कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

चुनावी बांड: फंस गई भाजपा? उच्चतम न्यायालय ने सभी राजनीतिक दलों को दानकर्ताओं का विवरण देने का आदेश दिया

अदालत में मोदी सरकार बोली: मतदाता नहीं जानना चाहता के हमारा पैसा कहां से आया.

केंद्र की  मोदी सरकार को बड़ा झटका लगा है. सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सभी राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग को चुनावी बांड की रसीदें देने का निर्देश दिया.

शीर्ष अदालत ने सभी राजनीतिक दलों को निर्देश दिया कि वे चुनाव पैनल को 30 मई तक दान राशि एवं दानकर्ता बैंक खाते का ब्यौरा सौंपे. मोदी सरकार ने अदालत में तर्क दिया था कि राजनीतिक दलों के दानदाताओं की पहचान का खुलासा नहीं किया जाना चाहिए.

लाइव लॉ के अनुसार अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा था, “यह जानना मतदाताओं की चिंता नहीं है कि पैसा कहां से आता है.”

यह निर्देश प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने दिया.

यह आदेश एक स्वयं सेवी संगठन की याचिका पर दिया गया. इसमें इस योजना की वैधता को चुनौती देते हुए कहा गया था कि या तो चुनावी बांड्स को जारी करना स्थगित हो या चुनावी प्रक्रिया में शुचिता बनाए रखने के लिए दानकर्ताओं के नाम उजागर किए जाएं.

सरकार ने दो जनवरी, 2018 को चुनावी बांड योजना को अधिसूचित किया था.

योजना के प्रावधानों के अनुसार, चुनावी बांड्स को ऐसा कोई व्यक्ति खरीद सकता है जो भारत का नागरिक है या कंपनी जो भारत में स्थापित है.

एक व्यक्ति, व्यक्तिगत तौर पर, एकल या अन्यों के साथ संयुक्त तौर पर चुनावी बांड्स खरीद सकता है.

जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 29क के तहत केवल ऐसे पंजीकृत राजनीतिक दल जिन्होंने गत चुनावों में कम से कम एक प्रतिशत तक मत हासिल किए हों, वे ही चुनावी बांड्स प्राप्त करने के अहर्ता धारण करेंगे.

इन बांड्स को योग्य राजनीतिक दल एक प्राधिकृत बैक के बैंक खाते के माध्यम से नकदी में बदल सकेंगे.

सभी राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को प्राप्त कुल धन का 90 प्रतिशत से ज्यादा हासिल करके भाजपा ने इस योजना का सबसे अधिक लाभ उठाया है. नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों ने इस योजना का विरोध  ‘वैध भ्रष्टाचार’ के तौर पर किया है.

पीटीआई इनपुट्स के साथ

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