कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

गांधी और नेहरू का देश अपनी आखिरी सांसें ले रहा है

ना गाय का गोश्त, ना लव जिहाद-गुरुग्राम की हिंसा अब तक की सबसे ज़्यादा भयावह है. यह हमारी संवेदना का आखिरी इम्तिहान है.

गुरुग्राम में मुसलमानों के विरूद्ध हुई हिंसा पर सत्ता के गलियारों में एक अजीब सी चुप्पी है. यह चुप्पी दिल को तकलीफ़ देती है. इस हिंसा की तरह ही यह खामोशी भी आम हो चली है. उस वीडियो में अल्लाह-अल्लाह की वो चीखें, हम क्यों नही सुन पा रहे हैं? यह हमला अब तक के हमलों में सबसे ज्यादा भयानक है. यहां, ना मार खा रहे युवकों के फ्रिज में गाय का गोश्त था और ना ही यह कोई तथाकथित लव जिहाद का केस था. यहां, दिन दहाड़े किसी घर में एक भीड़ हथियार लेकर घुस जाती है, और हत्या करने की कोशिश करती है. इस बार इस हैवानियत को छिपाने के लिए उसे किसी मनगढंत वजह की भी जरूरत नहीं है. बेतुके कारण देने से वैसे भी कोई फायदा नहीं होता है!

इससे हिंदुस्तान की सेक्युलर रुह क्यों नही कांप रही है? क्या वो भी मर चुकी है? अगर हिंदुस्तान को आज अपना असली फख़्र करने लायक इतिहास याद होता, तो न्यूजीलैंड में हुए मुस्लिम विरोधी हमले के बाद वहाँ से जो सराहनीय प्रतिक्रिया सामने आई है, उस पर हमें हैरानी, घृणा और अफ़सोस नही होता. यदि न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डन 21वीं सदी के लिए अजूबा हैं, तो सोचिए नेहरू-गांधी, हिटलर और मुसोलिनी वाली आक्रमक राष्ट्रवाद से भरी 20वीं सदी के लिए क्या रहे होंगे?

1947 में देश के बंटवारे के बाद हिंदुस्तान अचानक मुसलमानों के रहने के लिए हर तरह से नासाज़ हो गया था. ठीक जैसे पाकिस्तान हिंदुओं के लिए हुआ था. पाकिस्तान के कई बुद्धिजीवी इस पर लिखते थे कि हिंदुस्तान के मुसलमान कुछ दशकों के अंदर-अंदर मार दिए जाएंगे. उस समय किसी को हिंदुस्तान के इस दावे पर भरोसा नहीं था कि एक ऐसा देश भी बन सकता है जहां हर किसी को बराबरी का अधिकार हो और जहां धर्म, देश प्रेम का मापदंड न हो. तब यह राजनीति न्यूजीलैंड को भी अजीब ही लगी होगी. काफ़ी हद तक उस वक्त हिंदुस्तान के नायकों ने विश्व के पूर्वाग्रह को गलत साबित किया था जिसके कारण आज भी हम लोग कह सकते हैं कि हिंदुस्तान कभी सबका हुआ करता था.

1947 और 1948 में मुसलमानों के विरुद्ध हिंदुस्तान में और हिंदुओं के विरुद्ध पाकिस्तान में जो हिंसा हुई, वो द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद हुई शायद सबसे बड़ी हिंसा थी. एक बूढ़ा हिन्दू फक़ीर तब ढाल बनकर हिंदुस्तान के मुसलमानों के लिए खड़ा हो गया था. यहां ‘हिन्दू’ कहना ज़रूरी है, क्योंकि आज स्वयं को हिंदू दिखाने के लिए नेता खुद को मुस्लिम विरोधी या मुसलमानों की कम फ़िक्र करने वाली छवि प्रस्तुत करते हैं. भारत का मौजूदा विपक्ष फिलहाल दूसरी श्रेणी में आता है. यह एक कायर विपक्ष है और गांधी-नेहरू की राजनीति से इनका कोई लेना देना नहीं है.

80 वर्ष के गांधी ने आज़ादी का जश्न मनाने के बजाय अपने शरीर को हथियार की तरह दंगे रोकने के लिए इस्तेमाल किया था. पंडित नेहरू के बारे में भी ऐसा ही एक किस्सा सुनने में आता है. 1948 की जनवरी के दिल्ली में चांदनी चौक में एक मुसलमान दर्जी पर हो रहे हमले को रोकने के लिए, नेहरू खुद दंगाइयों से भिड़ गए थे. वहीं 1984, 1992 और 2002 में अल्पसंख्यकों पर हुई हिंसा पर हमारे नेताओं की प्रतिक्रिया बिल्कुल विपरीत थी. वो हिंसा को आक्रोश की प्रतिक्रिया बताते हैं. पत्रकार प्रतीक सिन्हा ठीक कहते हैं कि ‘अगर हिंदुस्तान में अच्छे हथियार कानून नहीं होते तो न्यूज़ीलैंड जैसा हमला यहाँ बार-बार होता.’ ऐसे हमलो को शौर्य दिवस के रूप में मनाया जाता.

एक महीने बाद 2019 का चुनाव है. हर दल इस होड़ में लगा हुआ है कि उसका वोटर उससे नाराज़ ना हो जाए. शायद सत्ता दल यह जानता हैं कि मुसलमान उसको वोट नहीं देंगे. देश के अन्य दल जो फिलहाल विपक्ष में है, यह मान बैठे हैं कि मुसलमानों के पास उनको वोट देने के अलावा कोई चारा नहीं है, इसलिए मुसलमानों के खिलाफ़ कुछ भी हो, ये चुप रहें या बोलें, इन्हें वोट देना उनकी मजबूरी है.

1948 के दिल्ली का माहौल शायद ऐसा ही रहा होगा. भारत के मुसलमानों को उन नेताओं ने यतीम महसूस नही होने दिया था. वो गांधी और नेहरू मर चुके हैं. उनकी सोच का हिंदुस्तान भी रोज़ मर रहा है. वो शायद अपनी आखिरी सांसें ले रहा है. ख़ैर अब उनकी वो बातें याद करना मज़ाक का पात्र है, लेकिन ऐसे नेताओं का अभाव, भारत की आत्मा के लिए तकलीफ़ देता है. कब तक भारत का विपक्ष ऐसी घटनाओं पर केवल ट्वीट में आक्रोश जताएगा? क्या हिंदुस्तान में आज भी कोई ऐसा सत्याग्रही नेता है, जो 1948 के दिल्ली डिक्लेरेशन की याद सत्ता और जनता को, सड़कों पर आकर दिला सके?

(मोहम्मद अलीशान जाफ़री दिल्ली स्कूल ऑफ जर्नलिज़्म के छात्र हैं और फिलहाल कारवां-ए-मोहब्बत के साथ इंटर्न के तौर पर जुड़े हैं.)

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