हुए छात्र (फ़ोटो- शिवानी भंडारी)

छात्रों के प्रदर्शन के समर्थन में मयूर विहार से जंतर-मंतर पहुंची करूणा भट्ट ने कहा, “चुनाव के समय सभी मुद्दों को उठाया जाता है लेकिन शिक्षा की कमियों को छुपाया जाता है. हम समझते हैं कि दिल्ली-एनसीआर में रह रहे छात्रों के पास पढ़ने के लिए कई तरह के साधन हैं, लेकिन उत्तराखंड जैसे पहाड़ी इलाकों में पढ़ाई के लिए मौजूदा किताब और शिक्षकों की भारी कमी है. इसलिए उन बच्चों की आवाज़ को सरकार तक पहुंचाने के लिए हम यहां आए हैं.”

आदर्श नगर की रहने वाली आशा कहती हैं, “भाजपा सरकार का काम ही झूठे वादे करना है. आज जब भारत को आगे बढ़ाना है तो शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. छात्रों की किताब, शिक्षक और लाइब्रेरी संबंधी मांग बिल्कुल सही है. अगर किताबें ही नहीं होंगी तो बच्चे क्या और कैसे पढ़ेंगे. शिक्षा को पलायन का कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि स्कूली शिक्षा पूरी होते ही बच्चों को बड़े शहरों की ओर आना पड़ता है. हम खुद अच्छी शिक्षा से वंचित रह गए. लेकिन इतने सालों बाद भी कॉलेज में किताबों और शिक्षकों की कमी बेहद शर्मनाक है.”

प्रदर्शन में शामिल हुई करूणा भट्ट और आशा (फ़ोटो- शिवानी भंडारी)

किताबों और मासाब (शिक्षक) को लेकर सड़कों पर बैठे छात्र, सरकार को सुध नहीः

स्नेहल पंत ने आरोप लगाते हुए कहा, “सरकार छात्रों की मांग बिल्कुल नहीं सुन रही है. इस तरह का एक आंदोलन साल 2005 में भी हुआ था. लेकिन उस वक्त वह व्यापक स्तर तक नहीं पहुंच पाया था. लेकिन इस बार यह बात प्रखर हो चुकी है.”

उन्होंने कहा कि राजनीति में शिक्षा को लेकर कोई मुद्दा नहीं उठाया जाता है, जबकि शिक्षा सबका अधिकार है. नेताओं का काम है कि उनके राज्यों में ऐसे  मुद्दों को जल्द से जल्द सुलझाया जाए.

स्नेहल पंत (फ़ोटो- शिवानी भंडारी)

ग़ौरतलब है कि कॉलेज के छात्रों ने अपनी समस्याओं को लेकर 8 अक्टूबर 2018 को पिथौरागढ़ के ज़िला अधिकारी को ज्ञापन सौंपा था. ताकि उनकी बात मंत्री तक पहुंचाई जाए. एनडीटीवी की ख़बर के अनुसार लगभग 5 बार ज़िला अधिकारी को इस बाबत ज्ञापन सौंपा गया है, लेकिन किसी ज्ञापन का जवाब नहीं आया.

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