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दिल्ली उच्च न्यायलय ने नवलखा की गिरफ़्तारी के मामले में किया महाराष्ट्र पुलिस से सवाल, कहा – हिरासत का एक-एक मिनट चिंता का विषय

न्यायमूर्ति एस मुरलीधर और न्यायमूर्ति विनोद गोयल की पीठ ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि कैसे मजिस्ट्रेट अदालत ने अनुदित दस्तावेजों के बगैर ही ट्रांजिट रिमांड आदेश जारी करने के लिये विवेक का इस्तेमाल किया।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने नागरिक अधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा की गिरफ्तारी के महाराष्ट्र पुलिस के फैसले और उन्हें पुणे की एक अदालत में पेश करने के लिये ले जाने को लेकर दिये गए ट्रांजिट रिमांड आदेश की कानूनी वैधता के बारे में आज पूछा।

हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने निर्देश दिया कि नवलखा और चार अन्य कार्यकर्ताओं को छह सितंबर तक नजरबंद रखा जाए। इसके बाद, उच्च न्यायालय ने कहा कि वह कल शीर्ष न्यायालय के आदेश को देखने के बाद ही कोई निर्देश देगा।

उच्च न्यायालय ने कहा कि किसी व्यक्ति को हिरासत में एक – एक पल रखना चिंता का विषय है। अदालत ने गैरकानूनी गतिविधियों के आरोप में गिरफ्तार किए गए नवलखा को मराठी से अनुदित सारे दस्तावेज मुहैया नहीं करने को लेकर महाराष्ट्र पुलिस से सवाल किया।

अदालत ने कहा कि वह नवलखा को गिरफ्तार करने की राज्य पुलिस की कार्रवाई और यहां एक मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा जारी ट्रांजिट रिमांड आदेश की वैधता की भी पड़ताल करेगी।

हालांकि, कार्यवाही ने उस वक्त एक नया मोड़ ले लिया, जब बीच में ही महाराष्ट्र पुलिस के वकील ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने नवलखा सहित सभी पांच लोगों की ट्रांजिट रिमांड आदेश पर स्थगन लगा दिया है। साथ ही, यह निर्देश दिया है कि उन सभी को छह सितंबर तक नजरबंद रखा जाए।

बहरहाल, उच्च न्यायालय ने मामले को कल के लिए मुल्तवी करते हुए कहा कि वह उच्चतम न्यायालय के आदेश का अध्ययन करने के बाद ही कोई निर्देश जारी करेगा।

गौरतलब है कि महाराष्ट्र पुलिस नवलखा को गिरफ्तार करना चाहती थी और उन्हें पिछले साल 31 दिसंबर को आयोजित ‘एल्गार परिषद’ कार्यक्रम को लेकर दर्ज प्राथमिकी के सिलसिले में पुणे ले जाना चाहती थी। उस कार्यक्रम के बाद कोरेगांव-भीमा गांव में हिंसा हुई थी।

न्यायमूर्ति एस मुरलीधर और न्यायमूर्ति विनोद गोयल की पीठ ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि कैसे मजिस्ट्रेट अदालत ने अनुदित दस्तावेजों के बगैर ही ट्रांजिट रिमांड आदेश जारी करने के लिये विवेक का इस्तेमाल किया।

अदालत ने महाराष्ट्र पुलिस से पूछा, ‘‘क्यों गिरफ्तारी के आधार बताने वाले दस्तावेज को मराठी से अनुदित नहीं कराया गया और नवलखा को नहीं दिया गया।’’

अदालत ने जानना चाहा कि कब अदालत और नवलखा को सारे दस्तावेज प्रदान किये जाएंगे।

अदालत ने कहा कि मामला व्यक्ति की स्वतंत्रता के सवाल से संबंधित है। उसने कहा कि उसे भी सभी दस्तावेजों की अनुदित प्रतियां नहीं प्रदान की गई हैं।

पीठ ने पूछा कि क्या यह अनिवार्य है कि महाराष्ट्र में हर आधिकारिक या कानूनी दस्तावेज मराठी में हो।

महाराष्ट्र पुलिस ने पीठ से कहा कि वह नवलखा के वकीलों को सारे अनुदित दस्तावेज मुहैया कराएगी।

इससे पहले दिन में अतिरिक्त सॉलीसीटर जनरल अमन लेखी ने अदालत को सूचित किया कि दस्तावेजों की अनुदित प्रतियां तैयार नहीं हैं।

अदालत ने कल निर्देश दिया था कि उसके द्वारा मामले की सुनवाई किये जाने से पहले नवलखा को दिल्ली से बाहर न ले जाया जाए क्योंकि उनके खिलाफ आरोप, दस्तावेजों के मराठी में होने की वजह से स्पष्ट नहीं हैं।

अदालत ने कहा था कि फिलहाल नवलखा को दिल्ली पुलिस की निगरानी में उनके आवास में ही रखा जाए और इस दौरान उन्हें सिर्फ अपने वकीलों से मिलने और बात करने की अनुमति होगी।

कई शहरों में की गई छापेमारी के बाद नवलखा को कल गिरफ्तार किया गया था। उसके बाद साकेत जिला अदालत से उन्हें ट्रांजिट रिमांड पर पुणे ले जाने की अनुमति ली गयी।

हालांकि, उच्च न्यायालय ने साकेत की अदालत के आदेश पर रोक लगा दी थी। नवलखा को कल गिरफ्तार किया गया था।

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