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असहमति के फैसले को रिकॉर्ड नहीं करता चुनाव आयोग, मीटिंग में जाकर क्या करें- चुनाव आयुक्त अशोक लवासा का झलका दर्द

अशोक लवासा ने प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ शिकायतों के फैसले पर असहमति दर्ज की थी.

लोकसभा चुनाव में चुनाव आयोग के निष्पक्षता पर उठ रहे सवालों के बीच अब इस संस्था के अंदर ही बगावती प्रवृति दिखने लगी है. चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने चुनाव आयोग की मीटिंग में शामिल होने से साफ़ इंकार कर दिया है. उनका आरोप है कि संस्था अल्पमत के फ़ैसले को रिकॉर्ड नहीं कर रहा है. इसलिए मीटिंग में जाने का कोई मतलब नहीं बनता.

एनडीटीवी की ख़बर के अनुसार अशोक लवासा ने कहा, “मीटिंग में जाने अब का कोई मतलब नहीं है. इसलिए मैं दूसरे कानूनी तरीकों पर विचार कर सकता हूं.”

दरअसल, चुनाव आयुक्त लवासा वो शख्स है जिन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के ख़िलाफ़ शिकायतों के फैसले पर असहमति दर्ज की थी. अशोक लवासा ने दावा करते हुए कहा था किक पीएम मोदी को विवादित बयानों पर क्लिन चिट दिए जाने को लेकर उनके फ़ैसले को रिकॉर्ड नहीं किया गया था.

बता दें कि चुनाव आयोग ने 6 मामलों में प्रधानमंत्री मोदी को पोल कोड उल्लंघन का दोषी न मानते हुए क्लिन चिट थामा दी थी. चुनाव आयोग की तीन सदस्यीय कमीशन में मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा और सुशील चंद्रा के साथ अशोक लवासा भी शामिल थे. नियम के अनुसार प्रत्येक सदस्यों के सहमति और असहमतियों को  दर्ज किया जाता है.

एनडीटीवी  की ख़बर के अनुसार अशोक लवासा ने बीते 4 मई को मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखा था. उन्होंने पत्र में कहा, “जब से मेरे अल्पमत को रिकॉर्ड नहीं किया गया है तब से कमीशन के विचार-विमर्श में मेरी भागीदारी का कोई मतलब नहीं है. मुझ पर कमीशन की मीटिंग से दूर रहने के लिए दबाव बनाया गया.”

उन्होंने पत्र में कहा कि वे इस मामले पर दूसरे कानूनी तरीकों पर विचार करेंगे. यह पत्र मिलने के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने अशोक लवासा के साथ मीटिंग बुलाई थी.

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