कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

गंगा सफ़ाई के नाम पर मोदी सरकार ने फूंक दिए 3800 करोड़, लेकिन साफ़ नहीं हुई गंगा मैया

मोदी सरकार ने 2014 से 2018 तक गंगा सफ़ाई के नाम पर कुल 5,523 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं, जिसमें से लगभग 3,867 करोड़ रुपए ख़र्च किए जा चुके हैं।

मोदी सरकार ने साल 2014 से 2018 तक गंगा सफ़ाई के नाम पर कुल 5,523 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं, जिसमें से लगभग 3,867 करोड़ रुपए ख़र्च किए जा चुके हैं। इन सबके बावजूद भी 2013 के मुकाबले गंगा नदी कई जगहों पर और ज़्यादा दूषित हो चुकी है। एक आरटीआई में इसका खुलासा किया गया है।

गौरतलब है कि बीते 13 अक्टूबर को पर्यावरणविद् और गंगा की सफाई के लिए पिछले कई वर्षों से काम कर रहे प्रोफ़ेसर जीडी अग्रवाल की112 दिनों के आमरण अनशन के बाद मृत्यु हो गई। यह अनशन उन्होंने गंगा की सफाई के लिए सरकार का ध्यान खींचने के लिए किया था।

ज्ञात हो कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा गंगा की सफाई को लेकर चुनावों के दौरान किए वादे को याद दिलाने के लिए अग्रवाल ने 3 बार प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखा। अपने आमरण अनशन के बारे में सूचना देते हुए भी उन्होंने मोदी को पत्र लिखा था, जिसका जवाब नहीं दिया गया।

अब समझने वाली बात यह है कि गंगा की सफाई का वादा कर जनता का दिल और वोट जीत कर सत्ता में आई मोदी सरकार ने इस तरफ़ कितना ध्यान दिया। द वायर की एक रिपोर्ट के अनुसार एक सूचना का अधिकार के तहत मिली जानकारी में यह पता चला कि गंगा की हालत 2013 के मुकाबले कई ज़्यादा ख़राब हो चली है, जबकि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद अब तक गंगा की सफाई के लिए आवंटित 5,523 करोड़ रुपए में से 3,867 करोड़ रुपए ख़र्च किए गए हैं।

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा दी गई जानकारी में बताया गया है कि 2017 में गंगा नदी में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) की मात्रा बहुत ज़्यादा थी और पानी में डिज़ॉल्व्ड ऑक्सीजन (डीओ) की मात्रा भी अधिकतर जगहों पर कम होती जा रही है।

ज्ञात हो कि बीओडी ऑक्सीजन की वह मात्रा है जो पानी में रहने वाले जीवों को और ऑर्गनिक पदार्थों को नष्ट करता है। बीओडी के बढ़ने से ऑक्सीजन ख़त्म होगा जिसका पानी में रहने वाले जीवों पर दुष्प्रभाव पड़ेगा। वहीं डीओ पानी में घुली हुई ऑक्सीजन को कहा जाता है। डीओ की मात्रा पानी में प्रदूषण बढ़ जाने से कम हो जाती है।

केंद्रीय प्रदूषण नियत्रण बोर्ड गंगोत्री, जो कि गंगा नदी का उद्गम स्थल है, से लेकर पश्चिम बंगाल तक गंगा के पानी की गुणवत्ता की जांच करता है।

गौरतलब है कि उत्तराखंड के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल हरिद्वार में गंगा की हालत बहुत ज़्यादा ख़राब है। यहां के पानी का अधिकतम बीओडी लेवल 6।6 मिलीग्राम/लीटर है, जो कि नहाने के लिए भी सही नहीं है। इसी तरह के हालात बनारस, इलाहाबाद, कन्नौज, कानपुर, पटना, राजमहल, दक्षिणेश्वर, हावड़ा, दरभंगा इत्यादि जगहों के हैं।

मोदी सरकार द्वारा गंगा नदी के संरक्षण के लिए मई 2015 में नमामी गंगे नामक कार्यक्रम को मंज़ूरी दी गई थी। इसके तहत गंगा नदी की सफाई के लिए कुछ दिशानिर्देश बनाए गए थे, जैसे कि नगरों से निकलने वाले सीवेज का ट्रीटमेंट, औद्योगिक प्रदूषण का उपचार, नदी के सतह की सफ़ाई, ग्रामीण स्वच्छता, रिवरफ्रंट विकास, घाटों और श्मशान घाट का निर्माण, पेड़ लगाना और जैव विविधता संरक्षण आदि।

आरटीआई की सूचना के मुताबिक़ अब तक इस कार्यक्रम के तहत 22,238 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से कुल 221 परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई है, जिसमें से 17,485 करोड़ रुपये की लागत से 105 परियोजनाओं को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के लिए मंज़ूरी दी गई थी। लेकिन, इनमें से अभी तक सिर्फ 26 परियोजनाएं ही पूरी हो पाई हैं।

बाकी के 67 परियोजनाओं को रिवरफ्रंट बनाने, घाट बनाने और श्मशान घाट का निर्माण करने तथा नदी के सतह की सफाई के लिए आवंटित किया गया था। इसमें से 24 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं।

मोदी सरकार द्वारा शुरू की गई गंगा परियोजानाएं सवालों के घेरे में हैं। दिवंगत पर्यावरणविद् जीडी अग्रवाल मोदी को लिखे अपने पत्रों में ये सवाल उठाते रहे थे कि सरकार द्वारा इन चार सालों में गंगा सफाई के लिए जिन परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई है वो कॉरपोरेट सेक्टर और व्यापारिक घरानों के फायदे के लिए हैं, गंगा को अविरल बनाने के लिए नहीं। लेकिन, इन पत्रों को साफ़ तौर पर अनदेखा कर दिया गया।

वहीं नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने भी गंगा सफाई के लिए शुरू की गई परियोजनाओं पर सवाल उठाया है।

कैग ने 2017 की रिपोर्ट में कहा था, ‘भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के साथ समझौता करने के साढ़े छह साल बाद भी स्वच्छ गंगा के लिए राष्ट्रीय मिशन (एनएमसीजी) की लंबी अवधि वाली कार्य योजनाओं को पूरा नहीं किया जा सका है। राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन अथॉरिटी का गठन हुए आठ साल से अधिक का समय बीत चुका है। लेकिन, अभी तक एनएमसीजी के पास नदी बेसिन प्रबंधन योजना नहीं है।’

गंगा नदी के पानी की गुणवत्ता का आंकलन बीओडी और डीओ लेवल के अलावा उसमें मौजूद फीकल कॉलीफॉर्म और टोटल कॉलीफॉर्म बैक्टीरिया की संख्या, पानी का पीएच अंक और उसके कंडक्टिविटी के आधार पर भी किया जाता है।

सीपीसीबी के मुताबिक पीने वाले पानी में टोटल कॉलीफॉर्म वैक्टीरिया की संख्या प्रति 100 मिलीलीटर पानी में 50 एमपीएन (सबसे संभावित संख्या) या इससे कम और नहाने वाले पानी में 500 एमपीएन या इससे कम होनी चाहिए। लेकिन, हरिद्वार में यह संख्या 1600 है, उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में 48,000, वाराणसी में 70,000, कानपुर में 1,30,000, बिहार के बक्सर में 1,60,00,000, पटना में 1,60,00,000, पश्चिम बंगाल के हावड़ा में 2,40,000 है।

चूँकि गंगा जिन क्षेत्रों से बहकर निकलती है, उनमें से ज़्यादातर जगहों पर उसके पानी से खेती की जाती है। इस मामले में भी गंगा नदी का बढ़ता हुआ प्रदूषण काफी परेशानी की बात साबित हो रही है। सीपीसीबी के मुताबिक अगर किसी पानी का पीएच 6 से 8।5 के बीच में होता है तो वह सिंचाई के लिए सही है। लेकिन, साल 2017 की रिपोर्ट यह बताती है कि कई जगहों पर गंगा के पानी का पीएच 8।5 से ऊपर जा रहा है, जिसकी वजह से सिंचाई के लिए भी ख़तरा पैदा हो सकता है।

गंगा पांच राज्यों से होकर गुज़रती है। इसलिए पांचों राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) द्वारा हर महीने तय मानकों पर गंगा के पानी की गुणवत्ता की जांच जाती है और उसे सीपीसीबी के पास भेजा जाता है। हर महीने के आंकड़ों का औसत मिलाकर सीपीसीबी आख़िरी में एक रिपोर्ट जारी करता है। अगर महीना-वार गंगा नदी के पानी की गुणवत्ता देखी जाए तो इसका हाल और भी डरावना है।साल के कुछ महीनों में गंगा का पानी बहुत ही ज़्यादा दूषित रहता है।

इस रिपोर्ट से यह बहुत साफ़ है कि गंगा नदी का हाल दिन-ब-दिन बदतर होता जा रहा है और इसकी सफाई के लिए देश के एक नागरिक ने अपनी जान गँवा दी और न जाने कितने ही लोगों की जान गंगा के दूषित पानी की वजह से ख़तरे में है। लेकिन, फिर भी अब तक इसको लेकर मोदी सरकार के रवैये से ऐसा लग रहा है कि गंगा सफाई को लेकर उनका वादा एक चुनावी जुमला मात्र था।

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