कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

मोदीराज में देश में बढ़ी भुखमरी, 48 अंक गिरकर विश्व भुखमरी सूचकांक में भारत 103वे स्थान पर

यूपीए के कार्यकाल के दौरान, 2014 में भारत इस सूचकांक में 55वे स्थान पर था।

ठीक एक साल पहले झारखण्ड के सिमडेगा ज़िले में 11 वर्षीय संतोषी की भूख से हुई मौत देश भर में बड़ी ख़बर बनी थीI आधार कार्ड से राशनकार्ड नहीं जुड़ा होने की वजह से संतोषी के परिवार को अनाज नहीं दिया गया था, जिसके कारण भुखमरी से उसकी मौत हो गई थी।

तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में भूख के कारण होने वाली मौत की बढ़ती तादाद देश के मुंह पर किसी तमाचे से कम नहीं है।
सोचने वाली बात यह है कि भारत का विकास क्या सिर्फ़ अरबपतियों के लिए हो रहा है? भुखमरी झेलते लोगों की ज़िम्मेदारी किसकी है?

हाल ही में जारी हुए विश्व भूख सूचकांक 2018 के नतीजे शर्मिंदा करने वाले हैं। मीडिया विजिल की एक ख़बर के मुताबिक़ भारत तीन पायदान गिरकर 103 वें स्थान पर पहुँच गया जबकि 2017 में भारत की रैंकिंग 100वीं थी।

2014 के चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था, “आपने कांग्रेस को साठ साल दिया है, मुझे बस साठ महीने दे दीजिए।” लेकिन जब 2014 में उन्होंने कमान संभाला था तब ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत की रैंकिंग 55वीं थी जो साढ़े चार सालों के उनके शासनकाल में इस इंडेक्स में 48 अंक नीचे आ गिरी है।

119 देशों की सूची में भारत का 103वाँ स्थान कथित मोदी विकास की असलियत बयान कर रहा है। सूची में भारत और अफ़्रीकी देश नाइजीरिया, दोनों 103वें पायदान पर हैं।

ग़ौरतलब है कि रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में 21 फ़ीसदी बच्चे (पाँच साल से कम उम्र का हर पाँचवाँ बच्चा), कम वज़न और कुपोषण का शिकार है। भुखमरी के मामले में भारत की स्थिति श्रीलंका, नेपाल और बांग्लादेश से भी ख़राब बताई गई है। पड़ोसियों में सिर्फ़ पाकिस्तान (106) और अफ़गानिस्तान (111) की हालत ही भारत से ख़राब है। भूटान इस लिस्ट में शामिल नहीं है।

2017 में जब यह रिपोर्ट आई थी तब भी सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री के खोखले विकास के दावे पर तमाम सवाल उठाए गए थे। तब भारत सौंवे पायदान पर था।

ग़ौर करने की बात यह है कि इस तरह लगातार रैंकिंग में नीचे जाने का मतलब है कि अब हालात बद से बद्तर हो चुके हैं।

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