कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

दिल्ली के प्रदूषण के लिए किसानों को दोष देना बेवकूफी है!

दशहरे से लेकर दीवाली तक खूब आतिशबाज़ी की जाएगी। इंडिया कोई मैच जीत जाए तो आतिशबाज़ी, किसी की शादी हो तो आतिशबाज़ी, कोई पार्टी चुनाव जीत जाए तो आतिशबाज़ी। ये शहरी लोग किसी भी मौके पर आतिशबाज़ी करने से नहीं चूकते। ऐसे में किसी की अय्याशी से होने वाले प्रदूषण को तो सब नकार देते हैं, लेकिन, किसानों को घेरने लगते हैं।

“दिल्लीवालों फेफड़े थाम कर बैठ जाओ, नाक भींचकर बैठकर जाओ, पंजाब-हरियाणा के किसान भेज रहे हैं जहरीला धुंआ” इस तरह की हेडलाइंस ने दशहरे से एक सप्ताह पहले ही दिल्ली, एनसीआर, पश्चिमी उत्तरप्रदेश, हरियाणा और पंजाब के अख़बारों में जगह बना ली थी। न कोई ग्राउंड रिपोर्ट, न किसी भरोसेमंद रिपोर्टर का नाम, न ही पर्यावरण पर काम करने वाले किसी विभाग की रिपोर्टों का जिक्र। दिल्ली में बैठे पत्रकारों और शहरी पर्यावरणविदों की मनगढ़ंत कहानियों में हरियाणा-पंजाब के किसानों को बदनाम करने की साज़िश साफ़ नजर आ रही थी।

अभी किसानों ने पराली में आग नहीं लगाई है

हरियाणा और पंजाब में धान की ज्यादातर बासमती और उससे जुड़ी हुई किस्में बिजी जाती हैं, जिनकी कटाई 20 अक्टूबर से शुरू होकर नवंबर के पहले सप्ताह तक चलती है। हालांकि 1509 किस्म के धान की कटाई हो चुकी है, जिसकी खेती बहुत कम मात्रा में होती है। कट चुके धान के बचे हुए अवशेषों को भी अभी आग के हवाले नहीं किया गया है, क्योंकि उनके साथ बासमती से जुड़ी किस्मों के धान की फसलें खड़ी हुई हैं। अगर आग लगाई जाएगी तो कटने की बाट जोह रही खड़ी फसल भी इसकी चपेट में आ सकती है।

हर रोज छपने वाली पराली जलने की ख़बरों से परेशान किसान नेता देव लोहान ने न्यूज़सेंट्रल24×7 को बताया, “मैं दशहरे से एक दिन पहले गुड़गांव गया हुआ था। वहां मुझे मेरा एक शहरी साथी पराली जलाने से हो रहे प्रदूषण की खबर अख़बार में दिखाकर ताने मार रहा था। वो बार-बार कह रहा था कि किसानों की वज़ह से दिल्ली में प्रदूषण बढ़ गया है। मुझे उसकी बातें सुनकर और वह ख़बर पढ़कर खूब हंसी आ रही थी, क्योंकि हमने तो अभी फसलों को काटना शुरू भी नहीं किया है और ये धुंआ पहले ही शहर वालों को नज़र आने लगा है। पूरे साल इन्हें अपनी गाड़ियों का धुंआ नज़र नहीं आता। इन्हें अपनी फैक्टरियों का धुंआ नज़र नहीं आता। नज़र आता है तो बस किसानों के पराली का धुंआ। पूरा साल सिर्फ़ किसानों को बदनाम करने के अलावा इन लोगों के पास कोई दूसरा काम ही नहीं होता।”

पराली नहीं फांस जलाए जाते हैं

हाथ से काटी गई धान की फ़सल को काटने के बाद झाड़ा जाता है। धान झाड़ने के बाद बचे अवशेष को पराली कहते हैं। हरियाणा-पंजाब में धान की ज्यादातर बासमती से जुड़ी हुई किस्में बोई जाती हैं और बासमती से जुड़ी किस्मों की पराली पशुओं को खिलाई जाती है। इसलिए बासमती से जुड़ी नस्लों की पराली जलाने का सवाल ही नहीं उठता। दूसरी बात यह है कि कई किसान अपना समय बचाने के लिए धान काटने वाले हार्वेस्टर जिसे देसी भाषा में कंपैन भी कहा जाता है, का इस्तेमाल करते हैं। हार्वेस्टर धान का ऊपरी हिस्सा काटता है, जिसके कारण नीचे वाला ज्यादा हिस्सा बचा रह जाता है। हार्वेस्टर की कटाई से बचने वाले फसल के अवशेष को फांस कहते हैं। धान की फसल काटने के बाद खेतों में गेंहू की बुआई होती है, इसी वजह से किसान इस बेकार पड़े फांस को जला देते हैं। मात्र 15 से 20 प्रतिशत किसान ही हार्वेस्टर से धान की कटाई कराते हैं।

पराली जलाने वाले मामले को लेकर हरियाणा के किसान पलविंदर खैरा ने बताया, ‘इनलोगों को ये तक तो पता है नहीं कि जलाया क्या जाता है और इस्तेमाल में क्या लाया जाता है। मैं कैथल के इलाके से आता हूँ। हमारे यहां किसान अपनी पराली को या तो पशुओं को खिला देते हैं या फिर पेपर मील में बेच आते हैं। रही बात मशीन से कटाई के बाद बचने वाले फांस की, तो भाई वो तो जलाया ही जाएगा, क्योंकि सरकारी ज़ुर्माना लगने के बाद भी ऐसा करना सस्ता पड़ता है। फांस को जलाने के लिए 5 पैसे की तीली लगती है और ज़ुर्माना 2 हजार के आसपास। और अगर फांस को किसी मशीन से निकलवाना पड़े तो 5 हजार से ऊपर का खर्च आता है। ऐसे में आप ही बताओ क्या सस्ता पड़ता है। किसान को पहले ही यह सरकार फ़सलों के वाज़िब दाम नहीं दे रही है और ऊपर से 5 हजार का खर्चा बढ़ाने के लिए भी कह रही है। या तो सरकार इस फांस का कोई हल निकालकर दे, वरना किसान तो वही करेगा जो उसे किफ़ायती लगेगा।’

सप्ताह भर तक जलाए जाने वाले इस फ़ांस से कितना प्रदूषण होता होगा

सप्ताह भर तक जलाए जाने वाले इस फ़ांस से कितना प्रदूषण होता होगा। इस सवाल का जवाब देते हुए उत्तर भारत के जाने-माने कृषि विशेषज्ञ रमनदीप मान ने हमें बताया, ‘इस मामले को लेकर हुई साइंटिफिक स्टडीज़ को अगर देखें तो आपको पता चलेगा कि किसानों द्वारा जलाए जाने वाले फ़सल अवशेष एक सप्ताह के लिए सिर्फ 7 से 8 प्रतिशत ही प्रदूषण करते हैं। आपको तो पता ही होगा कि सरकार से लेकर पूंजीपतियों तक सब किसानों को सस्ता शहरी मज़दूर बनाने पर तुले हुए हैं। इसलिए ,लगातार उन्हें बदनाम किया जाता रहा है। दूसरी बात अगर सरकार फसल अवशेषों को जलाने को लेकर इतनी ही सिरियस है, तो किसानों को प्रति एकड़ 5 हज़ार का मुआवजा दे दे। एक भी किसान फांस नहीं जलाएगा।’

यहां देव लोहान, पलविंदर खैरा और रमनदीप मान की बात में इसलिए दम नज़र आता है क्योंकि, अकेले एनसीआर में 20 हजार रावण जलाए गए थे। दशहरे से लेकर दीवाली तक खूब आतिशबाज़ी की जाएगी। इंडिया कोई मैच जीत जाए तो आतिशबाज़ी, किसी की शादी हो तो आतिशबाज़ी, कोई पार्टी चुनाव जीत जाए तो आतिशबाज़ी। ये शहरी लोग किसी भी मौके पर आतिशबाज़ी करने से नहीं चूकते। ऐसे में किसी की अय्याशी से होने वाले प्रदूषण को तो सब नकार देते हैं, लेकिन, किसानों को घेरने लगते हैं। पता नहीं हमारे समाज में इस किसान विरोधी मानसिकता को क्यों बढ़ावा दिया जाता है।

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