कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

जो आज सत्ता में है, कल बाहर होंगे- यही लोकतंत्र का तकाज़ा है

जनता के मताधिकार का सम्मान होना चाहिए, उसी ने मोदी को जिताया और फिर विधानसभा में भारी मतों से हराया. यही लोकतंत्र की खूबसूरती है.

ये विशेष रूप से उन लोगों के लिए लिख रहा हूं जो एग्जिट पोल के परिणाम देखकर काफी विचलित हैं. सबसे पहले चुनाव लड़ने वाले सभी दलों के प्रत्याशियों को शुभकामना और वोट देकर लोकतंत्र को मजबूत करने वाली जनता को धन्यवाद.

सुबह से कई लोगों फ़ोन आते रहे जिनमें से अधिकांश महागठबंधन के समर्थक या कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता-कार्यकर्ता के थे. दिल्ली में पार्टी के नेताओं के साथ समीक्षा बैठक की वजह से लोगों से बात नहीं हो पाई. मगर अधिकांश लोग एग्जिट पोल के परिणाम को देखकर कौतुहल में थे.

सबसे पहली बात यह की जरुरी नहीं की एग्जिट पोल पूरी तरह से सही हो. अगर वह सही भी होते हैं तो भी आप अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता बनाये रखिए. अगर आपका किसी दल या नेता के साथ जुड़ाव है, तो यह सम्मान की बात है और यह आपकी राजनीतिक और वैचारिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है.

दूसरी बात ये की जनता के मताधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए. इसी जनता ने लालू को जिताया भी है और हराया भी. उसी ने मोदी को जिताया और फिर विधानसभा में भारी मतों से हराया. लोकतंत्र की यही खूबसूरती है. हमारी और आपकी मतभिन्नता का ये मतलब कतई नहीं कि दो अलग अलग राजनीतिक विचारधारा वाले लोग आपस में तार्किक बात नहीं कर सकते या फिर भविष्य में आपसी सहमति नहीं बना सकते जैसे उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा के नेताओं – कार्यकर्ताओं ने किया है.

तीसरी बात ये की लोकतंत्र में यह जरुरी नहीं की सभी लोग सिर्फ जीतने वाली पार्टी के ही पक्षधर हो. अगर कोई चुनाव जीत गया या भाजपा की केंद्र में सरकार बन भी गयी तो आप अपनी राजनीतिक – सामाजिक भूमिका से गौण नहीं हो जायेंगे. सरकार हमेशा देश के सभी नागरिकों के लिए होती है और उसका दायित्व सभी के लिए एक सामान होता है. बावजूद इसके कि भाजपा की पिछली सरकार इस मामले में विफल रही, हमार प्रयास होना चाहिए की हम अपनी जनतांत्रिक भूमिका को न भूले चाहे सरकार किसी की भी हो.

चौथी बात ये की अगर भाजपा की केंद्र में फिर से वापसी होती है तो भी आप विपक्ष की भूमिका और सरकार से सवाल करने की मंशा को दरकिनार नहीं कर सकते हैं. इसलिए इस दलील को नकारिए की अगर कोई चुनाव जीत गया है तो वह हर हाल में सही और सर्वज्ञानी है और उससे कोई सवाल नहीं कर सकता और उसके ऊपर कोई ऊंगली नहीं उठा सकता.

अगर केंद्र में भाजपा की सरकार बन भी जाती है तो इस बात का पूरा विश्वास है कि इस बार विपक्ष की भूमिका न सिर्फ राजनीतिक दल होंगे मगर वह लोग भी होंगे जो अपनी सीमित समय, संसाधन और राजनीतिक चाहत के भरोसे अपनी राजनीतिक दायित्व को निभाते रहते हैं.

अगर बिहार की बात करें, चुनाव के परिणाम कुछ भी हो, महागठबंधन के नेताओं के पास मौका है गहराई से अपने द्वारा लिए गए राजनीतिक निर्णयों पर विचार और अवलोकन करने का. चाहे सवर्णों के 10% आरक्षण की अस्वीकार्यता की बात हो, टिकट बंटवारें में नए लोगों को मौका दिए जाने से परहेज की बात हो, या पारिवारिक पृष्टभूमि या पैसे के आधार पर टिकट वितरण की बात हो.

आप सभी कार्यकर्ताओं एवं समर्थकों से भी गुज़ारिश है कि राजद मतलब यादव, कांग्रेस मतलब सवर्ण, रालोसपा मतलब कुशवाहा, या वी.आई.पी मतलब मलाह और हर परिस्तिथि में मुस्लिम मतदाताओं को महागठबंधन पूरक मान कर चलने वाले बाइनरी से बचें. इस तरह की दलील ने बिहार में भाजपा के खिलाफत वाली संभावनाओं कि ज़मीनी अस्तर पर मजबूत होने से रोका है. और ये चलता रहा तो भविष्य में इसका हश्र और भी बुरा होगा.

अगर आप राजद में हैं तो यादव के अलावा दूसरे समुदाय के लोगों को भी जोड़ने की बात सोचिए और उसी तरह अगर आप कांग्रेस में है तो पिछड़े-अति पिछड़े वर्ग के युवाओं को विशेष तरजीह देने की बात की सोचिए.

जो आज सत्ता में है, कल बाहर होंगे. यही लोकतंत्र का तकाज़ा है. खुश रहिये, आबाद रहिए.

(शाश्वत गौतम अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (डाटा एनालिटिक्स विभाग) में राष्ट्रीय समन्वयक के पद पर नियुक्त है.)

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