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चुनाव आयुक्त अशोक लवासा के विरोध के बाद PMO को मिली क्लीन चिट पर पुनर्विचार करेगा चुनाव आयोग

अशोक लवासा जानना चाहता थे कि क्या वास्तव में नीति आयोग ने गोंदिया, वर्धा और लातूर जिले के कलेक्टर को पत्र लिखा था और उसका इस्तेमाल प्रधानमंत्री के दौरे के लिए किया गया था.

चुनाव आयुक्त अशोक लवासा के विरोध के बाद आयोग ने आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन  मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और नीति आयोग को दी गई क्लीन चिट पर पुनर्विचार करने का फैसला किया है.

इंडियन एक्सप्रेस में रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट के मुताबिक यह पहला मौका है जब चुनाव आयोग का पैनल किसी मुद्दे पर पुनर्विचार कर रहा है. नीति आयोग द्वारा तथ्य और सफाई पेश किए जाने के पूर्व ही चुनाव आयोग ने यह फैसला सुना दिया था.

इस मामले की शुरुआत तब हुई जब प्रधानमंत्री कार्यालय ने नीति आयोग के माध्यम से राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से प्रधानमंत्री मोदी की सभा से जुड़ी जानकारी मांगी.

आदर्श आचार संहिता के अनुसार मंत्री अपने आधिकारिक दौरों और चुनावी दौरों को एक नहीं मान सकते और चुनाव कार्य में सरकारी साधनों और मशीनरी का इस्तेमाल भी नहीं कर सकते हैं.

पिछले सप्ताह चुनाव आयोग ने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की शिकायत को ख़ारिज कर दिया था. इस शिकायत में दोनों पार्टियों ने आरोप लगाया था कि नीति आयोग ने 8 अप्रैल को राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को एक ईमेल लिखा था जिसमें कहा गया था कि सभी राज्य अपने यहां के ऐतिहासिक धरोहरों, स्थानीय नायकों, सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व की चीज़ें प्रधानमंत्री कार्यालय को बताएं. इसमें लिखा गया था कि प्रधानमंत्री इन राज्यों का दौरा शीघ्र ही करने वाले हैं, इसलिए इसकी जानकारी जल्दी भेजी जाए.

बीते 12 मई को प्रेस कॉन्फ्रेंस में उप चुनाव आयुक्त संदीप सक्सेना ने पत्रकारों को बताया था कि चुनाव आयोग को पीएम के ख़िलाफ़ मिली कांग्रेस की शिकायत में कोई मेरिट नहीं दिखाई दी. आयोग ने कहा कि 7 अक्टूबर 2014 को जारी किए गए निर्देश के अनुसार प्रधानमंत्री के निजी दौरे को भी  आधिकारिक माना जा सकता है.

हालांकि प्रधानमंत्री मोदी को क्लीन चिट देने के बाद चुनाव आयोग में खुद असंतोष दिखने लगा. चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने कहा था कि नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत से सफाई मांगे बिना इस पर फैसला नहीं सुनाया जाए, लेकिन ऐसा नहीं किया गया.

रिपोर्ट के मुताबिक लवासा जानना चाहता थे कि क्या वास्तव में नीति आयोग ने गोंदिया, वर्धा और लातूर जिले के कलेक्टर को पत्र लिखा था और उसका इस्तेमाल प्रधानमंत्री के दौरे के लिए किया गया था.

हालांकि उनकी असहमति पर विचार किए बग़ैर हड़बड़ी में मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुनील अरोड़ा और चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने 2014 के नियम का हवाला देते हुए जल्दबाजी में ख़ारिज कर दिया.

इंडियन एक्सप्रेस  की ख़बर के मुताबिक लवासा ने इस पर सवाल उठाया कि तथ्यों की जांच किए बगैर ही यह फैसला कैसे लिया गया. लवासा की आपत्ति के बाद चुनाव आयोग  ने बीते गुरुवार को अमिताभ कांत को स्पष्टीकरण देने का एक पत्र लिखा, लेकिन अमिताभ कांत को जवाब देने के लिए कोई समय सीमा नहीं दी गई है.

अगर प्रधानमंत्री मोदी पर लगे इन आरोपों को सही पाया जाता है तो इसका मतलब है कि प्रधानमंत्री ने आदर्श आचार संहिता के साथ-साथ 1951 के लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम का भी उल्लंघन किया है. इसी तरह के एक मामले में इलाहाबाद हाइकोर्ट ने जून 1975 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द कर दिया था. इंदिरा गांधी ने अपने चुनाव अभियान के लिए सरकारी कर्मचारी का इस्तेमाल किया था.

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